Taliban : आगे क्या हो सकता है चेहरा हालात का Afghanistan में?

एक सच ये भी है कि पाकिस्तान को तालिबान का भारत के प्रति कोई दोस्ताना रुख हजम होने वाला नहीं है और हो सकता है आगे तालिबान के साथ पाकिस्तान की बात बिगड़ते-बिगड़ते इस हद तक बिगड़ जाए कि तालिबान पाकिस्तान पर ही बिगड़ जाए..

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बेहद आक्रामक तरीके से Taliban ने अफगानिस्तान पर कब्जा करने के बाद जो किया उसने भी लोगों को चौंका दिया. Kabul स्थित लंबे-चौड़े राष्ट्रपति भवन में तालिबानियों के आराम फरमाने की पिक्स तो दुनिया भर में वायरल हुईं लेकिन एक हफ्ते पहले 15 अगस्त को Afghanistan की सत्ता अपने हाथ में लेने के तीसरे दिन 17 अगस्त को तालिबान की परिपक्वता भी नजर आई जब उसने प्रेस कान्फ्रेन्स करके दुनिया को संदेश दिया कि हम अफगानिस्तान में तालिबान राज के अन्तर्गत रह रहे विदेशी लोगों के साथ भेदभाव नहीं करेंगे और उनको कोई नुकसान नहीं होने देंगे.
काबुल में आयोजित इस प्रेस-कॉन्फ्रेन्स में पहली बार कैमरे पर आए तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुज़ाहिद ने कहा कि हम अपने देश में शरिया कानून लागू करेंगे. महिलाओं को भी शरीया के अनुसार हम अपने साथ भागीदारी देंगे. इतना ही नहीं जो सबसे अहम बात तालिबानी प्रवक्ता ने कही वो ये थी कि अब अफगानिस्तान जंग का मैदान नहीं है, हमने अपने सभी दुश्मनों को माफ कर दिया है. अब हम देश के भीतर या बाहर कोई दुश्मन नहीं चाहते. हम चाहते हैं  कि अफगानिस्तान अब अराजकता से आजाद हो जाये.

तालिबान को समर्थन किसका है

तालिबान को कायदे से पाकिस्तान, चीन और ईरान का सीधा समर्थन है किन्तु अपरोक्ष समर्थन है सऊदी अरब का, संयुक्त अरब गणराज्य का और देखा जाये तो अदरूनी तौर पर दुनिया का हर इस्लामिक देश तालिबान के साथ खड़ा है. वे तालिबान से प्रभावित भी हैं और उनकी दृष्टि में उसका सम्मान और भी बढ़ गया है.  इस तालिबान को अमेरिका ने रूस के खिलाफ पैदा किया था और फिर अमेरिका से ही बीस साल लड़ने के बाद अब तालिबान का उससे अंदरूनी समझौता हो गया है. रूस सिर्फ तालिबान का समर्थन परोक्ष या अपरोक्ष तौर पर इस तरह कर सकता है कि वह किसी तरह उसका इस्तेमाल अमेरिका के विरुद्ध कर सके.
जो जाहिर है वो बताता है कि अमेरिका अब दूसरे के फटे में टांग नहीं डालेगा. नये अमरीकी राष्ट्रपति पिछले राष्ट्रपति की तरह आक्रामक नहीं हैं और वे शांति के शुद्ध समर्थक दिखाई देते हैं. ऐसे में तालिबान के साथ अमेरिकी समझौते के बाद अमेरिका का अपरोक्ष समर्थन उसे प्राप्त है. अब बात चीन की तो चीन शुरूआत से ही तालिबान के साथ है और अब वर्तमान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने उसका समर्थन भी कर दिया है. पाकिस्तान शुरू से ही अपने खून-पसीने से तालिबान को सींच रहा है और आज भी अफगानिस्तान में पाकिस्तान-परस्त तालिबानी सरकार बनाने की कोशिश में है.
तालिबान को जिन देशों से सीधा या छिपा हुआ समर्थन मिल रहा है वो ये जाहिर करता है कि इन देशों से तालिबान का टकराव जल्दी नहीं होगा. इसके आगे यूरोप में देखें तो अमेरिका के अलावा जर्मनी भी तालिबान का अपरोक्ष समर्थन करता दिखाई दे रहा है जिसने हाल ही में तालिबान को मदद की भी पेशकश की है.

