मरणोपरांत आज उपेक्षित हो रहीं कुछ क्रियायें

समय अवश्य बदल रहा है किन्तु कुछ परंपरायें अपरिवर्तनीय है, यह जानना अधिक आवश्यक है..

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मरने के बाद मृतक के लिए कुछ क्रियाएं की जाती हैं। अंतिम संस्कार, पिंड दान, 12हवीं, उठावना, गंगा प्रसादी, पानी ढाल, डंगड़ी रात, जागरण, हवन, इत्यादि सामान्य क्रियाओं के बावजूद कुछ परिजनों को एक विचित्र सी अपूर्णता घेरे रहती है और तब एक अत्यंत उपेक्षित विषय पर पूछताछ होती है, जिसे पंथ में होना या #शंखढालइत्यादि नाम दिया जाता है। आज इसी उपेक्षित गुप्त विषय की चर्चा कर रहा हूँ। ये सभी पंथ सृष्टि आरम्भ से ही, अथवा वैदिक काल से ही हमारे साथ चल रही हैं। कालान्तर में इनमें बहुत सारी शाखाएं बनीं जिनके संस्कार हमारे डीएनए में गहराई तक शामिल हो चुके हैं। यह केवल भारत में ही है ऐसा नहीं है। इनका #विश्वव्यापीप्रसार था।

यदि मृतक किसी पंथ या सम्प्रदाय में था तो उपरोक्त अंतिम क्रियाएं निष्फल हो जाती हैं और तब उसी पंथ के किसी जानकार से एक विशेष अनुष्ठान करवाया जाता है और उसके बाद सब कुछ सामान्य और शान्त हो जाता है।

वर्तमान में इस विषय की सर्वाधिक उपेक्षा हो रही है जिसके कई कारण है। जानकारी के अभाव में इन क्रियाओं का गलत तत्व भी फायदा उठाते होंगे, कुछ स्वयम्भू पुरोहित जो इन रहस्यों से अपरिचित हैं वे भ्रामक मनमानी व्याख्या भी करते होंगे, फिल्मों और ठग ओझाओं का भी प्रभाव है,,,,, बहुत सारी बातें हैं।

मैं इस विषय की गहराई में फिलहाल नहीं जा रहा, मगर अत्यंत सरलता से एक तथ्य समझा रहा हूँ, जिन लोगों ने अपने पूर्वजों की इस परंपरा को निभाया और सम्बंधित पंथ सम्प्रदाय के अनुसार शंखोढाल इत्यादि अनुष्ठान करवाए, उनकी ज्यादा उन्नति हुई और वे शेष आधुनिक क्रियाओं के भरोसे रहने वालों से ज्यादा सुखी हैं।
मुझे ज्योतिषी समझ कर एक मित्र ने अपनी कुछ न हल होने वाली समस्याएं बताईं, जिनका समाधान उक्त बात में है मगर मैं उन्हें समझा नहीं सका और उन्होंने समझना भी नहीं चाहा!!
अगर आप जरा भी सजग है तो निम्न बात गांठ बांध कर ध्यान कर लें।

1.हमारे पूर्वजों की एक परंपरा है, जिसका कोई न कोई एक पंथ या सम्प्रदाय है, जिसमें वे दीक्षित थे और उसकी कुछ मान्यताएं, देवता, साधना का एक विशेष तरीका था, जिसके कुछ अनुयायी अभी भी हैं और उस पंथ की तरफ से हमारे परिवारों के लिए कोई न कोई जानकार भी नियुक्त था। उसके कुछ चिह्न अभी भी कहीं न कहीं उपलब्ध है।

2.किन्हीं कारणों से हम भिन्न देवी देवता की पूजा और तीर्थ या सम्प्रदाय से जुड़ गये या नास्तिक हो गये या हम पर थोप दिये गए, अथवा अज्ञान वश #चपेटमेंआ गए और वह मूल परम्परा आज हमारे लिए एक अंधेरा रास्ता बनी हुई है क्योंकि हमें उसकी कोई जानकारी नहीं है। आजीविका के लिए विस्थापन के कारण यह समस्या बहुत बड़ी बन चुकी है।

3.आप और आपके परिवार के साथ विचित्र घटनाएं हो रही हैं अथवा जैसा सोचा था वैसा परिणाम नहीं मिल रहा है, जबकि आप धर्म के अनुसार ज्ञात हर सम्भव उपाय कर चुके हैं। जबकि आपके ध्यान में आ रहा है कि कुछ लोग ऐसी ही समस्याओं में थे और आज उबर चुके हैं, असाध्य रोग, चर्म रोग, और अवसाद की भयंकर अवस्था से बाहर निकल चुके हैं। अर्थात हम वैज्ञानिक आचरण कर भी दुःखी हैं और वे अवैज्ञानिक से दिख रहे हैं फिर भी चमत्कारी तरीके से लाभ ले रहे हैं!!

4.अब आप अपनी जड़ों की ओर लौटिए….. यह केवल भारत की समस्या नहीं है, पूरे विश्व में यह आंदोलन चल रहा है जैसे यूरोपीय, अफ्रीकन और लातिन अमेरिकी लोग बहुत जिज्ञासा से इस खोज में लगे हैं कि ईसाइयत और इस्लाम के आने से पहले वे क्या थे…?
उनकी उपासना पद्धति क्या थी और यदि कहीं से भी उनका कनेक्शन भारत से जुड़ता है तो वे तत्क्षण उसकी खोज में जुट जाते हैं!!

5.यूरोप और अफ्रीका अपनी जड़ों से छिटककर 1000-2000 साल दूर होकर भी आज वापस जुड़ रहे हैं (इसे इस्कॉन या योग से नहीं जोड़ें, वह बिल्कुल भिन्न विषय है.) जबकि हम भारतीय मात्र एक या दो पीढ़ी ही दूर हुए हैं, खोजने पर अभी भी कई सूत्र बहुत सरलता से वापस मिल सकते हैं। उन्हें ढूंढिए, अपनी जड़ों से जुड़िए और आप देखेंगे कि वैसा करते ही क्षण मात्र में बहुत दुष्कर सी लगने वाली समस्याएं छूमंतर हो गई।

6.जड़ों से जुड़कर आधुनिकता का समन्वय जानना है तो गुजरात अथवा दक्षिण भारत की जीवन शैली और परिवारों का अध्ययन कीजिए और जानिए कि कैसे इंग्लिश मीडियम, सिनेमा, बाजारवाद, कॅरियररिज्म, होटल संस्कृति और पुश्तैनी विरासत को बेचकर उससे दूर जाकर, आप कितनी बड़ी गलती कर रहे हैं??

दो तीन घटनाएं याद आ रही है जिनको आपके साथ साझा करना बहुत जरुरी था मगर पोस्ट बड़ी हो रही है अतः, वे सब फिर कभी।

सारांश यह है कि आप जड़ों को तलाशो, उससे ज्यादा गति से जड़ें आपकी तलाश कर रही है!!
अगर आप मेरा भाव समझ गए हैं तो जरा सा चिंतन व प्रयास कीजिए और तब आप देखेंगे कि आज से ही आपके संकट क्षीण होने लगेंगे। ऐसा कोई अनुभव मुझे इनबॉक्स अवश्य कीजियेगा।

(केसरी सिंह सूर्यवंशी)

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