Navratri 2018: नवरात्रि के पहले दिन मां शैल पुत्री की आराधना से मिलेगा विशेष फल

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Navratri 2018: नवरात्रि के पहले दिन मां शैल पुत्री की आराधना से मिलेगा विशेष फल

नवरात्रि यानी माता के आशीर्वाद और कृपा से मनोकामनाएं पूर्ण होने वाला महापर्व. नवरात्रि में मां की भक्ति से मिले फल की वजह से बेरोजगारों को नौकरी, बीमारों को निरोगी काया, आर्थिक कष्टों से मुक्ति, कारोबार की बाधाओं का निवारण और तमाम परेशानियों, तनाव, असफलताओं से छुटकारा मिल जाता है. यही वजह है कि सनातन धर्म के इस विशिष्ट शक्ति पर्व का विशेष महत्व है और भक्तजन नवरात्रि का शिद्दत से इंतजार करते हैं.
नवरात्र यानि नौ दिनों तक मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की आराधना और पूजा का पर्व. मां भगवती की पूजा से समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. नवरात्र के पहले दिन मां दुर्गा के रूप शैल पुत्री की पूजा की जाती है. शैलपुत्री का अर्थ होता है पहाड़ों की पुत्री.
ये नौ दिनों तक चलने वाला शक्ति का महापर्व है. माता को प्रसन्न करने के लिए भक्तजन व्रत रखते हैं और शास्त्र सम्मत विधि के मुताबिक पूजा करते हैं. नवरात्र की सुबह से ही मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ना शुरू हो जाती है. माता के जयकारे के साथ सुबह की शुरुआत पूरे नौ दिनों तक उल्लास और उमंग बरकरार रखती है. मां के भक्तों को माता की अनुकंपा से विशेष लाभ होता है. विशेष मुहुर्त में विशेष पूजा-पाठ से भक्तों की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. पहले दिन की पूजा से मां के नौ रूपों का आशीर्वाद मिल जाता है और भक्तों के कष्टों को मां हर लेती हैं.
लोग किसी न किसी मनोकामना की इच्छा कर मां के नौ रूपों की भक्ति और पूजा करते हैं. इस दौरान वो व्रत, जाप और हवन करते हैं. खास मुहुर्त में माता को प्रसन्न करने के प्रयासों से माता की निश्चित रूप से कृपा प्राप्त होती है. घर में समृद्धि का वास होता है तो शांति और बरकत बढ़ती है.
माता शैलपुत्री की पूजा से सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती है. माता शैलपुत्री को हिमालय की बेटी कहा जाता है. मां शैलपुत्री को करुणा और ममता की देवी माना जाता है. शैलपुत्री प्रकृति की भी देवी हैं. उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल है. शैलपुत्री का वाहन वृषभ यानी कि बैल है.
पौराणिक कथा कहती है कि मां शैलपुत्री अपने पिछले जन्म में भगवान शिव की अर्धांगिनी (सती) और दक्ष की पुत्री थीं. एक बार जब दक्ष ने महायज्ञ का आयोजन कराया तो इसमें सारे देवताओं को निमंत्रित किया गया लेकिन भगवान शिव को निमंत्रण नही दिया गया. उधर सती यज्ञ में जाने के लिए व्याकुल हो रही थीं. शिवजी ने उनसे कहा कि सारे देवताओं को निमंत्रित किया गया है लेकिन उन्हें नहीं; ऐसे में वहां जाना उचित नहीं है. सती का प्रबल आग्रह देखकर भगवान भोलेनाथ ने उन्हें यज्ञ में जाने की अनुमति दे दी.
सती जब घर पहुंचीं तो वहां उन्होंने भगवान शिव के प्रति तिरस्कार का भाव देखा. दक्ष ने भी उनके प्रति अपमानजनक शब्द कहे. इससे सती के मन में बहुत पीड़ा हुई. वे अपने पति का अपमान सह न सकीं और यज्ञ की अग्‍नि से स्वयं को जलाकर भस्म कर लिया. इस दारुण दुःख से व्यथित होकर शंकर भगवान ने उस यज्ञ को विध्वंस कर दिया. फिर यही सती अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मीं और शैलपुत्री कहलाईं.

शैलपुत्री की पूजा का विधान
– नवरात्रि के पहले दिन स्‍नान करने के बाद स्‍वच्‍छ वस्‍त्र धारण करें.
– पूजा के समय पीले रंग के वस्‍त्र पहनना शुभ माना जाता है.
– शुभ मुहूर्त में कलश स्‍थापना करने के साथ व्रत का संकल्‍प लिया जाता है.
– कलश स्‍थापना के बाद मां शैलपुत्री का ध्‍यान करें.
– मां शैलपुत्री को घी अर्पित करें. मान्‍यता है कि ऐसा करने से आरोग्‍य मिलता है.
– नवरात्रि के पहले दिन शैलपुत्री का ध्‍यान मंत्र पढ़ने के बाद स्तोत्र पाठ और कवच पढ़ना चाहिए.
– शाम के समय मां शैलपुत्री की आरती कर प्रसाद बांटें.
– फिर अपना व्रत खोलें.

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