Adhyatma Katha-27: जाको राखे सांइया मार सके न कोय !

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दिल्ली में ‘ तेज ‘ समाचार – पत्र निकलता है ना ! उसके संपादक थे श्री देश बंधु गुप्ता ! बहुत अच्छे ,बहुत प्यारे, सज्जन व्यक्ति थे वे। तेज के संपादक भी थे और भारत के संपादकों की जो कॉन्फ्रेंस हुई , उसके प्रधान भी।
कोलकाता में इस कांफ्रेंस का वार्षिकोत्सव हो रहा था । उसमें सम्मिलित होने के लिए वे वायुयान में बैठे , कोलकाता की ओर चल दिए। इस वायु यान से महात्मा गांधी के सुपुत्र श्री देवदास गांधी भी जाना चाहते थे। वह भी संपादक कांफ्रेंस के नेता थे ; हिंदुस्तान टाइम्स के मैनेजिंग संपादक भी ,परंतु उन्हें वायुयान में सीट नहीं मिली।
कई सिफारिशें कराई ,काफी दौड़ धूप की। कुछ परिचित यात्रियों से भी कहा — मुझे आज ही कलकत्ता पहुंचना है । बहुत आवश्यक कार्य है। आप आज की बजाय कल चले जाइए । अपनी सीट मुझे दे दीजिए।” परंतु किसी ने उनकी बात नहीं मानी ! कोई भी प्रयत्न सफल नहीं हुआ।
देवदास जी निराश होकर घर वापस आए। बहुत दुख के साथ उन्होंने अपने एक मित्र से कहा — देखो जी कैसा समय आ गया है ! मैं इन लोगों की कितनी सेवा करता हूं !जब भी आवश्यकता होती है दौड़े-दौड़े मेरे पास आते हैं; पर अब मुझे थोड़ी सी आवश्यकता पड़ी तो किसी ने मेरी बात नहीं सुनी।”
वायुयान उनकी शिकायत से रुका नहीं। पालम हवाई अड्डे से उड़ा , आकाश में पहुंचा, कोलकाता की ओर जाने लगा परंतु डम डम के अड्डे पर पहुंचा तो चहुँ और इतनी धुंध थी कि नीचे उतर नहीं सका। देर तक चक्कर लगाता रहा । उसका पायलट प्रयत्न करता रहा कि किसी तरह धुंध कम हो तो नीचे देख सके ,परंतु ऐसा कोई स्थान नहीं मिला।
नीचे उतरने का प्रयत्न करता हुआ, वह वायुयान समुद्र के किनारे पहुंच गया। पायलट को पता नहीं लगा , कि नीचे घना जंगल है , तनिक सा नीचे हो कर यान एक वृक्ष में उलझा उससे आगे वाले वृक्ष से टकराया और फिर कितने ही वृक्षों को तोड़ता तोड़ता फोड़ता चकना चूर करता हुआ पूरी शक्ति के साथ भूमि पर जा गिरा। उसके पेट्रोल का टैंक फटा ।पल भर में सारा यान जल उठा। उसके यात्री जल उठे ।
कुछ समय के पश्चात वे सब मर चुके थे हमारे देशबंधु गुप्ता का भी अंत हो चुका था और दिल्ली में हमारे देवदास जी अब तक बहुत दुखी थे , अब भी ईश्वर के सारे संसार के अन्याय की चर्चा कर रहे थे । तभी तार द्वारा वायुयान के नष्ट होने और यात्रियों के मरने का दुखद समाचार हिंदुस्तान के कार्यालय में पहुंचा तो देवदास जी चौक उठे ।
चिल्ला कर बोले —” यह क्या हुआ ?” पूरा समाचार पड़ा तो सिर झुक गया । धीरे से बोले —- तमने बड़ी कृपा की भगवान, मुझे इस यान में स्थान नहीं मिलने दिया । यदि सीट मिल जाती , यदि मैं भी इस यान में होता तो इस समय मेरा भी ओम तत सत हो जाता । “
सुनो मेरे भाई ! भगवान की आंख बहुत दूर तक देखती है !आप नहीं जानते कि वह क्या करना चाहता है ।आप केवल उस समय के कष्ट को देखते हो , उसे नहीं जानते जिसे वह जानता है । इसलिए मत करो शिकायतें भगवान के दरबार में किसी के साथ अन्याय नहीं होता, किसी को दंड नहीं मिलता।
आप इस विश्वास में न्यूनता ना आने दो कि ईश्वर जो कुछ करता है , तुम्हारी भलाई के लिए करता है । उस पर विश्वास करो।

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