अध्यात्म कथा -16: अंगुलिमाल का हृदय परिवर्तन

या वो सतसंग हो या सज्जन व्यक्ति का संग – हर किसी को सौभाग्य से मिलता है और जिसे मिल जाये वह उसका कल्याण करने में सक्षम है..

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बुद्ध घूम रहे थे भारत में।  भ्रमण करते हुए मगध में पहुंचे तो एक नगरी के बाहर डेरा डाल कर बैठ गए। लोग उनके दर्शन को आए । बुद्ध ने पूछा —“क्या हाल है आप सबके?”
बुद्ध अचंभित हुए जब उन्होंने जवाब सुना। सब ने कहा—” बहुत दुखी हैं हम।”
किसी ने कहा—“मेरा लड़का मारा गया!”
किसी ने कहा—“मेरा पति मारा गया।”
किसी ने कहा—“भाई मारा गया!”
बुद्ध ने आश्चर्य से पूछा- ”क्या हो गया है तुम सबको? क्या कोई युद्ध यहां पर हुआ है? क्या राजा ने अत्याचार आरंभ कर दिया।”
लोगों ने कहा – “नहीं महाराज। राजा अच्छे हैं। युद्ध भी नहीं हुआ, परंतु यहां एक डाकू रहता है अंगुलिमाल।  वह प्रतिदिन एक नए व्यक्ति को मार कर उसकी अंगुली काट लेता है। जिस देवी की वह पूजा करता है , वह उसे एक हज़ार अंगुलियों के माला पहनाना चाहता है। उसे किसी ने कह दिया है कि ऐसी माला पहनाने से बड़ी सिद्धि मिल जाएगी। “
बुद्धने पूछा — “कहां रहता है वह?”
लोगों ने बताया — “नगर के दूसरी ओर विशाल बन में।”
बुद्ध बोले —” मैं उसके पास जाऊंगा।”
लोगों ने अशांत होकर कहा -;;”उसके पास मत जाइए महाराज!” परंतु बुद्ध मानने वाले नहीं थे।उठे, चल पड़े।
लोगों ने कहा—” उसे राजा के सिपाही भी नहीं हरा सके ,आप बिना हथियार के क्या करेंगे?”
बुद्ध बोले — “मेरे पास ऐसा हथियार है, जिसके सम्मुख और कोई हथियार नहीं चलता।” और वह नगर को पार करके जंगल में पहुंचे।
सुनसान और वीरान वन था वह अत्यंत भयानक। कहीं कोई व्यक्ति नहीं, कोई पशु भी नहीं। बुद्ध चलते गए पर्याप्त आगे जाकर एक बूढ़ी स्त्री मिली।
बुद्ध ने पूछा —” मां। क्या तुम जानती हो कि अंगुलिमाल डाकू इस वन में कहां रहता है?”
बूढ़ी स्त्री ने कहा —” जानती हूं पुत्र। परंतु आगे मत जा, वापस चला जा यहां से। अंगुलिमाल मनुष्य नहीं, राक्षस है। वह तुम्हारा वध किए बिना नहीं मानेगा।
बुद्ध हंसते हुए बोले —” ऐसी क्या बात है मां। वह मेरी हत्या क्यों करेगा?”
बूढ़ी स्त्री ने कहा– ‘‘तू जानता नहीं है बेटा! एक सहस्त्र अंगुलियों को वह एकत्रित करना चाहता था। आज अंतिम रात्रि है।  आज उसे देवी की पूजा करनी है, उसे माला पहनानी है और माला में एक अंगुली अभी कम है। आज प्रातः काल से ही किसी व्यक्ति को खोजता फिरता है। मैं उसकी मां हूं।’’
उस वृद्धा ने आगे बताया कि ‘‘मैंने पूछा यदि रात्रि तक कोई व्यक्ति ना मिला तो क्या करेगा तू? तो उसने कहा कि सायंकाल तक यदि कोई व्यक्ति न मिला तो मैं तुझको ही मार डालूंगा,  तेरी उंगली काट कर माला में पिरो दूंगा। मैं ऐसी डरी कि सायंकाल होने से पूर्व ही घर छोड़कर भाग उठी। जो अपनी मां को नहीं छोड़ सकता वो तुझे कैसे छोड़ेगा? वापस चला जा यहां से।  वह पहले पागल था, आज पूर्ण पागल हो गया है।”
बुद्ध बोले—” मुझे मरने का डर नहीं है ,मैं तो उसे मिलूंगा अवश्य।  तुम बताओ वह रहता कहां है?”
बूढ़ी स्त्री ने कहा —” वृक्षों के काले झुरमुट के उस पार उसका मकान है । उसमें मिलेगा वह , परंतु मैं अब भी कहती हूं कि तू ना जा । “
बुद्ध हंसते हुए आगे बढ़े,  झुरमुट के उस पार चले गए। सामने मकान दृष्टिगोचर हुआ। उसके समीप जाकर बोले- “कोई है?”
अंदर से आवाज आई, थोड़ी देर में अंगुलिमाल बाहर आया,  हाथ में तीक्ष्ण तलवार लिए। द्वार के बाहर आकर बोला— “कौन हो तुम?”
बुद्ध बोले- “क्या तुम ही अंगुलिमाल हो?”
डाकू ने चिल्लाकर कहा- “हां, तुम्हारी मृत्यु तुम्हें यहां ले आई है, मैं तुम्हारी गर्दन काटूंगा।  “
बुद्ध हंसते हुए बोले—” मैं गर्दन ही कटवाने आया हूं। इसलिए आया हूं कि तुम्हारी पूजा पूरी हो जाए, तो आगे बढ़ो!’’ और उन्होंने गर्दन झुका दी।
अंगुलिमाल प्रसन्नता से आगे बढ़ा, तलवार उठा कर।  परंतु यह क्या! तलवार वाला हाथ जहां का तहां रुक गया।  कांपते हुए उसने कहा- ‘‘यह क्या हो गया मुझे? कौन हो तुम?”
बुद्ध बोले —“मैं गौतम हूं।”
डाकू ने तलवार फेंक दी ।  आश्चर्य से बोला—” आप ही क्या गौतम बुद्ध हो? आप ही क्या मरने के लिए आए हो?”
बुद्ध ने कहा —“हां ,मैं गौतम हूं।  मैं मरने के लिए आया हूं।”
अंगुलिमाल कांपती हुई  आंसू भरी आवाज में बोला- “मुझे माफ कर दो गौतम! मैंने बहुत पाप किए हैं मेरे पापों का कोई प्रायश्चित नहीं है।”
गौतम आगे बढ़े उसके माथे को छूकर बोले- “घबराओ नहीं मैंने तुम्हारे पाप नष्ट कर दिए। मैंने तुम्हारे मन को बदल दिया। “
यही अंगुलिमाल बाद में भिक्षु बना। लंका में जाकर बौद्ध धर्म का उसने प्रचार किया।
या वो सतसंग हो या सज्जन व्यक्ति का संग – सौभाग्य से मिलता है और वह आपका कल्याण करने में सक्षम है।
(सुनीता मेहता)

2 COMMENTS

  1. बहुत सुंदर प्रेरणादायी आध्यात्मिक कथा|बहुत बधाई और शुभकामनाएँ दीदी आपको|

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