जिन्होंने सौंदर्य लहरी न पढ़ी, वे जन्मे ही नहीं!

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प्रथम तो उपनिषदों की आज्ञा है-
“केवलाघो भवति केवलादी” 
अकेला आस्वाद लेने वाला पाप का भागी होता है ।

दूसरे “एक हस्त समाहार शतहस्तं समाकिर!” मंजे एक हाथ से ग्रहण और सैकड़ों हाथों से प्रकीर्णन का परम्परागत ब्राह्मण अनुशासन।

श्रीविद्यान्तर्गत एक स्तुति है सौंदर्य लहरी! साहित्यिक कहें या आध्यात्मिक इससे अद्भुत इससे अधिक सुंदर कुछ पढ़ा हो यह ज्ञात नहीं। अनुपम काव्यगत सौन्दर्य का अप्रतिम उदाहरण!

अतएव निरूपम-सौंदर्य निरूपिणी सौन्दर्य लहरी के अमृतवर्षिणी दुकूलों पर चलते हैं।

हालांकि जगद्गुरूतत्व स्तुतिकार-शिरोमणि आत्मानुभूति-वाचोविन्यास में स्वयं शेष-शारदा सदृश साक्षात शंकर के रचनामाल की सुमेरु पर हमारे नाईं मूरख क्या तो लिखे। पर आचार्यों के गिरे जूठन खा साहस करते हैं।

कुछ विद्वान सौंदर्यलहरी आनंदलहरी को पुष्पदन्तरचित बताते भी मिले और कहीं आचार्य शंकर और पुष्प को अभिन्न भी कहा गया। प्रथम एकतालीस श्लोकों को आनंदलहरी कहा। खैर, विषयान्तर न हो !

इस स्तुति में ‘कामेशबद्धमांगल्यसूत्रशोभितकन्धरा’ और ‘कामेश्वरप्रेमरत्नमणियों’ की अलौकिक आभा स्यात और निखर कर प्रस्तुत हुई है तो जैसे ‘शिवकामेश्वराङ्कस्था शिवा स्वाधीनवल्लभा’ ने कामेश्वर-कामेश्वरी के अद्वैत रहस्य को उजागर ही कर देने की आज्ञा सी दे दी है आचार्य को।

कामेश्वरमुखालोककल्पित सुरासामप्रिया जिसके पाणिग्रहण मात्र से सांप लपेटने ,जहर पीने वाले नंगे बेलपत्री खा काम चलाने वाले परमवैष्णव भी ‘जगदीश्वर’ हो गए हैं वह ‘जूनो के हंसों की तरह कभी अलग न होने वाले सदाकामरत’ युगल की कृपास्वरूप ही यह छंद प्रकट हुए हैं।

स्थूल रूप में सौन्दर्य लहरी माँ के अनुपमेय सौन्दर्य का वर्णन है। आचार्य शंकर के दार्शनिक पक्ष की बहुत चर्चा हुई है और वह पक्ष इतना प्रभावी है कि उनका कवित्व सा छुप गया है। श्रृंगार रस और रस रहस्य की व्यंजना में तो करोड़ों अरबो कीट्स, शेली, शेक्सपियर आचार्य के सामने पानी भरते दिखेंगे।

आद्य शंकराचार्य द्वारा बाल्यकाल विरचित, श्री गौड़पादाचार्य प्रतिपादित सुभगोदय प्राकट्य, कादि हादि विद्याओं की सारसर्वस्वविभूषिता सौंदर्य लहरी ही है ।सुभगोदय का अभिप्राय है सुभगा अथवा सौभाग्य का उदय जिसका असल आतंरिक अभिप्राय है कुण्डलिनी जागरण !

समयाचारस्वरूपा सात्विक शंकर-त्रिपुराअनुमोदित आगमात्मिका तन्त्ररचना होने से यह जितनी विस्तृत रहस्यपरा है तो साथ ही अभ्युदय और निःश्रेयस की उपायस्वरूपा भी है।

दक्षिण में श्रीविद्योपासना प्रकट प्रकाशित रही परन्तु उत्तर में गुप्त। संभवतः यही कारण है कि उत्तर भारत में इस पवित्रतम ग्रंथ का उतना प्रसार नहीं।

सौंदर्य लहरी पर प्राचीनतम टीका आचार्यचरण के पट्टाशिष्य सुरेश्वराचार्य लिखित है जो आज भी श्रृंगेरी मठ में सुरक्षित है। अर्वाचीन सफल टीकाओं में कामेश्वरसूरिकृत अरूणमोदिनी, श्रीरामकविकृत डिण्डिम-भाष्य, दामोदरकृत गोपालसुन्दरीव्याख्या एवं कैवल्याश्रमि सम्प्रदायव्याख्या प्रमुख हैं।