तालिबान का विरोधी सिर्फ तुर्की?

ऊपरी तौर पर देखें तो दिखाई देता है कि घोषित रूप में आज की तारीख में सिर्फ तुर्की ही तालिबान का विरोधी है. अंदरूनी तौर पर अमेरिका, इज़राइल और कदाचित रूस भी तालिबान के समर्थक नहीं है और यही बात इनको तालिबान का विरोधी बनाती है. रूस तो शुरू से ही वहां रूस-परस्त सरकार बनाने की कोशिश करता आया है. रूस की ये कोशिश अब पूरी तरह ध्वस्त हो गई है. रूस के स्थाई दुश्मन अमेरिका ने तालिबान की मदद की फिर उससे जंग की और अब वह उसके प्रति निरपेक्ष रहना चाहता है. किन्तु इसका ये अर्थ नहीं कि अमेरिका अब अफगानिस्तान की तरफ देखेगा भी नहीं. जब भी उसे लगेगा कि तालिबान और रूस के बीच किसी तरह की बात बन रही है या रूस तालिबान को मूर्ख बना कर उसका इस्तेमाल कर सकता है -अमेरिका का कहर फिर तारी हो सकता है तालिबान पर.
इस स्थिति को उलट कर पढ़ें तो इसी प्रतिक्रिया की संभावना दिखती है रूस की तरफ से भी. यदि उसे लगता है कि अमेरिका और तालिबान की खिचड़ी पक रही है और पुराना दुश्मन तालिबान उसके खिलाफ और खूंखार हो सकता है तो इस हालत में तालिबान रूस का कोपभाजन बनेगा.  हाल ही में जो जानकारी सामने आई है वो बताती है कि रूस तालिबान के स्वागत की मुद्रा में है. इसका मतलब अब ये हो सकता है कि शायद तालिबान अब रूसी इशारे पर चले और अमेरिका के लिए मुश्किलात पैदा करे. रही बात तुर्की की तो तुर्की को हाल ही में तालिबान ने काबुल हवाई अड़्डे पर अपनी सेना भेजने की कोशिश के खिलाफ सख्त चेतावनी दी है जिससे तुर्की का मूड काफी खराब है.

पाकिस्तान के साथ रिश्ते

तालिबान  का पाकिस्तान के साथ संबन्ध ये जाहिर करेगा कि उसके भारत के साथ रिश्ते बहुत अच्छे कभी नहीं रहेंगे. पाकिस्तान शुरू से ही तालिबान के साथ घी-शक्कर है. पिछले 5 दशकों से वह तालिबानी मुजाहिदीनों की पूरी मदद सिर्फ इस उम्मीद पर करता आया है कि वह वहां तालिबान को मजबूत करके उसका इस्तेमाल कर सके. भारत के खिलाफ तालिबान का इक्का चलने का जो सपना पाकिस्तान ने पाल रखा है वह पिछली तालिबानी सरकार के पांच सालों में तो पूरा हो नहीं पाया लेकिन उसे उम्मीद है कि इस बार उसे तालिबान को भारत का दुश्मन बनाने में कामयाबी मिल ही जायेगी.
 इसके साथ ही इस्लामिक देशों का नेता बनने की चाह भी पाकिस्तान को तुर्की के मुकाबले खड़ा कर देती है और तुर्की वो देश है जिससे तालिबान की जरा भी नहीं बनती है. इतना ही नहीं अफगानिस्तान में पाकिस्तान परस्त तालिबानी सरकार बना कर मध्यपूर्व की तरफ ही नहीं दक्षिण एशिया में भी पाकिस्तान कुछ मजबूत हो जायेगा.  हालांकि पाकिस्तान को ये भी पता है कि तालिबान जितने जिद्दी हैं उतने ही सनकी भी और उनका मिज़ाज दुनिया की किसी हुकूमत की उंगलियों पर नाचने के लिये नहीं बना है. ऐसे में पाकिस्तान पर तालिबानी रिश्ता कहीं बूमरैंग न हो जाये, इस बात को भी पाकिस्तान को नजर में रखना होगा.

