Jagannath Puri Rathyatra: जगन्नाथ जी के मंदिर व रथयात्रा का महत्व

आज बारह जुलाई को संपन्न हुई है इस वर्ष की जगन्नाथ पुरीं रथयात्रा जिसकी परंपरा भी ऐतिहासिक है और माहात्म्य भी..

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सर्वविदित है कि उड़ीसा के जगन्नाथ पुरी का मंदिर विश्व प्रसिद्ध है और चार धामों में से एक भी | जो लोग चार धाम यात्रा को जाते हैं उनके लिये जगन्नाथ पुरी के दर्शन करना भी अनिवार्य होता है |

है धरती का बैकुंठधाम

हिंदू धर्म में जगन्नाथपुरी का बड़ा महत्व और इसकी महिमा का बखान किया गया है | इसे धरती का “बैकुंठधाम” भी कहा जाता है | इस मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण जी की मूर्ति श्री जगन्नाथ रूप मे विराजमान है | उनके साथ उनकी बहन सुभद्रा और बड़े भाई बलराम जी की मूर्ति भी मंदिर में विराजमान है | आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को जगन्नाथ की रथयात्रा मुख्य मंदिर से अढ़ाई किलोमीटर दूर “गुंडिचा” तक निकाली जाती है जहाँ श्री जगन्नाथ भगवान की मौसी का घर है | जगन्नाथ भगवान के साथ-साथ बहन सुभद्रा और बड़े भाई बलराम के भी रथ निकलते हैं | स्कन्द पुराण में भी इस रथयात्रा का उल्लेख किया गया है |

रथयात्रा का शुभारंभ

आज रथयात्रा मंदिर से प्रस्थान कर चुकी है गुंडिचा के लिये | सर्वविदित है कि अभी कोरोना काल का दौर चल रहा है | हाईकोर्ट ने इसे ध्यान में रखते हुए 144- की धारा लगा दी है और बस टीकाकरण किये हुए मंदिर के मुख़्य कर्मचारी और उचित नियमों का शुद्धता से पालन करने वाले पुजारी और पुरोहित को ही इस रथ यात्रा में शामिल होने की अनुमति दी है| सुप्रीम कोर्ट ने 23 जून को सावधानियों का पालन करते हुए यह उत्सव मनाने की अनुमति दे दी है | राज्य सरकार को भी रथयात्रा के दौरान एहतियात बरतने का आदेश जारी किया है | कुल मिलाकर पाँच सौ लोगों ही इस रथयात्रा का हिस्सा बन पायेगें| लोगों की भीड़ कम एकत्र होगी तो संक्रमण के खतरे की संभावना भी कम रहेगी |

मंदिर का इतिहास

पुरी धाम के जगन्नाथ मंदिर का उल्लेख स्कन्द पुराण में किया गया है | ये उड़ीसा के समंदर कीनारे स्थित है | जगन्नाथ पुरी मंदिर में भगवान जगन्नाथ श्रीकृष्ण अपनी बहन सुभद्रा और बड़े भाई बलभद्र ( बलराम) के साथ विराजमान हैं | तीनों की प्रतिमाएँ काष्ठ निर्मित हैं और यहाँ स्थापित है | परंपरा के अनुसार प्रत्येक 12 वर्ष में इन प्रतिमाओं को बदला जाता है |

रथयात्रा क्यों मनाई जाती है?

हर बात के पीछे कोई न कोई कहानी या मान्यताएँ अवश्य होती है | रथयात्रा शुरू होने के पीछे भी एक मान्यता है | एक बार श्री कृष्ण जी से बहन सुभद्रा ने द्वारका दर्शन की इच्छा व्यक्त की | छोटी बहन की इस इच्छा को पूरा करने हेतु भगवान ने उन्हें रथ पर पूरा नगर-भ्रमण करवाया | बस तभी से रथयात्रा की परंपरा शुरू हो गई | तब से ही आषाढ़ महीने की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को रथ यात्रा मनाई जाती है |

ऐसे निकलती है रथ यात्रा की झाँकी

यात्रा का शुभारंभ बलभद्र जी के रथ से होता है.उनके साथ बहन सुभद्रा और जगन्नाथ भगवान के रथ निकलते हैं | सबसे आगे बलभद्र का रथ होता है |उसके पीछे बहन सुभद्रा का रथ और अंतिम में भगवान जगन्नाथ का रथ होता है | सभी रथ काष्ठ निर्मित विभिन्न रंगों से सजे होते हैं | भगवान जगन्नाथ के रथ के तीन नाम हैं गरुड़ध्वज, कपिध्वज और नंदीघोष | ये 16 पहियों वाला रथ 13 मीटर ऊंचा होता है | ये रथ लाल या पीले रंग का होता है|