आन्ध्रप्रजावल्लभ राजा कृष्णदेव के जामाता उत्कलनरेश प्रतापरूद्रदेव के आश्रित विद्वान आचार्य मल्ललक्ष्मीधर की रहस्यप्रकाशिका टीका साधकों, शोधार्थियों और काव्यरसप्रेमियों के लिए साक्षात सौंदर्यलहरीलहरजलयान ही है।

१०३ श्लोकों में प्रवाहित यह शंकर भावधारा शिखरिणी छन्द में है ,जिसमें यगण, मगण, नगण, सगण, भगण और लघु तथा गुरु के क्रम से प्रत्येक चरण में वर्ण रखे जाते हैं और ६ तथा ११ वर्णों के बाद युति होती है, जैसा कि इसके लक्षण में स्पष्ट किया गया है :- 
“रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमनसभला गः शिखरिणी”
(- वृत्तरत्नाकर ३/९०)

सौन्दर्य लहरी साहित्यिक आश्चर्य भी है जिस तरह राघवयादवीयम्! त्रिपुरसुंदरी को समर्पित श्लोकों को नृसिंह स्वामी द्वारा शब्दार्थ अन्वयार्थ और भावार्थ विष्णु-पक्ष में घटित किया गया है जो वैष्णव सुधियों के लिए अमूल्य निधि है।

तृतीय श्लोक में परिणामोल्लेखलंकार क्या ही तो सुंदर बना है। पंचम श्लोक की पदावली के अभिधार्थ में पंचपुष्पधन्वा विष्णु-कामदेव त्रिपुरान्तकारी को मोहित करने की लालित्य-क्षमता त्रिपुरसुंदरी की आराधना से प्राप्त करते हैं।

छठवें श्लोक में आचार्य ने ‘विभावन अलंकार’ में जिस गुणीभूत व्यंग्य का प्रयोग किया है काव्यगत सौन्दर्य की दृष्टि से वह इन्द्रियातीत विषय है।

सातवें श्लोक का ‘अनुप्रास’ और आठवें के उपमा और रूपक भारवि -भवभूति के लिए भी ईर्ष्या का कारण हो सकते हैं। चौवालीसवें श्लोक में भगवती के सिन्दूर की तुलना नवीनसूर्यरश्मियों से करते हुए जिस उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग हुआ ऐसे लगा जैसे सूर्य शत्रु की कारागार से बाहर आ रहे हों।

काव्य में उच्चतम दर्शन के उद्घाटन और रहस्य-रस की अमृतधार देखनी हो तो बत्तीसवां श्लोक देखिए…
“शिवः शक्तिः कामः ….”
वास्तव में यह श्लोक पंचदशाक्षरी का प्रकीर्ण उत्स है। सोमसूर्यअनलात्मक त्रिखण्डयुक्त मातृका मंत्र का समन्वय है।
क,ए,ई,ल,ह्रीं
ह,स,क,ह,ल,ह्रीं
श्रीं

श्रीविद्या के बारह प्रमुख शिष्यों 
“मनुश्चंद्रः कुबेरश्च लोपामुद्रा च मन्मथः।
अगस्तिर्ग्निसूर्यश्च इन्द्रस्कंदः शिवस्तथा।
क्रोधभट्टारको देव्या द्वादशामी उपासकाः”
इनने जिस सत्य का अनुभव किया आचार्य शंकर ने उसी सत्य-दर्शन का प्रतिपादन इस स्तुति में किया है।

शक्ति केवल ब्रह्मा, विष्णु, शंकर की आह्लादिनी, प्रतिपादिनी सत्ता ही नहीं उसकी स्वतंत्र सत्ता भी है। वह परमब्रह्म की महिषी परमविलक्षणी, अगम्या, निस्सीम शाश्वत, परमचैतन्यप्रकाशिका सत्य है।

गिरामाहुर्देवीं द्रुहिणगृहिणीमागमविदो
हरेः पत्नीं पद्मां हरसहचरी-मद्रितनयाम्
तुरीया कापि त्वं दुरधिगम-निस्सीम-महिमा
महामाया विश्वं भ्रमयसि परब्रह्ममहिषि।।

जिनने सौंदर्य लहरी न पढ़ी वह जन्मे ही नहीं!

इत्यो३म् शम्!

डा. मधुसूदन पाराशर उपाध्याय

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