परख की कलम से: महानायक हैं श्री राम हर युग के, हर शताब्दी के !!

ब्रम्हान्ड के महानायक हैं मर्यादापुरुषोत्तम श्री राम..और वास्तव में उनका ही जीवन था संदेश इस मानवता के लिये सदियों से सदियों तक..

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विश्व को मानव सभ्यता देने वाला सूर्यवंश, विश्व का सबसे शक्तिशाली साम्राज्य रघुवंश और सबसे समृद्ध नगरी अयोध्या। दुनिया भर के ऐशो आराम और भोग विलास राम को जन्म के साथ ही विरासत में मिल चुके थे, उन्हें कुछ करने की आवश्यकता ही नही थी।
लेकिन महान पिता, तीनो माताएं और गुरु वशिष्ठ के संस्कारों ने एक ऐसे चरित्र का निर्माण कर दिया जिसने देश, धर्म और जाति से परे एक अद्वितीय व्यक्तित्व हमारे सामने प्रस्तुत किया।
धर्मराज युधिष्ठिर से लेकर छत्रपति शिवाजी महाराज तक लगभग हर बड़े राजा ने रघुकुल राज को ही अपना आदर्श माना है। राम महज भगवान विष्णु के अवतार नही है वे एक संपूर्ण मानव है, सुख दुख शोक हर्ष कोई भी घड़ी उन्हें और उनके भावो को बदल नही पायी।
जिस आयु में राजकुमारो को नर्तकियों से फुर्सत नही होती थी उस आयु में राम अपने भाइयों समेत दिन की शुरुआत पिता के आशीर्वाद के साथ करते थे और अंत उनके पैर दबाने के साथ। उन्हें सिंहासन की कोई लालसा नही है लालसा है तो बस जगत कल्याण की, वे जानते है कि अपने महान पूर्वजो की महान परंपरा का निर्वहन वे सिंहासन पर बैठे बिना भी कर सकते है।
शुरुआत ताड़का वध से होती है, उनकी नजर में सिर्फ दो शब्द है सत्य और असत्य। वे एक स्त्री का वध बड़ी सरलता से करते है क्योकि उनके लिये कोई लिंग, कोई जाति और कोई वर्ग छोटा बड़ा नही है यदि आप मानवता के बाधक है तो बस राम के शत्रु है।
जब मारीच और सुबाहु विश्वामित्र का यज्ञ भंग करने आते है तब वो मारीच का वध नही करते बल्कि उसे यज्ञ भूमि से बाहर फेक देते है क्योकि वे अहिंसावादी है, लेकिन मारीच की दुर्दशा देखकर भी सुबाहु कुछ समझ नही पाया, उसके बाद राम ने उससे कोई अपेक्षा नही रखी बल्कि सीधे यमलोक भेज दिया। हिंसा कब करनी है और कब नही यह राम से बेहतर कोई नही सीखा सकता।
उनके मंदिर को लेकर कई दंगे हुए मगर जब पिता के वचन के लिये उन्हें महल छोड़ना पड़ा तो उनके चेहरे पर एक शिकन नही आयी। वे चाहते तो बाली की सहायता से भी रावण को बड़ी आसान शिकस्त दे सकते थे मगर विपरीत परिस्थिति में भी उन्होंने धर्म नही छोड़ा। धर्म सुग्रीव के साथ था क्योकि वे दुष्ट बाली से पीड़ित थे, अधर्मी का वध अधर्म से करके उन्होंने धर्मरक्षा की और किष्किंधा का कल्याण किया।
शबरी जो कि शुद्र समुदाय से थी, जब उसने अपने झूठे बैर राम को दिये तो उन्होंने ना उसका वर्ण देखा ना ही उसकी हैसियत। देखा तो सिर्फ अपने लिये प्रेम और समर्पण और झूठे बैर भी सहर्ष स्वीकार किये।
राजपाठ के बाद सीता जी ने अयोध्या छोड़ने का निर्णय लिया, माँ सीता का वैराग्य जीवन आरंभ हो चुका था तो यहाँ राम ने भी महल के अंदर गद्देदार पलंग और आसनो का त्याग कर दिया। विशाल भारत का सम्राट महल के अंदर घास बिछाकर सोने लगा।
कुल मिलाकर राम एक व्यक्ति से अधिक एक अध्याय है जो मानवता का दर्पण है। दुर्भाग्य से भारतीय इतिहास का यह किरदार आज राजनीति के लिये प्रयोग हो रहा है, लेकिन राम को किस धर्म से जोड़ा जा सकता है?
बड़े बड़े हिन्दू राजवंशो के आराध्य राम है, 1857 की क्रांति में मुस्लिम बेगम हजरत महल की पुकार राम है, गाँधीजी के सपनो के भारत की नींव रामराज्य है तो अल्लामा इकबाल के लिये इमाम ए हिन्द राम है। राम की पूजा कई धर्मो में हो रही है बल्कि वे स्वयं मानवीय बंधनो से दूर आज भी प्रतीक्षा कर रहे है कि मानव उनके पदचिन्हों पर चलते हुए आतंकवाद रूपी रावण का, भ्रष्टाचार रूपी मेघनाथ का और हत्या बलात्कार रूपी खर दूषण का वध करे और स्थापना करे एक श्रेष्ठ मानव सभ्यता की। यही राम की असली भक्ति होगी और राम राज्य की शुरुआत भी।

2 COMMENTS

  1. बहुत सुंदर जानकारी|सार्थक आलेख श्रीराम की महिमा पर|बहुत बधाई और शुभकामनाएँ आपको|

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