तालध्वज है बलराम जी का रथ

बलभद्र के रथ का नाम तालध्वज है | यह रथ 14 पहियों वाला है |बलराम जी का रथ महादेवजी का प्रतीक है | वासुदेव और सारथी मातलि इस रथ के रक्षक होते हैं | रथ पर ध्वजा होती है जिसे उनानी भी कहते हैं | इनके रथ का रंग हरा या लाल होता है |

देवदलन है सुभद्रा जी का रथ

भगवान कृष्ण की बहन सुभद्रा जी के रथ का नाम देवदलन है | ये रथ 12 पहियों का होता है |देवी दुर्गा का प्रतीक रथ पर अंकित किया जाता है |इसकी रक्षा का दायित्व जयदुर्गा व सारथी अर्जुन का है। इस रथ की ध्वजा को नदंबिक कहते हैं | ये रथ काला या नीले रंग के साथ लाल रंगका होता है |

श्रद्धालु खींचते हैं रथ

इन सभी रथों को श्रद्धालु रस्सी से खींचकर चलाते हैं | रथयात्रा में समूचे नगर का भ्रमण कर भगवान मंदिर से अढ़ाई किलोमीटर दूर गुंडिचा अपनी मौसी के घर जाते हैं अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ | गुंडिचा में सात दिन रुकने के पश्चातआठवें दिन वे मुख्य मंदिर के लिये प्रस्थान करते हैं | कुल नौ दिन के इस उत्सव को पुरी शहर में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है |

भक्तों की आस्था और विश्वास

वो भक्त जो भगवान जगन्नाथ के दर्शन करते हुए, भगवान के रथ को नगर के दुर्गम और कठिन मार्गों से होते हुए भ्रमण कराते हैं और रथ खींचते हैं, ऐसा माना जाता है कि उन्हें मृत्यु के पश्चात विष्णुधाम प्राप्ति होती हैं|

पुराणों में है वर्णन यात्रा का

पवित्र स्कन्द पुराण, पद्म पुराण,नारद पुराण और ब्रहम पुराण में भी भगवान की इस शुभ यात्रा का महत्व और वर्णन है | इन पुराणों के अनुसार इस जगन्नाथ रथ यात्रा में जो भी भक्त शामिल होकर गुंडिचा नगर तक जाता है उसे सभी पापों से मुक्ति मिलती हैं और मृत्योपरांत उसे ईश कृपा से मोक्ष की प्राप्ति भी होती हैं |
इसके अलावा मान्यता ये भी हैं कि, गुंडिचा मंडप में मुख्य रूप से दक्षिण दिशा से आते हुए रथ पर विराजमान भगवान के दर्शन करने पर भक्तों को लंबी आयु का सौभाग्य प्राप्त होता है |

आश्चर्यजनक तथ्य भी जु़ड़े हैं मंदिर के साथ

आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि जगन्नाथपुरी मंदिर की रसोई दुनिया की सबसे बड़ी रसोई है जहाँ 752 चूल्हों पर भोजन पकाया जाता है | इन चूल्हों पर पके भोजन को प्रसाद या भोग कहा जाता है जो अमृत तुल्य होता है पौष्टिक,सात्विक और स्वादिष्ट भी |
रथयात्रा के दौरान यहाँ मंदिर में नौ दिनं तक चूल्हे ठंडे हो जाते हैं| गुंडिचा मंदिर में भी 752 चूल्हों की ही रसोई आपको देखने को मिलेगी है, जो जगन्नाथ भगवान की रसोई की ही कार्बन कॉपी है | रथ यात्रा के इस महाउत्सव के दौरान जब भगवान गुंडिचा में होते हैं तब भोग गुंडिचा की ही रसोई में बनता है |

कोलकाता शहर में रथयात्रा की धूम

आपको बता दे कि रथयात्रा का उत्सव पश्चिम बंगाल कोलकाता शहर में भी मनाया जाता है | छोटे बच्चे लकड़ी के रथों में जो दो या तीन तल्ले का होता है उसमें भगवान जगन्नाथ,बलभद्र और सुभद्रा बहन की मूर्तियाँ क्रमश: बैठाते हैं |पूरे रथ को फूलों और आम पत्तों से सजाया जाता है | और रस्सी से इस रथ को खींचकर बच्चे इसे रास्ते पर घुमाते हैं और अपनी श्रद्धा और खुशी व्यक्त करते हैं |

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