Navratri: आ गई शरद नवरात्रि

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आ गई है फिर से शारदीय नवरात्र की बेला. लोगों में उत्साह और जोश दिख रहा है. नवरात्रि में माँ दुर्गा की उपासना के लिये लोग पूजन-सामग्री, माँ के लिये सुंदर वस्त्र,, लाल चुन्नी खरीद रहे हैं. कोविड-19 जैसी महामारी ने पूरे विश्व की जड़ें हिला दी हैं. ऐसा नही है कि पूर्वार्द्ध में महामारियाँ नही फैली. प्लेग, चेचक, हैजा, काली बुखार ये सब बीमारियों भी पहले असाध्य रोग हुआ करती थी परन्तु वैज्ञानिक उपलब्धियों  ने इन्हें साध्य बनाया.  शनै:-शनै: कम होते इस बीमारी के प्रभाव ने अब जन-समुदाय में फिर से उल्लास व उमंग भर दी है.
इस बार भी नवरात्रि को धूमधाम से मनाने के लिये लोग तैयारियों में जुटे हैं. भारत वर्ष की यह विशेषता रही है कि यहाँ जन-मानस संकट की परिस्थितियों  में भी उतना ही सकारात्मक,सजग और उत्साहित रहता है अपने हिंदू धर्म के त्योहारों के प्रति.

कब से शुरू हो रही है नवरात्रि

इस साल शारदीय नवरात्रि का आरंभ बृहस्पतिवार 7 अक्टूबर(2021) से हो रहा है. आश्विन शुक्लपक्ष की प्रतिपदा को कलश स्थापना की जाती है. इसलिये इसे “कलश-स्थापना” या “घट-स्थापना” भी कहा जाता है.
15 अक्टूबर को विजया दशमी है. इन नौ दिनों में माँ दुर्गा  के नव रूपों की उपासन की जाती है. ये नौ रूप है—–शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा,कूष्माण्डा,स्कन्दमाता,कात्यायनी,कालरात्रि,महागौरी,सिद्धिदात्री

क्यों मनाई जाती है नवरात्रि 

असुरों के नाश पर मना जाने वाले इस पर्व को मनाने के पीछे बहुत सी पौराणिक  कथाएं प्रचलित हैं जिसमें इस कथा का महत्व अधिक माना जाता है.  शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से 9 दिनों तक देवी के आह्वान पर असुरों के संहार के लिए माता पार्वती ने  प्रतिपदा से 9 दिनों तक आह्वान कर अपने ही अंश के नौ रूपों को उत्पन्न किया. देवताओं ने उन्हें शस्त्रों की शक्ति से संपन्न किया और तब देवी ने असुरों का वध किया. यह पूरी घटना आश्विनशुक्ल पक्ष प्रतिपदा से आरंभ होकर नौ दिनों तक चलती रही. इसलिए  नवरात्रि मनाई जाती है.

विशेष शुभ योग

इस बार बड़े ही शुभ योग बन रहे हैं. बृहस्पतिवार के दिन चित्रा नक्षत्र है जिससे चर योग बन रहा है और इस योग में शुरू होने वाले नवरात्रे अति शुभ व उत्तम माने जाते हैं. इस बार पाँच रवियोग से सौभाग्य योग और वैधृति योग बन रहा है जो कि नवरात्रि के गुरूवार  को प्रारंभ होने के कारण माना गया है.  इसलिए इस बार की नवरात्रि  बहुत शुभ मानी जा रही है.

माँ दुर्गा का आगमन और प्रस्थान 

ज्योतिष शास्त्र  के अनुसार इस बार माँ दुर्गा  का आगमन डोली पर होगा. ऐसा माना जाता है कि डोली पर  आगमन का अर्थ विश्व में कुछ नया होने की संभावना जताता है. कहा जाता  है कि डोली में विराजमान होकर मां दुर्गा का आगमन नारी शक्ति का सूचक है. साथ ही साथ प्राकृतिक आपदाएँ,जन धन का नुकसान,राजनितिक संकट, सत्ता परिवर्तन  जैसे बुरे प्रभाव भी दिखेगें. दुर्गा माँ का प्रस्थान  हाथी पर होगा जौ सुख-संपत्ति देकर जायेगा.

