शब्द शक्ति, दोष, पाप, आलस्य एवं मन की दासता

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” नादेन तेन महता सनातन ” इति स्मृतः। पद्मनाभो महायोगी भूतात्मा भूतभावनः।। (12-208-36a 12-208-36b महाभारत) …

बहुत गहराई में न जाते हुये सरल भाषा में बात करते हैं। शब्द शक्तियाँ भाषा के प्रभाव को, वाचक एवं श्रोता के बीच संवाद को स्थापित करती हैं। तीन शब्द शक्तियाँ हैं – अभिधा, लक्षणा एवं व्यञ्जना। अभिधा जो है उसे वैसे ही कह देना होता है यथा, वह गौरवान्वित है। 

लक्षणा में मुख्यार्थ में बाधा होती है अर्थात जो कहा जा रहा होता है, उसका सीधा अर्थ न हो कोई अन्य अर्थ इङ्गित होता है। यथा, वह आज कल उड़ रहा है। व्यक्ति वास्तव में उड़ नहीं रहा होता, कथ्य का अर्थ व्यक्ति की असामान्य या विशिष्ट दशा बताना होता है। 

व्यञ्जना में मुख्यार्थ में बाधा तो नहीं होती किन्‍तु कहे का सीधा अर्थ न हो अन्य अर्थ अभिप्सित होता है। यथा, आज कल तुम्हारे बड़े चर्चे हैं! किसी व्यक्ति की चर्चा समाज में हो सकती है किन्‍तु कहने वाला असामान्य या विशिष्ट स्थिति बताने के लिये ऐसा कह रहा होता है। 

शब्द शक्तियों का विकास अलंकारों में भी होता है किंतु उस पर अभी बात नहीं करेंगे। 
किसी भी शास्त्र को पढ़ते हुये शब्द शक्तियों का ध्यान अवश्य रखें। शब्द शक्तियों से आगे अतिशयोक्ति – बढ़ा चढ़ा कर कहना, उहोक्ति – प्रभाव दर्शाने हेतु असम्भव बातें करना, विद्रूप – बिगाड़ कर कहना, प्रतीप – जो है, उससे उलट कहना आदि का भी ध्यान रखें। 
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शास्त्रों में दोष, पाप, निषेध, वरेण्य, करणीय, अकरणीय, आप्त आदि अनेक बातें मिलती हैं जिन्हें शब्द शक्तियों एवं अलंकारों से मिला कर नहीं देखने पर विरक्ति से ले कर तिक्ति, उपराम तक सब हो जाता है। 

इन सबका समर्थन करती कथायें, संवाद, चर्चायें, कर्मकाण्ड आदि सब मिलेंगे। जिसे किया जाना चाहिये, वह करणीय है, यथा मंदिर में बिना पाँव धोये नहीं जाना चाहिये। इसके साथ निषेध भी है। इसके उल्लंघन में दोष है, पाप नहीं। एक मोटी परीक्षा यह है कि जहाँ पाप होगा, वहाँ दण्ड बताया गया होगा। निषेध का पालन न करना दोष भी हो सकता है, पाप भी। पाँव धोये बिना गये तो उसके लिये दण्ड का विधान नहीं है, अत: वह पाप नहीं है। 

दोष एवं पाप के मध्य की संक्रमण स्थिति भी होती है जिसमें प्रायश्चित कर्म या लघु दोषहारी काम भी बताये जाते हैं। उदाहरण के लिये युवा गुरुपत्नी का स्पर्श अभिवादन या पदवंदन में भी नहीं करना चाहिये। यह निषेध है। किसी ने स्पर्श कर दिया तो दोष है। दोष का शमन करने हेतु लघु उपाय होंगे यथा गायत्री की एक माला करे या एक दिन उपवास करे या किसी देवी की आराधना करे। गुरुपत्नी के साथ गमन पाप है जिसके हेतु दण्ड भी है कि रक्त तप्त लोहे की शय्या पर सोये अर्थात प्रकारांतर से मृत्युदण्ड, व्यञ्जक भी है 🙂 । ब्राह्मण मदिरापान करे तो पाप है, शमन है कि खौलती हुई मदिरा पिये अर्थात मृत्युदण्ड। ऐसे अनेक उदाहरण मिलेंगे। 

विधि निषेधों के साथ वेदों से ले कर पुराणों तक एक प्रवाही धारा मिलती है। ब्राह्मण ग्रंथों में मिलेगा कि किसी ने ऐसा नहीं किया तो देव रुष्ट हो गये, तो उसने कोई नई विधि चलाई, देवता तुष्ट हो गये। वह नई विधि ही आगे चल कर शाखा हो जाये तो आश्चर्य न करें। पुराण कथात्मक हैं, अन्योक्तिपरक हैं कि किसी लीलावती से पूर्वजन्म में ऐसा पाप हो गया था, उसने इस जन्म में हरिकथा का आयोजन किया तथा मुक्त हुई। इसे कहते हैं उपाय। पाण्डित्य का निकष ऐसे उपाय हैं जो समय के साथ अपने को प्रासंगिक बनाये रखें तथा नवोन्मेष भी करते रहें। 