भारत के साथ तालिबान तालमेल

जिस तरह दुनिया जानती है, तालिबान भी जानता है कि भारत एक शांतिप्रिय देश है. उसे ये भी पता है कि भारत का जानी दुश्मन पाकिस्तान उसका अपना बड़ा मददगार साथी है. ऐसे में भारत के साथ तालिबान को भी रिश्ते रखने में उतनी ही सावधानी रखनी होगी जितनी भारत को अफगानिस्तान के साथ. भारत वेट एंड वाच पॉलिसी पर चल रहा है, सीधे सीधे तालिबान के विरुद्ध नहीं जा रहा है.
भारत ने तीन अरब डॉलर्स से अधिक का अफगानिस्तान में निवेश किया है जिसका तालिबान ने एक बार अपने बयान में स्वागत किया और भारत को धन्यवाद कहा तो दूसरी बार हाल ही में उसके प्रति लापरवाही दिखाई और ऐसा ढोंग किया जैसे उनको कोई परवाह नहीं है भारत की, कृतज्ञता तो दूर की बात है. ये वाली तालिबानी अदा ये बताती है कि उसके मन में भारत को लेकर अभी कोई दोस्ती या दुश्मनी का फैसला हो नहीं पाया है. फिलहाल तालिबान भारत के लिए मुफीद हो सकता है यदि वह अपने पुराने स्टैन्ड पर कायम रहे जब उसने कहा था कि कश्मीर भारत का अपना मसला है. ये बात ये बताती है कि फिलहाल जबरदस्ती भारत को अपना दुश्मन तालिबान भी नहीं बनाना चाहता. वैसे तालिबान के शुरूआती ऐलानों को देखते हुए कहा जा सकता है कि अब उसे अधिक रूचि देश के हालात सम्हालने और देश में सियासत करने में अधिक रहेगी बजाये इसके कि वह आसपास दूसरों का मुहरा बने और दूसरों के मामलों में नाक घुसाए.
सच तो बड़ा ये भी है कि भारत के अफगानिस्तान के साथ लंबे समय से संबंध हैं, ख़ास तौर पर व्यापार और निवेश के क्षेत्र में. भारत अफगानिस्तान के सबसे बड़े भागीदारों में से एक हैं और अफगानिस्तान को भारत का निर्यात इस साल 2021 में लगभग 835 मिलियन डॉलर का है.
भारत ने लगभग 510 मिलियन डॉलर का सामान भी आयात किया है. लेकिन व्यापार के अलावा भारत का जो निवेश अफगानिस्तान में है, उसके अंतर्गत अफगानिस्तान में करीब 400 परियोजनाएं भारत की हैं, जिनमें से कुछ इस समय चल भी रही हैं. इसको देखते हुए नज़र आता है कि भारत भी पूरी समझदारी दिखाते हुए तालिबान के नजरिये का जवाब उसी तरह से देगा. संभावना ये भी है कि भारत को एक ऐसा पड़ोसी भी मिल जाये तालिबान की शक्ल में जो भारत के लिये नुकसानदेह न हो पाकिस्तान की तरह.
निगाहों में रखने वाला एक सच ये भी है कि पाकिस्तान को तालिबान का भारत के प्रति कोई दोस्ताना रुख हजम होने वाला नहीं है और ये भी हो सकता है कि आने वाले दिनों में हम देखें कि तालिबान के साथ पाकिस्तान की बात बिगड़ते-बिगड़ते इस हद तक बिगड़ जाए कि तालिबान पाकिस्तान पर ही बिगड़ जाए. ऐसे में तालिबान के हाथों में हाथ डाल कर चल रहे पाकिस्तान को काफी समझदारी और काफी धैर्य का परिचय देना होगा.

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