गुरू-दक्षिणा (कहानी)

क्लास में प्रवेश करने ही वाले थे कि किसीनेा रास्ता रोक लिया.. नजर उठा के देखा एक गोरा आकर्षक चेहरा गुलाबी होंठों पर एक शरारती मुस्कान लिये..

2
138
उसने मेरा भरोसा तोड़ दिया था| हाँ, मेरी बचपन की मित्र थी मेरी सुम्मो. वैसे नाम था उसका सुमोना|
पारंपरिक और आधुनिक दोनों ही भाव उसके नाम में समन्वित थे|लम्बा चेहरा,गोरा रंग और बड़ी-बड़ी आँखें,नाक थोड़ी मोटी पर उसके चेहरे पर अजीब नहीं लगती थी| वो मेरी मित्र तो थी ही…मेरी गुरू भी थी| उसने मुझे पढ़ाया भी बहुत|
भूगोल पढ़ना कभी मेरे बस का नहीं था| पर न जाने कैसे वो मुझे कालाढुंगी, चेरापूँजी, आमेजन जंगल और भी न जाने क्या-क्या अजीबो-गरीब नाम -.जैसे कोई मिसाईल के नाम हो चुटकियों में अपनी स्पेशल तकनीक से रटा दिया करती थी| कुल मिला कर वो मेरी मित्र,मेरी बहन,मेरी ब्यूटीशियन,मेरी सलाहकार सब कुछ थी|
बचपन में तो उसके इन उपकारों को मैं इतना समझती ही नहीं थी| परन्तु उम्र के साथ सोच का विस्तार होता गया और मुझे समझ आने लगा कि सुम्मो ने मेरे लिये बहुत कुछ किया है और अब भी कह रही है|
एक दिन मैंने उससे कहा था..”बता ना सुुम्मो !! तुझे क्या चाहिये”?
सुम्मो मेरी तरफ चौंककर देखने लगी..”क्या.क्या कह रही है अंजलि?…मैं कुछ समझी नहीं.,मुझे क्या चाहिये.क्यूँ पूछ रही है ऐसा??”
मैंने हँसकर कहा.”गुरूदक्षिणा..तेरी गुरूदक्षिणा देना चाहती हूँ मैं”|
सुम्मो..”गुरूदक्षिणा…मुझे…तू देगी? गुरूदक्षिणा?”
“हाँ भई हाँ”.मैंने सुम्मो से कहा|
एकटक…  घूरती रही वो मुझे..फिर अचानक..जैसे उसको मिरगी का दौरा पड़ गया हो…ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगी..पेट पकड़ कर..”हा हा हा हा हा”..”हा हा हा हा हा…ओ माँ कि बोलच्छेस ऐइ मेय.ओह.हा हा हा…ओ माँ गो..हा हा हा”|
वो बोले जा रही थी और मुझे देखकर हँसे जा रही थी| मैं कुछ देर तक उसे देखती रही,घूरती रही और सोच रही थी मन ही मन कि ऐसा क्या कहा मैंने जो ये दुष्टो मेय (दुष्ट,शैतान लड़की) इतना हँस रही है..या…मैं इसे पागल दिख रही हूँ?..उफ्फफ..दुग्गा.दुग्गा!
.मैंने उसे गुस्से में घूरते हुए ही पूछा..”ऐ मेय (ओ लड़की) कैनो  हाँसछो ऐतो (इतना क्यूँ हँस रही हो)”?
हँसते-हँसते सँभलने के लिये उसने अपने दोनों हाथ मेरे कंधों पर रख लिये पर उसका हँसना नही रूका. हँसे जा रही है.हँसे ही जा रही है…अंतत: मैंने उसके दोनों कंधों को पकड़कर उसे झंझोड़ा और कहा बंगाली में ही “पागल होये गेछो कि तुमी (क्या पागल हो गई हो तुम?)”
तब कहीं जा कर वो थमी..उसने  फिर संजीदा हो कर ही पूछा मुझसे…”किस बात की गुरू दक्षिणा देना चाहती हो अंजलि”?
मैंने कहा.”देख तूने मेरे लिये इतना कुछ किया है..मैं…मैं तुझे इसके बदले गुरू दक्षिणा देना चाहती हूँ तू मेरी गुरू भी तो है…मित्र होने के साथ-साथ| देख मना मत करियो, समझी!!”?
