अध्यात्म कथा -2: मानव जीवन गाथा

औरंगबेज का नौकर नहीं अब बलीराम ईश्वर के दास थे जिनका कोई भी कुछ बिगाड़ नहीं सकता था, खुद बादशाह औरंगजेब भी नहीं..

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औरंगजेब की राज्यसभा में एक दीवान थे वलीराम। मुकद्दमों की फाइल तैयार करते थे,अंत में राजा की लिखाई हुई अजय लिखकर राजा के हस्ताक्षर करा लेते थे।
प्रतिदिन राजसभा में आकर राजा को नमस्कार करते। नियम ये था कि जबतक राजा नमस्कारकरने वाले कि ओर देखकर उसे बैठने का संकेत न कर दे तब तक वह बैठता नहीं था खड़ा रहता था।
एक दिन वलीराम आये, नमस्कार किया। राजा ने उन्हें देखा नहीं , पर्याप्त समय तक खड़े रहे। मन में विचार आया कि यह क्या? तब वे राजा की सभा से चले आये और अभियोगों की फाइलें वहीं रख आए।
घर आकर मुनादी करने वालों को बुलाया और कहा— सारे नगर में घोषणा कर दो कि वलीराम ने अपने घर की प्रत्येक वस्तु,समस्त संपत्ति दान कर दी है, जिसको जिस वस्तु की आवश्यकता हो ,आकर ले जाये। “घोषणा करने वाले नगर में घोषणा करने लगे।
वलीराम स्वयं घर से उठकर जमुना किनारे चले गए। रेत पर जाकर लेट गए। थोड़ी देर पश्चात राजा ने राज्यसभा को आरंभ करने के लिए दृष्टि उठाई ,तो सब लोग उपस्थित थे पर वलीराम नहीं था।
राजा ने पूछा —“वलीराम कहाँ है ?”
दूसरे लोगों ने बताया —“महाराज! वह आया था,आपको नमस्कार किया,खड़ा रहा। आपने देखा नहीं,इसलिए फ़ाइलें रखकर चला गया।”
राजा ने कहा—“जाओ,उसे बुलाकर लाओ।”
बुलाने वाले गए तो देखा वलीराम के घर पर भीड़ लगी है, वलीराम है नहीं। पूछा तो पता लगा कि वलीराम ने अपना सबकुछ दान कर दिया है तुम्हे भी किसी वस्तु की आवश्यकता हो तो उठा कर ले जाओ।
राजा के दूत ने लौटकर यह समाचार सुनाया— वलीराम जमुना की रेत पर टांग पर टांग रखे लेटे हैं,आते नहीं।
राजा ने कहा —“उसे जाकर कहो कि महाराज बुलाते हैं।”
वलीराम ने आज्ञा सुनी तो बोले—“महाराज से कहो की बुलाते रहें, हम नहीं आ सकते।”
राजा को क्रोध आया, फिर हँस पड़े। स्वंय चल दिये,उस ओर जहां वलीराम लेटा था।उसके पास पहुंच गए।वलीराम उठा नहीं।
राजा ने पूछा —” वलीराम, ये पाँव कब से फैलाए?”
वलीराम ने कहा—” जबसे हाथ समेट लिए महाराज!”और मस्ती भरी वाणी में बोले :–
चे बन्दाये बन्दा बूदम व नज़रत न नवाखती।
अकुने कि कदम दरआँ बन्दा परवर निहादम बदीं दरम ताखती।
” जब तक मैं तेरा दास था, तू मेरी ओर आँख उठाकर देखता नहीं था। अब मैं ईश्वर का दास बना हूँ, तेरा धन और संपत्ति छोड दी है, तो तू स्वंय चलकर मेरे पास आया है। तेरे इस संसार में मुझे लेना क्या है?”
यह है विचार-शक्ति! राज्सभा में खड़े हुए वलीराम को एक धक्का लगा और उनके मन में जो एक विचार उत्पन्न हुआ उस विचार ने उनको कहां से कहां पहुंचा दिया।
(सुनीता मेहता)

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