कुरु सभा में परशुराम की दुर्योधन को चेतावनी

कुरु सभा मे भगवान परशुराम का भाषण, यह उसी सभा का भाषण है, जिसमे कुरुओ द्वारा श्रीकृष्ण को बंदी बनाने का प्रयास हुआ था..

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कुरु सभा मे भगवान परशुराम का भाषण, यह उसी सभा का भाषण है, जिसमे कुरुओ ंद्वारा श्रीकृष्ण को
बंदी बनाने का प्रयास हुआ था …
जिस सभा मे दुर्योधन ने भगवान श्रीकृष्ण को बंदी बनाने का प्रयास किया था, उस सभा मे स्वयं परशुराम जी भी थे । भगवान श्रीकृष्ण के भाषण के तुरंत बाद परशुराम जी का भाषण शुरू हुआ …
परशुराम जी द्वापरकाल तक बूढ़े बुजुर्गों की श्रेणी में आ चुके थे, इस कारण उनका सम्मान भी अधिक था … महर्षि परशुराम जी ने धृतराष्ट्र , दुर्योधन आदि को पहले एक पौराणिक कथा सुनाई, उसके बाद अपनी बात रखी। .
यह कथा थी, #सार्वभौम_सम्राट #दम्भोद्धव की, इस क्षत्रिय सम्राट ने पूरी त्रिलोकी जीत ली थी यह महारथी दिन रात सभी ब्राहम्णो और क्षत्रियो दोनो को परेशान करता, की “कोई है मुझसे लड़ने वाला ?? इस प्रकार का दम्भी होने के कारण उनके सेनापति क्षत्रियो एवं ब्राह्मणो ने राजा को मना भी किया, की इतना अहंकार उचित नही ..
लेकिन राजा थे, की अपनी आदतों से बाज ही नही आते थे, हमेशा ब्राह्मणो और क्षत्रियो को ललकारना की बताओ है कोई मेरे बराबर योद्धा?
एक दिन किसी वेदपाठी ब्राह्मण ने क्रोध से तिलमिलाकर राजा को कह दियाहै दो पुरुष ऐसे … जो पल भर में तुम्हारा घमण्ड तोड़ सकते है …
राजा ने ब्राह्मण से कहा … कौन है तो कहाँ रहता है ?? उनके नाम क्या है ?
भूपाल हमने सुना है, की वह नर एवं नारायण नामक दो तपस्वी है ..ओर इस समय मनुष्यलोक में ही है, तुम उन्ही के साथ युद्ध करो …
सुना है की यह दोनो ऋषि गंधमादन पर्वत के पास ऐसी घोर तपस्या कर रहे है जिसका वाणी द्वारा वर्णन नही हो सकता ..
राजा को तो बस लड़ना था ! वह उन दोनों ऋषियों की ख़ौज करते हुए, गंधमादन पर्वत तक पहुंचा ऐसी विशाल सेना भी साथ ले ली नारदजी तक कहते है, इसका तो वर्णन करना भी कठिन है …
राजा गया, देखा कि उन दोनों ऋषियों के शरीर कंकाल की तरह बने हुए है ओर मात्र सांस लेने जितनी ताकत उनमें है …
राजा उन ऋषियों के पास गया सर्वप्रथम प्रणाम किया चरण स्पर्श किये … सर्वप्रथम उन दोनों ऋषियों का कुशल समाचार पूछा ..नर नारायण ने भी कंद मूल देकर राजा का स्वागत किया …
राजा ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए नर नारायण से कहा …मेने सम्पूर्ण पृथ्वी जीत ली है …सभी शत्रुओं का संघार कर डाला जीवन भर युद्ध मे बिताया क्षत्रिय था, तो बचपन भी युद्ध के मैदान में ही गुजरा ! आज मेरा एक भी शत्रु नही है, किसी की हिम्मत नही है, की मेरे सामने सिर उठा सकें ओर यही अकेलापन मुझे डालेगा …मैं चाहता हूं, मेरे शत्रु हो, जो मुझसे युद्ध करें ..
नर नारायण मुस्कुराते हुए बोले ! हमारा यह आश्रम क्रोध एवं मोह से परे है । आप कहीं और जाकर युद्ध की अभिलाषा पूर्ण कर सकते, हम दोनों तो निर्बल सन्यासी है, हम कहाँ युद्ध जानते है ?
लेकिन राजा नही माना नर नारायण को ललकारता ही रहा …
अचानक नर को क्रोध आ गया … उन्होंने एक मुट्ठी सिंक हाथ मे लेते हुए कहा अरे ओ युद्ध चाहने वाले क्षत्रिय आओ करो मुझसे युद्ध … अपनी भारी सेना को तैयार कर लो अपने कवच बांध लो तेरे पास जितने साधन है, वह सब जुटा ले आज तेरी युद्ध की सभी इच्छाएं खत्म कर देता हूँ ….
राजा ने भयंकर आक्रमण सेनासहित नर पर कर दिया नर ने मात्र एक ही अस्त्र का प्रयोग किया जिसका निवारण करना मुश्किल था ! उन्होंने एषीकाअस्त्र का प्रयोग किया ! नर की सिंक ने ही सभी सैनिकों के आंख नाक कान बिंध डाले ….
समूचे सैनिकों को एक ही पल में बंदी बना देख राजा दम्भोद्धव नर नारायण के चरणों मे गिर पड़ा, भगवान मेरा कल्याण हो ….
नर नारायण ने भी राजा को गले लगा लिया ।
परशुराम जी ने धृतराष्ट्र एवं दुर्योधन से कहा *महाराज वह नर और नारायण ऋषि ही श्रीकृष्ण और अर्जुन है । अकेला अर्जुन(नर) ही समस्त कौरव सेना को एक पल में बिंध सकता है ..भगवान जनार्दन( नारायण) श्रीकृष्ण तो उनसे भी बढ़कर है ।”
धृतराष्ट्र अगर तुम चाहते हो, की तुममें ओर हममें बैर न् हो, तो अर्जुन से संधि कर लो, उन्हें उनका इंद्रप्रस्थ लौटा दो ! नर नारायण ने जैसे दम्भोद्धव को गले लगाया उसी तरह अर्जुन कृष्ण भी दुर्योधन को गले लगा लेंगे ….
इस तरह कुरु सभा मे परशुराम जी का भाषण पूरा हुआ ओर वे महेंद्रगिरी पर्वत पर लौट गए !
किन्तु दुर्योधन तो कुबुद्धि था, महाभारत करवा के ही माना और सर्वनाश हो गया ।

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