अध्यात्म कथा-9: सहनशीलता का अर्थ ही साधुता है

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महात्मा सुकरात बहुत बड़े विद्वान और दार्शनिक थे, सारा यूनान उनका आदर करता था, परन्तु उनकी धर्मपत्नी थी क्रोध की साक्षात मूर्ति। हर समय लड़ती थी वह, मीठा बोलना उसने सीखा नहीं था। प्रतीत होता था चीनी उसने कम खाई; सदा कुनैन ही खाती रही।
सुकरात को घर पर मौन बैठे देखती तो उनकी पत्नी चिल्लाना आरंभ कर देती —” हर समय चुप ही बैठे रहते हैं। कोई पुस्तक पढ़ते तो चिल्ला उठती कि आग लगे इन पुस्तकों को! इन्ही के साथ विवाह लर लेना था, मेरे साथ क्यों किया ?”
एक दिन सुकरात के कई शिष्य़ उनके घर आये. उनको आया देख कर सुकरात की पत्नी ने फिर उसी प्रकार बकना-झकना आरंभ कर दिया। सुकरात तो मौन रहे, किंतु उनके विद्यार्थियों ओर श्रद्धालुओं को बहुत बुरा लगा।
पत्नी ने इन्हें मौन देखा तो उसके क्रोध का पारा और भी चढ़ गया ,वह और भी ऊंची आवाज़ में बोलने लगी। सुकरात फिर भी चुप बैठे रहे। पत्नी ने तब क्रोध से पागल होकर मकान के बाहर पड़ा हुआ गंदा कीचड़ एक बर्तन में भरा, शीघ्रता से आकर सारा कीचड़ सुकरात के सिर पर डाल दिया।
तब सुकरात हंसकर बोले — “देवी, आज तो पुरानी कहावत अशुद्ध हो गई। कहावत है कि गरजने वाले बरसते नहीं। आज देखा कि जो गरजते हैं , वे बरसते भी हैं।”
सुकरात हंसते रहे, परन्तु उनका एक विद्यार्थी क्रोध में आ गया, वह चिल्लाकर बोला— ” यह स्त्री तो चुड़ैल है, गुरुदेव ये आपके योग्य बिलकुल नहीं है।”
सुकरात बोले — ” नहीं, यह मेरे ही योग्य है। यह ठोकर लगा -लगाकर देखती रहती है कि सुकरात कच्चा है या पक्का। इसके बार बार ठोकरें लगाने से मुझे पता तो लगता रहता है कि मेरे अंदर सहनशक्ति है या नहीं।”
पत्नी ने यह शब्द सुने तो झट उनके चरणों में गिर पड़ी। सहमी हुई सिसकती उनकी पत्नी बोली—” आप तो देवता हैं। मैंने आपको पहचाना नहीं।”
यह है तप की महिमा! तप और सहनशीलता से अंततोगत्वा मनुष्य को विजय प्राप्त होती है। बुरे व्यक्ति भी अपना स्वभाव बदल देते हैं।
(सुनीता मेहता)

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