घट- स्थापना का शुभ मुहुर्त

7 अक्टूबर 2021 बृहस्पतिवार आश्विन शुक्ल पक्ष  की प्रतिपदा  कलश  की स्थापना कर नवरात्रि  का आरंभ किया जाता है.  इस दिन माँ दुर्गा के नौ रूपों  में से माँ शैलपुत्री की आराधना की जाती है.
अब बात करते हैं शुभ मुहूर्त की. ज्योतिषाचार्य के गणित के अनुसार आश्विन को प्रतिपदा तिथि 7 अक्टूबर  दिन गुरूवार को 3:28 मिनट तक ही है. इसलिये सवेरे से दोपहर तीन बजकर 28 मिनट(प्रतिपदा) के बीच आप कभी भी कलश की स्थापना कर सकते हैं. विभिन्न लगनों  में आप कलश-स्थापना कर सकते हैं.
 1) प्रातः 06: 10 मिनट से  7सायं 6:40 मिनट तक ( कन्या लग्न-स्वभाव लग्न में)
2) 11: 14 मिनट से दिन में 11: 19 मिनट तक (धनु लग्न-द्विस्भाव लग्न)
3) अभिजित मुहुर्त  में सवेरे 11: 36 मिनट से-12 : 24 मिनट तक.
 यही वो तीन मुहूर्त  हैं जो कलश स्थापना के लिए सर्वोत्तम हैं.

कलश-पूजा की विधि

घट स्थापना से नवरात्रि  की पूजा आरंभ होती है. माँ दुर्गा के नौ रूपों की उपासना में नौ दिनों तक यह पूजा चलती है.  इस बार नवरात्रि  अाठ दिनों की होेगी क्योंकि शनिवार के तृतीया और चतुर्थी  तिथि एक साथ पड़ रही है. इससे एक तिथि का क्षय हो रहा है. 15 अक्टूबर  के दशमी है.  पूजा के उपरान्त माँ दुर्गा  का विसर्जन  किया जाता है.
बताए गए मुहूर्त के अनुसार लकड़ी की चौकी या पाटे पर लाल वस्त्र बिछाकर दुर्गा जी की तस्वीर को माल्यार्पण करें.  कलश दुर्गा  माँ  की फोटो के बाँयी ओर तथा दीपक दायीं ओर होना चाहिए. मिट्टी के बड़े पात्र में मिट्टी या रेत भरकर उसमें जौ के दाने बो दें. फिर थोड़ा सा पानी छिड़क कर ऊपर कलश स्थापित करें. कलश पर  मोली लपेट कर भीतर जल, गंगाजल, सुपारी, बताशा, चावल और एक सिक्का डालें.
अब आम पत्तों को कलश पर रखकर ऊपर चुनरी में नारियल लपेट कर रख दें, फूलमाला चढ़ाएँ. एक प्लेट में साथिया बनाकर, चावल रखकर ऊपर दीपक  रखकर जलाएँ. सर्वप्रथम ऋद्धि-सिद्धि कर्ता विध्नहर्ता श्री गणेश के साथ अन्य देवताओं का आह्वान करते हुए मां दुर्गा का ध्यान करें. दुर्गा सप्तशती के एक-एक अध्याय का नियमित रूप से पाठ  करें. सुबह-शाम दुर्गा जी की आरती  कर भोग लगाए. दुर्गा-चालीसा करें. निरोगी काया, सुख-समृद्धि  और सौभाग्य के लिये “दुर्गा-सप्तशति” के इस मंत्र का जाप करें..
“देहि सौभाग्यंमारोग्यं देहिमे परमं सुखं रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि”
अष्टमी या नवमी  जिस दिन हो उस दिन माताजी  की कड़ाही  कर नौ कन्या  जिमाएँ. कई लोग  अष्टमी  का व्रत  भी रखते हैं और कुछ लोग “अड़ाना”  भी करते हैं (एक अनाज पर रह कर या नमक  न खा कर).  इस बार 15 अक्टूबर को दशहरा है.  पूजा के पश्चात  माँ दुर्गा  की यदि प्रतिमा  हो तो धूम-धाम  से विसर्जन करें.

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