अध्यात्म कथा-12: कड़वे बोल ना बोल रे भाई!

स्मरण रहे, आपकी बोली है गोली - जो चल जाये तो सीने में उतर कर जान भी लेती है और प्यार भरी हो तो मीठी हो कर दिल में उतर जाती है..

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एक वकील  साहब कभी-कभी सत्संग में जाते थे, उनका साथ वर्ष का बच्चा भी साथ जाता था।
एक दिन सत्संगे में एक व्यक्ति ने एक बार गाना गाया — कड़वे बोल ना बोल रे भाई!
बच्चे को यह गाना अच्छा लगा उसने याद कर लिया। जब कभी भी उसको समय मिलता, इस गीत को गाता फिरता— कड़वे बोल ना बोल, कड़वे बोल ना बोल!”
एक दिन वकील साहब और उनकी धर्मपत्नी में हो गई अनबन , रूठ गए दोनों। कई दिन बीत गए एक दूसरे से बोले नहीं परंतु पति-पत्नी कब तक रूठे रहेंगे! पति के मन में बार-बार आए कि वह पत्नी मान जाए, पत्नी के मन में भी आए कि पति मान जाए ,परंतु दोनों की यह इच्छा की पहल दूसरा करें।
रोज होता ये कि पति दफ्तर से आते, अपने कमरे में जाकर बैठे रहते। पत्नी खाना बनाकर नौकर के हाथ भेज देती। किसी तरफ से ही पहल की शुरुआात के आसार नहीं नजर आ रहे थे।
एक दिन वकील साहब दफ्तर से आए, अपने कमरे में चले गए —- इनके नन्हे बच्चे ने इनके कमरे में आकर गाना शुरू किया, ” कड़वे बोल ना बोल रे कड़वे बोल ना बोल। “
वकील साहब के ह्रदय में एक आशा जाग उठी बच्चे से बोले—” बेटा ! यह गीत अपने मां के कमरे में जाकर गाओ।” बच्चा मां के कमरे में गया वहां जाकर गाने लगा — कड़वे बोल ना बोल !”मां ने कहा — यहां क्या गाता है ? जा, अपने पिताजी के कमरे में जाकर गा!”
बच्चा फिर पिताजी के कमरे में पहुंचा ;बोला कड़वे बोल ना बोल।” पिताजी ने कहा — अरे ! तुझे मां के कमरे में जाकर गाने को कहा था ‘वही जाकर गा।”
बच्चा फिर अम्मा के कमरे में पहुंचा। अम्मा ने कहा— अरे ! तुझे पिताजी के कमरे में जाने के लिए कहा था ना, वहां जाकर गा।
बच्चे काफी समझदार टाइप का था. उसने दोनों कमरों के बीच में जाकर जोर से कहा— आप दोनों तो मुझे गाने ही नहीं देते। मैं अब यहां खड़ा होकर गाऊंगा।
वह गाने लगा — “कड़वे बोल ना बोल रे भाई कड़वे बोल ना बोल।”
माता और पिता दोनों ने बच्चे की भोली बोली को सुना। दोनों हंस पड़े, हंसी के इस फव्वारे में क्रोध की दीवार टूट गई। दोनों बच्चे के पास आ गए. माता-पिता ने बच्चे के सामने ही एक-दूसरे की आंखों में देखा और मुस्कुराये.
उन्होंने एक-दूसरे से हंसते हुए कहा–” कड़वे बोल ना बोल रे।”
फिर क्या था, सारे घर में मुस्कुराहटे चमक उठी। क्रोध के नासमझ बादल टुकड़े-टुकड़े हो गए। शांति का प्रकाश जाग उठा। यही है सत्संग का चमत्कार! जादू है जादू, यह सत्संग!
इस सत्संग के एक छोटे वाक्य ने एक छोटे से बच्चे में वह  शक्ति जगा दि कि बड़े-बड़ों की भूल को सुधारने की उसमें शक्ति दिखाई दी और घर के सन्नाटे को कहकहों में बदल दिया।
रामभक्त महाकवि तुलसीदास जी भी तो यही कहते हैं:
तुलसी मीठे वचन से सुख उपजत चहुं ओर।
वशीकरण यह मंत्र है तब दो वचन कठोर।।
(सुनीता मेहता)

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