Shravan Special: श्रावण मास में ही शिव जी की विशेष पूजा क्यों होती है?

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आद्रा हर साल 22 जून के करीब 60 घन्टे मे पडता है, आद्रा वर्षा का पहला नक्षत्र है जिससके प्रवेश से ही जल और वर्षा का गणना होती है ,
सावन मे सूर्य कर्क राशि मे लगभग 16 जूलाई को आता है. कर्क राशि चन्द का है जो शिव के मस्तक पर विराजमान है , चन्द्र ग्रहो मे रानी है तो सूर्य ग्रहो का राजा है.
नक्षत्र चक्र का आर्द्रा ही वर्षा का प्रथम नक्षत्र है। भगवान शंकर की पहली मूर्ति ही जल रूप है। अतः जल से भगवान शंकर का अभिषेक प्रनाशन कहा गया है। सूर्य जब आर्द्रा नक्षत्र में प्रवेश करता है तो पृथ्वी के गीली( आर्द्र) होना शुरू होता है। यह आर्द्रा ही माँ अम्बिका या माता पार्वती है।
आर्द्रा का स्वरूप हीरे के समान है तथा आकाश का तेजस्वी तारा रुद्र्श्री इसी के साथ है। अत वेदों में कहा गया है की भगवान रूद्र (शिवजी) आर्द्रा के साथ आ रहे है।
आद्र्या रुद्रः प्रथमान एति ।
श्रेष्ठो देवानां पतिरघ्नियानाम ।।
(तैत्तिरीय ब्राह्मण)
रुत (कष्ट) को द्रवित करनेवले देव रूद्र है। या रुत ( जल) देने वाले देव रूद्र है।
जब सूर्य आश्लेषा में आते है तब आकाश व् पृथ्वी का आश्लेष (आलिंगन) वर्षा के कारण होता है। अतः भगवान शंकर वस्तव में वर्षा कालीन आकाश है और कडकती बिजली व् सूर्य रश्मियाँ ही सर्प है। इसी साम्य से भगवान शंकर सर्पधारी है।
असो योवसर्पति नीलग्रीवो विलोहितः ।
इसी लिय श्रावण मास (वर्षा का महिना) भगवान शिव का माना गया है।अतः श्रावण मॉस में शिव की पूजा की जाती है।
देवशयन में मृत्यु लोक का प्रभार भगवान विष्णु भगवान श्री शंकर को सौंप देतें है। इसलिये देव शयन के तुरंत बाद श्रावण मास में भगवान शंकर के अभिनंदन स्वरूप पूजा की जाती है। जैसे नवीन राजा के राजतिलक पर की जाती है। इसलिये देवशयन में केवल भगवान विष्णु की पूजा ही नही की जाती हैं।अन्य सभी देवी देवताओं की पूजा की जाती है।
देवउठावनी एकादशी के बाद बैकुंठ चतुर्दशी को भगवान शंकर भगवान विष्णु को मृत्यु लोक का प्रभार वापस सौंप देते है इसी लिये अगला महीना मार्गशीर्ष भगवान विष्णु का माना जाता है।

 

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