Zoya Mansoori Writes: विलक्षण है तमिलनाडु का मारुन्डेश्वर मंदिर

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हमारे देश में बहुत से ऐसे मंदिर और धार्मिक स्थल जो बीमारियों और रोगों से निजात दिलाते है उन्ही में से एक है
मारुंडेश्वर मंदिर.
मारुंडेश्वर या औषधेश्वर मंदिर के नाम से प्रसिद्ध ये शिव मन्दिर तमिलनाडु के कांचीपुरम के थिरुकाचुर गाँव में है। इस मंदिर में शिव जी को मारुंडेश्वर के रूप में पूजा जाता है।
मारुंड का अर्थ है एक चिकित्सा, मारुंडेश्वर अर्थात चिकित्सा के ईश्वर और मारुंडेश्वर मंदिर अर्थात “दिव्य चिकित्सा का मंदिर।”
कथाओं के अनुसार, माता सती की त्वचा अंजनक्षी रुद्रगिरि पर्वत पर गिरी थी, इसी पर्वत पर ये चमत्कारी औऱ दैवीय मंदिर स्थित है। एक बार इंद्र सहित स्वर्ग में समस्त देवता बीमार हो गए। सभी देवताओं ने इस स्थान पर शिव की पूजा की। देवों का इलाज शिव के कहने पर दिव्य चिकित्सक अश्वनी देवता ने किया था।
मन्दिर से जुड़ी सभी पौराणिक कथाएँ ये इशारा करती है कि मन्दिर रोगों के निवारण से जुड़ा है।यहाँ आने वाले भक्तों का मानना है कि वो यहाँ की मिट्टी और पानी के उपयोग से निरोगी हो जाते है
दिलचस्प बात ये है कि इस मंदिर की संरचना हिंदू मंदिर की तरह बिल्कुल नहीं लगती है। यह एक वर्ग संरचना है।इसके विशिष्ट पिरामिड आकार के टावर ग्रेनाइट पत्थरों से बने हैं।अन्य हिन्दू मंदिरों की तरह यहां शिखर भी नही मिलता।
मन्दिर प्रांगण में एक गुप्त स्थान है जहाँ पहले आम जनता को प्रवेश करने की अनुमति नही थी। यहाँ एक गोल भूमिगत कुआं है जहाँ अभी भी पानी भरा रहता है। कुए तक जाने के लिए छड़नुमा सीढियां है। ये एक ऐसी जगह थी जहाँ केवल साधु संत ही जा सकते थे। ये लोग यहां पर रस-विधा( रसायन विद्या) और औषधियो पर कार्य करते थे।
इस स्थान पर दवाइयां और अजीब रसायन तैयार किए जाते थे जिनकी सहायता से गंभीर बीमारियों से ग्रसित पीड़ितों को ठीक किया जाता था। यही कारण है कि इस हिंदू मंदिर का नियमित स्वरूप नहीं है। कुछ सौ साल पहले इस स्थान को भी सामान्य जनता के लिए खोल कर पूर्ण रूप से मंदिर में बदल दिया गया।
मंदिर में एक ध्वज पद है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यह किसी प्रकार के रहस्यमयी विकिरण का उत्सर्जन करता है। पोस्ट के आधार पर, एक छोटा आयताकार गड्ढा होता है, जो एक प्रकार की धूल से भरा है। इस मिट्टी या धूल को दवा माना जाता है, एक क्यूरेटिव पाउडर जो कई बीमारियों को ठीक कर सकता है। जो लोग मंदिर जाते हैं, वे धूल घर ले जाते हैं। और किसान भी अपने खेती में इसका उपयोग करते है
यहां जो संत रहते थे उनमें प्रशिक्षुता की परंपरा थी उन्हें सिखाया जाता था कि विभिन्न यौगिकों को बनाने के लिए विभिन्न जड़ी-बूटियों और रसायनों को कैसे मिलाया जाए।
उन्होंने जो कीहोल जैसी संरचना है उधर 9 रसायनों से निर्मित “औषध लिंगम”नामक बेलनाकार लिंगम पानी मे रखा। ये लिंगम पूर्वजो ने कुएं ने रखा ये लिंगम उन रसायनों से मिलकर बनाया था जो व्यक्तिगत रूप से सेवन किए जाने पर जहरीले होते हैं, लेकिन जब एक साथ जुड़े होते हैं, तो इसमें बहुत अधिक उपचार गुण होते हैं। जिन रसायनों ने लिंगम को बनाया, वे बहुत धीरे-धीरे पानी में घुल जाते है,जिससे पानी में उपचार करने के गुण आ जाते है यही कारण है कि इस पूरे ढांचे को ‘ओषध तीर्थ”के रूप में जाना जाता है।
अब सवाल ये उठता है ये कीहोल के जैसा क्यों है?
जरा इस संरचना को लिंगम को शीर्ष से देखने के नजरिये से देखिये दिखा “एक शिवलिंग”
एक अब, हम समझ सकते हैं कि इसे इस तरह क्यों बनाया गया था। तो इस संपूर्ण की होल आकार को एक योनी के रूप में डिजाइन किया गया,मध्य पानी मे रसायनों से निर्मित शिवलिंग।
स्थानीय लोगों का दावा है कि जहां यह पानी बीमार लोगों के लिए दवा का काम करता है, वहीं स्वस्थ लोगों के लिए भी खतरनाक है,इसके साथ यह भी कहते है कि यहां का पानी असामान्य रूप से भारी है। इसके लिए विज्ञान में जाना पड़ेगा।
सामान्य पानी मतलब H2O
भारी पानी मतलब D2O
इस शिवलिंग से जो पानी बनता है वो भारी पानी है
भारी पानी मे हीलिंग प्रॉपर्टीज होती है अगर कैंसर रोगी सेवन करे तो सेहत में कुछ सुधार होता हैऔर अगर स्वस्थ इंसान इनका सेवन करे तो बीमार।
आप सोच सकते है कि ये मन्दिर बहुत प्राचीन है उस समय हमारे पूर्वजों को रसायन व चिकित्सा विज्ञान का कितना ज्ञान था।
धर्म और चिकित्सा का मिश्रण कर इस मंदिर का निर्माण वाकई अद्भत है
(ज़ोया मन्सूरी)

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