Adhyatma Katha – 28 : उसकी आँख बहुत बड़ी है!

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ये एक महापुरुष के जीवन से जुड़ा एक प्रेरक प्रसंग है। हुआ ये कि एक बार उनके पिताजी बहुत रूग्ण हो गए। उनको विदित हुआ तो वे लाहौर से जलालपुर जट्टा की ओर चल पड़े। गाड़ी में सवार होने से पूर्व उन्होंने अपने छोटे भाई लाला त्रिलोक चंद्र को ‘खरिया ‘में तार दे दिया कि पिताजी रूग्ण है और मैं वहां पहुंच रहा हूं। लाला त्रिलोकचंद ‘खरिया ‘ में वकालत करते थे।
तार पहुंचा तो वह कचहरी में खड़े एक अभियोग के संबंध में वाद – विवाद कर रहे थे। तार को पढ़ते ही उन्होंने मुंशी को कहा — “अभी सवा तीन  बजे हैं , साढ़े तीन बजे  गुजरात के लिए लारी जाती है। ” लारी वाले को कहो, कि मेरे लिए एक सीट रखें । मैं बहस समाप्त करके अभी आता हूं।”
किंतु बहस हो गई कुछ लंबी। साढ़े तीन बजे भी समाप्त नहीं हुई ।  बस वाले ने समाचार भेजा —” समय हो गया।” लाला त्रिलोक चंद ने कहा — “थोड़ी देर ठहरो मैं अभी आता हूं।”
 लारी वाले ने कुछ समय तक और प्रतीक्षा की ! पौने चार  बज गए , किंतु बहस फिर भी समाप्त नहीं हुई दूसरे वकील ने कोई नई बात उपस्थित कर दी थी। उसका उत्तर देना आवश्यक था।
लाला त्रिलोकचंद एलारी वाले के पास फिर संदेश भेजा परंतु चार बजे  भी छुटकारा नहीं मिला । चार बजे तक प्रतीक्षा करने के बाद लारी – वाला यह कहकर चला गया कि अब और प्रतीक्षा नहीं की जा सकती ; दूसरे यात्री तंग आ गए हैं।
कोई साढ़े चार बजे के लगभग लाला त्रिलोक चंद जी को छुटकारा मिला। बाहर आकर देखा तो लारी वाला चला गया है, फिर तो बहुत क्रोध में आए और अपने भाग्य को कोसा — ‘पिताजी रूग्ण हैं। मुझे जलालपुर पहुंचना है अब पहुंचें कैसे?’
उन्होंने लारी वाले को कोसा—” इसे मैंने कत्ल के मुकदमे से बचाया था। यह बदला दिया है इसने?” थोड़ी देर प्रतीक्षा भी ना कर सका। कैसे रूखे लोग हैं अब मैं क्या करूं?” कैसे पहुंचूं पिताजी  के पास?”
इस प्रकार सोचते हुए वे निराश और उदास सड़क पर खड़े थे, की जेहलम की ओर से एक मोटर आती हुई दिखाई दी। मोटर के स्वामी लाला त्रिलोक चंद्र के मित्र थे ; मोटर में स्वयं बैठे थे, गुजरात जा रहे थे। लाला त्रिलोकचंद को देखकर उन्होंने मोटर खड़ी कर ली। त्रिलोक चंद से पूछा — ” इतने उदास क्यों हो ?”
उन्होंने सारी बात कह सुनाई और यह भी बताया कि जलालपुर में उनका पहुंचना आवश्यक है। मित्र ने कहा — ” इसमें घबराने की क्या बात है ? लारी चली गई तो जाने दो ,यह मोटर तो है। बैठो इसमें , मैं तुम्हें लेकर चलता हूं।”
मोटर में बैठकर खरिया से छः मील की दूरी पर ही पहुंचे थे कि एक भयानक दृश्य उनके सामने आ गया । एक लारी सड़क के दाएं और उल्टी पड़ी थी, 10 यात्री मर गए थे लारी चकनाचूर हो गई थी ।वृक्ष टूट गया था , और यह वही ला रही थी , जो लाला त्रिलोक चंद को बिना लिए चली आई थी ; जिसके न मिलने के कारण लाला त्रिलोकचंद उदास और निराश हुए थे।
उसी समय उन्होंने भगवान को धन्यवाद दिया और हाथ जोड़कर कहा — ” धन्य हो भगवान , तुमने मुझे बचा लिया।”
अरे ! मत समझो कि सब कुछ तुम्ही जानते हो। तुम से अधिक ज्ञानी वह प्रभु है। उसकी आंख बहुत बड़ी है, तुम्हारी है बहुत छोटी। जहां तक वह देखता है ,वहां तक तुम कभी देख नहीं पाते। इसलिए उस पर भरोसा करो। वेद में मंत्र आता है , जिस का भाव यह है — ” हे अग्निदेव ! ले चल मुझे सीधे रास्ते से, ले चल उधर जिधर तू चाहता है, ले चल मुझे जिधर रास्ता है।”

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