अध्यात्म कथा -19 : जैसा अन्न वैसा मन

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भीष्म पितामह  शर-शैय्या पर लेटे हुए थे। महाराज युधिष्ठिर उनसे धर्म उपदेश ले रहे थे। धर्म की बड़ी गंभीर और लाभदायक बातें वे कह रहे थे। तभी द्रौपदी ने कहा—” पितामह ! मेरा एक प्रश्न है, आप आज्ञा दें तो पूछूं?”
भीष्म बोले— ” पूछो बेटी ! तुम भी एक प्रश्न पूछो, मैं उत्तर दूंगा।”
द्रौपदी ने कहा — ” महाराज ! प्रश्न पूछने से पूर्व क्षमा चाहती हूं। मेरा प्रश्न कुछ टेढ़ा है बहुत अच्छा न लगेगा आपको, अगर बुरा लगे तो रुष्ट ना होना।
भीष्म बोले —” नहीं बेटी ! मैं रुष्ट नहीं होता ,तुम जो भी चाहो पूछो।”
द्रौपदी ने कहा —” पितामह ! आपको स्मरण है, जब दुर्योधन की सभा में दुशासन मुझे नग्न करने का यत्न कर रहा था तो मैं रो रही थी , चिल्ला रही थी आप भी वहां उपस्थित थे ! आपसे भी मैंने  सहायता की प्रार्थना की थी । आज आप ज्ञान और ध्यान की बड़ी-बड़ी बातें कह रहे हैं । उस समय आपका यह ज्ञान और ध्यान कहां गया था ? उस समय एक अबला का अपमान आपने कैसे सहन किया?  उसकी पुकार को क्यों नहीं सुना?”
भीष्म बोले —” तुम ठीक कहती हो बेटी ! उस समय में दुर्योधन का पाप भरा अन खाता था। वह पाप मेरे शरीर में समाया हुआ था ; रक्त बनकर मेरी नसों में दौड़ रहा था। उस समय मै चाहने पर भी धर्म की बात नहीं कह सका । अब अर्जुन के तीरों ने उस रक्त को निकाल दिया है। पर्याप्त समय से मैं शरों की शैया पर पढ़ा हूं। पाप का  अन्न शरीर से निकल गया है , इसलिए धर्म की बात कहने लगा हूं।”
यह है अन्न का प्रभाव जैसा अन्न वैसा मन । जैसा आहार, वैसा विचार।
जैसा अन्न जल खाइये, तैसा ही मन होय।
जैसा पानी पीजिए, तैसी वाणी होय ।।

 

आज अपनी मौत पर डर क्यों रहा है इन्सान, जो खुद दूसरों की मौत का जश्न मनाता है

2 COMMENTS

  1. जैसा खाओ अन्न वैसा बने मन्न

    उक्ति बहुत सही चरितार्थ सिद्ध होती है।

    इसलिए ही ग्रहणी को भोजन बनाते समय भगवद भजन कड़ते रहना चाहिए जिससे उसका भोजन , भोजन न बनकर प्रसाद बन जाये।।
    हमारे यहां अभी एक सरदार फैमिली के बारे में पता चला कि जब वह भोजन बनाती तो उनके मुख से सबद चलता रहता था । आज उनके बच्चे बहुत अच्छी जगह पर हैं।।

    श्री मन्न नारायण

    • सच बात है राज ठाकुर जी ,आपका बहुत आभार उत्साहवर्धन के लिए, कृपा बनाये रखिये

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