Shravan 2021: क्यों सावन का महीना है इतना महत्वपूर्ण

श्रावण मास सनातन धर्म में विशेष महत्व रखता है और इसकी पौराणिक कथा से ज्ञात होता है कि भगवान शिव से जुड़ा है श्रावण मास का संबन्ध..

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सनातन धर्म में श्रावण मास का विशेष महत्व है जिससे सभी परिचित हैं किन्तु इसके पीछे क्या कथा है और क्या कारण है, यह आमतौर पर लोगों को ज्ञात नहीं है. अतएव, श्रावण मास के इतिहास में जा कर हमें श्रावण मास संबन्धी वास्तविक जानकारी प्राप्त हो सकेगी.

श्रावण मास के पीछे है पौराणक कथा

श्रावण मास संबन्धी पौराणिक कथा के अनुसार, मरकंडू ऋषि के पुत्र मारकण्डेय ने लंबी आयु के लिए सावन माह में ही घोर तप कर शिवजी की कृपा प्राप्त की थी, जिससे मिली मंत्र शक्तियों के सामने मृत्यु के देवता यमराज भी नतमस्तक हो गए थे।

भगवान शिव से जुड़ा हुआ है श्रावण मास

भगवान शिव को सावन का महीना प्रिय होने का अन्य कारण यह भी है कि भगवान शिव सावन के महीने में पृथ्वी पर अवतरित होकर अपनी ससुराल गए थे और वहां उनका स्वागत अर्घ्य और जलाभिषेक से किया गया था। माना जाता है कि प्रत्येक वर्ष सावन माह में भगवान शिव अपनी ससुराल आते हैं। भू-लोक वासियों के लिए शिव कृपा पाने का यह उत्तम समय होता है।

ये है समुद्र मंथन का मास है ये

पौराणिक कथाओं में वर्णन आता है कि इसी सावन मास में समुद्र मंथन किया गया था। समुद्र मथने के बाद जो हलाहल विष निकला, उसे भगवान शंकर ने कंठ में समाहित कर सृष्टि की रक्षा की; लेकिन विषपान से महादेव का कंठ नीलवर्ण हो गया। इसी से उनका नाम ‘नीलकंठ महादेव’ पड़ा। विष के प्रभाव को कम करने के लिए सभी देवी-देवताओं ने उन्हें जल अर्पित किया। इसलिए शिवलिंग पर जल चढ़ाने का ख़ास महत्व है। यही वजह है कि श्रावण मास में भोले को जल चढ़ाने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।

भगवान विष्णु का योगनिद्रा-काल

शास्त्रों में वर्णित है कि सावन महीने में भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसलिए ये समय भक्तों, साधु-संतों सभी के लिए अमूल्य होता है। यह चार महीनों में होने वाला एक वैदिक यज्ञ है, जो एक प्रकार का पौराणिक व्रत है, जिसे ‘चौमासा’ भी कहा जाता है; तत्पश्चात सृष्टि के संचालन का उत्तरदायित्व भगवान शिव ग्रहण करते हैं। इसलिए सावन के प्रधान देवता भगवान शिव बन जाते हैं।

 

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