जो करणीय है, उसे न करने पर या ऐसे निषेध जो व्यक्ति तक सीमित हैं, उन्हें न मानने पर दण्ड के विधान न हो कर व्यक्तिकेंद्रित हानि की बातें कही गई हैं यथा मंदिर में पाँव धोये बिना जाने पर वर्ष भर का किया धरा नष्ट हो जाता है। यहाँ शब्द का अभिधात्मक अर्थ न ले, लक्षणा एवं व्यञ्जना से लें, नष्ट होने का अर्थ यह कि प्रगति के जिस सोपान तक आप पहुँचे थे, उससे उतर कर पुन: नीचे पहुँच गये। सूर्योदय पश्चात भी सोने वाले से लक्ष्मी रुष्ट हो जाती हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि जो कार्य सूर्योदन से पूर्व उठ कर करने थे, उस विशेष समय में करने थे, नहीं हुये तो उनसे जो श्री मिलनी थी, वह नहीं मिलनी। 

इन सबसे आगे ही उहोक्तियाँ आती हैं कि एक बार राम का नाम लिये, समस्त दोषों से मुक्त हो गये। इस प्रकार की बातों की परास बहुत व्यापक होती है। कैसे? जो अटूट विश्वास करने वाला है या साधना में एक विशेष स्तर तक पहुँच गया है, उसके हेतु यह सच है। इस कारण भी सच है कि उससे दोष सञ्चित होंगे ही नहीं, वह पाप करेगा ही नहीं। अनजाने या परिस्थिति विशेष में कुछ हो गया तो उसका शमन राम नाम है। प्रायश्चित के विविध उपाय ऐसी परिस्थितियों के लिये हैं। इसके लिये नहीं कि प्रतिदिन दारू गटके तथा साँझ को कीर्तन कर पाप प्रक्षालित कर दिये ! 
नाम जप की, संकीर्तन की महिमा उपचारात्मक है कि शनै: शनै: व्यक्ति दोषी एवं पापपूर्ण कर्मों से विरक्त होने लगेगा। 

उहोक्तियों का, लक्षणा का, व्यञ्जना का मर्म न जानने वाले अनर्थ करते हैं। क्यों करते हैं? क्यों कि वैसा करना उनके आलस्य एवं मन की दासता को सीधे या प्रकारांतर से समर्थन देता है। 
किसी संत ने लिखा कि कलियुग में यज्ञ, ज्ञान, शास्त्र आदि नहीं, केवल नाम अधारा। यह अभिधात्मक कथन नहीं है, लक्षणा एवं व्यञ्जना का संगम है। उहोक्ति से अलंकृत है। जो आलसी हैं, मन के दास हैं, वे इसका अभिधात्मक अर्थ करेंगे क्यों कि वह अनर्थ उनके दोष की पुष्टि करेगा। 
संत जी गुरु द्वारा सम्प्रदाय दीक्षित थे। प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त में उठ कर संध्या, प्राणायाम, व्यायाम आदि के पश्चात ही ग्रंथ लिखते थे। कलियुग है अत: नाम जप ही पर्याप्त मान लिये होते तो रामचरित न लिखते। नानापुराणनिगमागमसम्मतं इति जब लिखे तो अनेक निगम(वेद), आगम(वेदेतर), पुराण आदि शास्त्रों का अध्ययन कर, ज्ञान प्राप्त कर ही लिखे। 

नाम जप अपने आप में एक पूरी प्रक्रिया है। माला चाहिये, आसन चाहिये, एकाग्र निश्चिंत मन चाहिये, समर्पण चाहिये। कुछ भी न हो तो भी साँसों के आवागमन के साथ चाहिये। करना तो होगा, यह नहीं कि दिन में एक बार नाम ले लिया, हो गया ! वह तो उनके लिये है जिनका बाह्य कर्म एवं भीतरी विचार ईश्वर से भिन्न है ही नहीं ! बहुत ऊँची अवस्था है। जब अजपा जप की बात की जाती है, तो उसके नेपथ्य में पूरी प्रक्रिया होती है। एक दिन में नहीं सध जाता, वहाँ भी विधि है, निषेध है, वरेण्य है, करणीय है, अकरणीय है, SOP है।

जब कहा जाता है कि गरुड के पङ्खों से वासुदेव नाम की ध्वनि आती है तो वह अजपा जप बताने का एक लक्षणात्मक ढंग है।

साधना की बहुत ऊँची अवस्था में शब्द शक्तियाँ ही क्या, सभी शक्तियाँ एक हो जाती हैं, अभेद हो जाता है, अद्वैत रह जाता है। भैंसे से भी वेद बुलवा देते हैं सन्त किंतु बंधु ! उससे पूर्व उनको भी साधना की उसी वीथि से जाना होता है जिनमें विधि, निषेध, करणीय, अकरणीय आदि होते हैं। उसके लिये सबसे प्राथमिक बात यह होती है कि आलस्य एवं मन की दासता का त्याग करना होता है। 

प्रकाश की पूर्णता हो या अंधकार की, दोनों ही स्थितियों में चर्मचक्षुओं को कुछ नहीं दिखता किंतु दोनों में पूर्णिमा एवं अमा का अंतर होता है। सत एवं तमस बाहर से एक लग सकते हैं किंतु भेद बहुत बड़ा होता है। Choice is yours, सत चाहिये या तमस में ही पड़े रहना है। 
॥हरि ॐ॥

(सनातन सिंह)

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