Adhyatma Katha -30: प्रभु तुम्हारी इच्छा पूर्ण करें!

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महर्षि दयानंद अंतिम सांसें ले रहे थे। सारे शरीर में दर्द था, लोग अशांत थे, कि कब क्या होगा। उनके मुख्य मंडलों पर उदासी थी, आंखों में आंसू। महर्षि ने मुस्कुराते हुए कहा — “कौन – सी तिथि है आज ? कौन – सी घड़ी है इस समय ?”
पास खड़े एक व्यक्ति ने बताया कि तिथि कौन सी है ,समय क्या हुआ है।
महर्षि बोले — ” तो अब खिड़कियों को खोल दो ! बाहर की वायु को आने दो ! पंछी का मार्ग ना रोको ! मेरे पीछे आ जाओ सब लोग; गायत्री मंत्र का जाप करो !” और जब सब लोग जाप कर रहे थे तो महर्षि ने अंतिम सांस लेते हुए कहा—” तेरी इच्छा पूर्ण हो प्रभु !” इसके अतिरिक्त दूसरी कोई प्रार्थना नहीं की , कोई दूसरी याचना नहीं की।
राज़ी है हम उसी में, जिसमें तेरी रजा है।
ऐसे भी वाह वाह है  और वैसे भी वाह वाह है ।।
(एक अन्य अध्यात्म कथा भी आपके लिये प्रेरणा बन सकती है जिसका शीर्षक है निम्नोक्त है-) 

                         

                                       राज़ी तेरी रज़ा में

रणवीर को फांसी के दंड की आज्ञा हुई सेशन जज ने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा — ” इसे गले में रस्सी डालकर तब तक लटकाए रखा जाए , जब तक प्राण ना निकल जाए। एक कोलाहल मच गया हर ओर। लोग सहानुभूति लिए मेरे पास आने लगे — रोनी सूरत बना कर , उदास चेहरे लेकर। कभी – कभी आंखो में आंसू भरकर वे मेरे पास आते । मुझे हंसता हुआ देखकर आश्चर्य से कहते , ” तेरी छाती में ह्रदय है या पत्थर ?” तेरे पुत्र को फांसी की आज्ञा हो गई , उसकी मृत्यु उसके समक्ष खड़ी है और तू अब भी हंसता है ?”
तब मैं गंभीरता से कहता — ” मुझे अपने ईश्वर पर विश्वास है ! यदि मेरा कल्याण इस बात में है कि मेरा रणवीर मेरे पास वापस आ जाए तो संसार की कोई शक्ति उसे मार नहीं सकती । और यदि मेरा कल्याण इस बात में है कि वह मेरे पास ना आए तो फिर संसार की कोई शक्ति उसे बचा नहीं सकती । तब मैं रोऊँ किस लिए ?”
तुम्हारी चाही में प्रभु , है मेरा कल्याण।
मेरी चाही मत करो , मैं मूरख नादान।।

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