अध्यात्म कथा-5: क्रोध पर प्रेम की विजय होती है!

विश्वामित्र सोच रहे थे कि अभी सब विद्यार्थी चले जायँगे , तो नीचे कूद कर एक ही बार में अपने शत्रु का अंत कर दूंगा।..

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विश्वामित्र वास्तव में बहुत क्रोधी थे जो उनके मन का प्रतिद्वंद्वी भाव शत्रुता में परिवर्तित हो गया और उन्होंने वशिष्ठ को ही मार डालने का विचार कर डाला.
ब्रम्हर्षि कहलाने को व्याकुल विश्वामित्र ने सोचा – ”फिर मुझे राजऋषि कहने वाला कोई रहेगा नहीं”, ऐसा सोचकर, एक छुरा लेकर वह उस वृक्ष पर जा बैठे,जिसके नीचे बैठकर महर्षि वशिष्ठ अपने शिष्यों को पढ़ाते थे। शिष्य आए, अपने स्थान पर बैठ गए।
वशिष्ठ आए और वे भी अपने आसन पर विराजमान हो गए। शाम हो गई, पूर्व के आकाश में पूर्णमासी का चांद निकल आया था। विश्वामित्र सोच रहे थे कि अभी सब विद्यार्थी चले जायँगे , तो नीचे कूद कर एक ही बार में अपने शत्रु का अंत कर दूंगा।
तभी एक विद्यार्थी ने नए निकलते हुए चाँद की ओर देखकर कहा— कितना मधुर चाँद है वह! कितनी सुंदरता है उसके अंदर!”
वशिष्ठ ने चाँद देखा;बोले— यदि तुम ऋषि विश्वामित्र को देखो तो इस चाँद को भूल जाओगे। यह चाँद सुंदर अवश्य है,परन्तु ऋषि विश्वामित्र इससे भी अधिक सुंदर हैं। यदि उनके अंदर क्रोध का कलंक न हो तो वह सूर्य की भांति चमक उठें।”
विद्यार्थी ने कहा — परन्तु महाराज! वह तो आपके शत्रु हैं, स्थान-स्थान पर आपकी निंदा करते हैं।”
वशिष्ठ बोले— “मैं जानता हूँ, परन्तु यह भी जानता हूँ कि वह मुझसे अधिक विद्वान हैं। मुझसे अधिक तप उन्होंने किया है, मुझसे अधिक महान हैं वे। मेरा माथा उनके चरणों मे झुकता है।”
वृक्ष पर बैठे विश्वामित्र इस बात को सुनकर चौंक पड़े। जिस वशिष्ठ को वह मार डालने के लिये बैठे थे, वह उनकी प्रशंसा करते नहीं थकते थे। एकदम नीचे कूद पड़े वे, छुरे को एक ओर फेंक दिया। चरणों में गिरकर बोले —” मुझे क्षमा करो!”
वशिष्ठ प्यार से उन्हें उठाकर बोले—” उठो ब्रह्मर्षि!”
विश्वामित्र आश्चर्य से — “ब्रह्मर्षि? आपने मुझे ब्रह्मर्षि कहा? परन्तु आप तो ये मानते नहीं हैं।”
वशिष्ठ बोले — “आज से तुम ब्रह्मर्षि हुए, महापुरुष! तुम्हारे अंदर जो चाण्डाल था वह निकल गया है।”
यह क्रोध बहुत बुरी बला है! सवा करोड़ नहीं, सवा अरब गायत्री का जाप कर लें, एक बार का क्रोध इसके सारे फल को नष्ट कर देता है।
(सुनीता मेहता)

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