राजा को भी क्षण में रंक करने में समर्थ हैं शनिदेव

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आज शनिवार है जो शानिदेव का दिन है। आज हम इन्ही कर्मफल दाता शानिमहाराज की महिमा का गुणगान करेगें! राजा को भी क्षण में रंक कर देने वाले शनिदेव के विषय में प्रस्तुत है ये महत्वपूर्ण जानकारी:

शनिदेव का पूर्ण परिचय

शनिदेव सूर्यदेव और छाया के पुत्र हैं। सूर्य समस्त ग्रहों के राजा हैं तो उनके पुत्र युवराज शनिदेव न्यायाधीश हैं।
शनिदेव का जन्म ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या को हुआ था इसीलिए शनिवार को पड़ने वाली अमावस्या (शनिचरी अमावस्या) शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए बहुत शुभ मानी जाती है ।
शनि का रंग काला, अवस्था वृद्ध, आकृति दीर्घ, लिंग नपुंसक है ।
शनि के चार हाथों में बाण, वर, शूल और धनुष है । उनका वाहनगिद्ध है ।
शनि का गोत्र कश्यप व जाति शूद्र है ।
वे सौराष्ट्र के अधिपति हैं ।
शनिदेव को मन्द, शनैश्चर, सूर्यसूनु, सूर्यज, अर्कपुत्र, नील, भास्करी, असित, पंगु, क्रूरलोचन, छायात्मज आदि नामों से जाना जाता है।
शनिदेव का वार शनिवार, धातु लोहा, रत्न नीलम, उपरत्नजमुनिया या लाजावर्त, जड़ी बिछुआ, बिच्छोलमूल (हत्था जोड़ी) व समिधा शमी है।
शनि का आधिपत्य मकर और कुम्भ राशि तथा पुष्य, अनुराधा एवं उत्तराभाद्रपद नक्षत्र पर है ।
शनि वायुतत्त्व प्रधान ग्रह है ।
अंकज्योतिष के अनुसार प्रत्येक महीने की 8, 17, 26 तारीख के स्वामी शनिदेव हैं ।
हस्तरेखाशास्त्र के अनुसार हथेली में मध्यमा ऊंगली के नीचे का स्थान शनि का माना गया है ।
शनिदेव तीस महीने (ढाई वर्ष तक) एक राशि में रहते हैं । सब राशियों को पार करने में इन्हें तीस वर्ष लग जाते हैं। अत: एक बार साढ़ेसाती आने पर व्यक्ति 30 वर्षों के बाद ही दुबारा शनिग्रह से प्रभावित होता है ।
जब शनि जन्मराशि से 12, 1, 2, स्थानों में हो तो साढ़ेसाती होती है । यह साढ़े सात वर्ष तक चलती है । यह समय बहुत कष्टदायक होता है ।
जब शनि जन्मराशि से चौथे या आठवें हों तो ढैया होती है, जो ढाई वर्ष चलती है । यह समय भी कष्टकारक होता है।
शनिदोष की शान्ति के लिए शनिवार को काले उदड़, तिल, तेल, नीलम, कुलथी, भैंस, लोहा, काले वस्त्र, छाता, जूता, कम्बल व दक्षिणा का दान दीन-हीन गरीब या भडरी को किया जाता है ।
शनिग्रह का शरीर में प्रभाव घुटनों से पिंडली तक रहता है ।
शनि के प्रभाव से शरीर में होने वाले रोग हैं—पक्षाघात, हाथ-पैरों का कांपना, मिर्गी, स्नायुरोग, गठिया, जोड़ों व घुटनों में दर्द, दांत के रोग, जांघ व पिंडलियों के रोग, कैंसर, वातरोग, टी. बी., सूजन, बार-बार ऑपरेशन होना, कृमि आदि ।

शनि शिंगणापुर में है मन्दिर

महाराष्ट्र के नासिक जिले में शिरड़ी के पास शनिदेव का प्रसिद्ध मन्दिर शनि शिंगणापुर है । वहां शनिदेव की प्रतिमा का कोई आकार नहीं है; क्योंकि वह पाषाणखण्ड (पत्थर की शिला) के रूप में शनिग्रह से उल्कापिंड के रूप में प्रकट हुई है । इस शनि-स्थान के निश्चित क्षेत्र में कोई भी व्यक्ति चोरी या अन्य अपराध नहीं कर सकता । यदि भूल से अपराध कर ले तो उसे इतना कठोर दण्ड मिलता है कि उसकी सात पीढ़ियां भी याद रखें । इसीलिए इस स्थान पर कोई व्यक्ति अपने मकान या दूकान में ताला नहीं लगाता । यहां पर मकानों में दरवाजे तक नहीं हैं ।
शनिदेव का एक और प्रसिद्ध मन्दिर वृन्दावन के पास कोकिला वन में है ।
शनि से प्रभावित व्यक्ति राजनेता, जेलर, वकील, दलाल, न्यायाधीश, मजदूर, संन्यासी, तान्त्रिक, उपदेशक, अध्यात्मिक रुचि रखने वाले व यन्त्रविद्या जानने वाले इंजीनियर आदि होते हैं ।
शनि का सम्बध नियम, नैतिकता व अनुशासन से है । इनकी अवहेलना करने से शनि कुपित हो जाते हैं ।
शनिदेव की दृष्टि में क्रूरता उनकी पत्नी के शाप के कारण है ।
नवग्रहों में शनि को दण्डनायक व कर्मफलदाता का पद दिया गया है । यदि कोई अपराध या गलती करता है तो उनके कर्मानुसार दण्ड का निर्णय शनिदेव करते हैं । वे अकारण ही किसी को परेशान नहीं करते हैं, बल्कि सबको उनके कर्मानुसार ही दण्ड का निर्णय करते हैं और इस तरह प्रकृति में संतुलन पैदा करते हैं ।

ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार

शनि ने माता पार्वती को बताया कि मैं सौ जन्मों तक जातक को उसकी करनी का फल भुगतान करता हूँ । एक बार जब विष्णुप्रिया लक्ष्मी ने शनि से पूछा कि ‘तुम क्यों जातकों की धन हानि करते हो, क्यों सभी तुम्हारे प्रभाव से प्रताड़ित रहते हैं ?’ शनिदेव ने उत्तर दिया—‘उसमे मेरा कोई दोष नही है, परमपिता परमात्मा ने मुझे तीनो लोकों का न्यायाधीश नियुक्त किया हुआ है, इसलिये जो भी तीनो लोकों के अंदर अन्याय करता है, उसे दंड देना मेरा काम है ।’

शनि की क्रूर पीड़ा भोगने वालों के कुछ पौराणिक उदाहरण

—जिस किसी ने भी शनि की दृष्टि में अपराध किया है, उनको ही शनि ने दंड दिया, चाहे वह भगवान शिव की अर्धांगिनी सती ही क्यों न हों ! सीता का रूप रखने के बाद भगवान शिव से झूठ बोलकर सती ने अपनी सफ़ाई दी और परिणाम में उनको अपने ही पिता के यज्ञ में हवनकुंड मे जल कर मरने के लिये शनिदेव ने विवश कर दिया ।
—शनिदेव की क्रूर दृष्टि पड़ने से गणेशजी का मस्तक धड़ से अलग हो गया और वे गजमुख हो गए ।
—पांडवों पर जब शनि की दशा आई तो द्रौपदी की बुद्धि भ्रमित हुई और उसने दुर्योधन से गलत बात कह दी । इसके परिणामस्वरूप पांडवों को वनवास भोगना पड़ा ।
—शनिदशा आने पर प्रकाण्ड विद्वान रावण की मति मारी गयी । सीताजी का हरण करने से वह परिवार सहित नष्ट हो गया ।
—राजा विक्रमादित्य पर शनिकोप हुआ तो उन्हें तेली के घर कोल्हू चलाना पड़ा ।
—शनिदशा के कारण राजा हरिश्चन्द्र का परिवार बिछुड़ गया और उन्हें श्मशान में चाण्डाल की नौकरी करनी पड़ी।
—राजा नल व दमयन्ती को भी शनिदशा के कारण दर-दर भटकना पड़ा ।
▪️बाल्यकाल से ही शनिदेव भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त रहे हैं । इसलिए जो लोग पुराणों की कथा सुनते हैं, इष्टदेव की आराधना करते हैं भगवान के नाम का जप करते हैं, तीर्थों में स्नान करते हैं, किसी को पीड़ा नहीं पहुंचाते हैं, सबका भला करते हैं, सदाचार का पालन करते हैं तथा शुद्ध व सरल हृदय से अपना जीवन व्यतीत करते हैं, उन पर शनिदेव अनिष्टकारी कष्ट नहीं देते बल्कि उन्हें सुख प्रदान करते हैं ।

शनिदेव का प्रार्थना मन्त्र

नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम ।
छायामार्तण्डसंभूतं तं नमामि शनैश्चरम् ।।
अर्थ–जो नीले काजल के समान आभा वाले, सूर्य के पुत्र, यमराज के बड़े भाई तथा सूर्य पत्नी छाया और मार्तण्ड (सूर्य) से उत्पन्न हैं उन शनैश्चर को मैं नमस्कार करता हूँ ।

शनिदेव से पीड़ा मुक्ति की प्रार्थना का मन्त्र

सूर्यपुत्रो दीर्घदेहा विशालाक्ष: शिवप्रिय:।
मन्दचार: प्रसन्नात्मा पीडां हरतु मे शनि ।। (ब्रह्माण्डपुराण)
अर्थात्–सूर्य के पुत्र, दीर्घ देह वाले, विशाल नेत्रों वाले, मन्दगति से चलने वाले, भगवान शिव के प्रिय तथा प्रसन्नात्मा शनि मेरी पीड़ा को दूर करें।

शनि देव की काली मूर्ति और पीपल के वृक्ष की पूजा के पीछे की कथा

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