वो सुनकर बिल्कुल मौन हो गई.फिर कहा..” ठीक है,.मुझे तो नहीं चाहिये थी गुरू दक्षिणा किन्तु तोर मन आछे तो..(तेरा मन है तो)..माँग लूँगी”|
मैंने कहा ..”तो माँग ना सुम्मो”|
वो कुछ क्षण सोच में डूबी रही फिर कहा..”ठीक है.अभी नही..कभी समय आने पर माँग लूँगी अँजलि”|
मैंने हँसकर सहमति दे दी और कहा “मेरे मरने से पहले माँग लियो सुम्मो”
उसने मुझे गुस्से में देखा और मेरे गालों पर हल्की चपेट लगाते हुए कहा.”ऐई जे दुष्टो मेय कि रकम कथा बोले”| वो कह रही थी कि मैं  कितनी शैतान लड़की हूँ…मुझे ऐसी बातें नही बोलनी चाहिये|
फिर हमदोनों हँसते-हँसते घर की ओर निकल पड़े| तब ये नही जानती थी कि उससे जो वादा कर बैठी वो राजा दशरथ के माता कैकेयी को दिये गये दो वरदानों के परिणाम जैसा साबित होगा मेरे लिये|
हम दोनों की बाड़ी(घर) आमने-सामने थी| वो बहुत ही कुलीन बंगाली खानदान से वास्ता रखती थी और मैं राजस्थानी,मारवाड़ी.मारवाड़ से| हालांकि हम दोनों का खान-पान,रहन-सहन बिल्कुल भिन्न था एक-दूसरे से |फिर भी हमदोनों में खूब जमती थी| वो मुझसे दो साल बड़ी थी| उसके काका बाबू ने उसका स्कूल में एडमिशन इसलिये देर से करवाया कि एक ही कक्षा में बच्चों में उम्र का अंतर हो तो बड़ी उम्र के बच्चे अपने साथ के बच्चों से हर बात जल्दी सीखते हैं और परिक्षा में भी उनसे अव्वल होते हैं| कुछ हद तक ये बात सही भी थी| सुमोना यानि सुम्मो हर बात मुझसे पहले कैच कर लेती थी और मुझे भी सिखा देती थी|
हम दोनों का एक-दूसरे के घर बहुत आना-जाना था और दोनों परिवारों में बहुत प्रेम भी था| वैसे मेरी दादी को सुमोना का बंगाली परिवार कम पसंद था| कहती था मेरी माँ से ” स्नेह …ये बंगालियों को ज़्यादा मुँह न लगाया कर.ये किसी के नहीं होते..लड़ाकू …झगड़ालू तो होते हैं और धोखेबाज़ भी|” मेरी माँ दादी की इन बातों पर सिर्फ हँस देती थी| हालांकि दादी की बातों में तंज था|उन्होंने बहुत दुनिया देखी थी| हर जाति और वातावरण का अपना एक अंदाज़ और प्रभाव होता है| आज के दौर का ताज़ा उदाहरण…दीदी जेमन खैला करछे.ऐई तो भीषोण अत्याचार आछे..शुद्धु.खैला होबे.खैला हौबे..खैला हौबे..|जबकि ऐसा भी नही है कि एक चोर हो तो सब चोर ही होते हों| बस उन्होंने सतर्क रहने कहा माँ से|
खैर, तो मैं कह रही थी कि..लगभग सभी चीज़ों का आदान-प्रदान आपस में हमारे परिवार के सदस्य एक-दूसरे के साथ करते थे सिर्फ नॉनवेज खाना छोड़कर|
हमलोग शुद्ध शाकाहारी और वे लोग माँस-मछली सब कुछ खाते थे| परन्तु ये सब कुछ हम और हमारे परिवारों के बीच कभी दीवार नही  बना|
सुम्मो की पिशी माँ जानती थी कि हम शुद्ध  शाकाहारी हैं तो जब भी कुछ वेज बनाती तो अलग बर्तनों में,अलग चीनी-मसालों से बना कर बिल्कुल अलग बर्तनों में (जिसमें कभी नॉनवेज न परोसा गया हो) भर कर हमारे घर भिजवाया करती थी|
मेरी माँ को भी उनपर आँख मींच कर पूरा-पूरा विश्वास था| तो कभी पूछ-ताछ भी नही की उन्होंने|
तो प्रेम और विश्वास की ये डोर महीन,पतली पर मजबूत थी|
खैर, मैं बता रही थी  कि उसने मेरे साथ बहुत बड़ा छल किया| इतना बड़ा कि मैं सपने में भी उसके लिये तो ऐसा नही सोच सकती थी|जिसके लिये हर दुर्गा-पूजा में मैं माँ दुर्गा से स्पेशल प्रार्थना करती थी कि वो सदैव खुश रहे, जो चाहे वो उसे मिल जाये|
शायद मेरी मासूम  और सच्ची प्रार्थनाओं में  इतना असर था कि वो एक दिन पूरी हो गई|
अब आप पूछेगे कैसे? वो हुआ यूँ कि हम दोनों सखियाँ बचपन से साथ पढ़े थे तो कॉलेज भी साथ ही ज्वाईन किया|हमारा भवानीपुर कॉलेज को एड था| मेरी माताजी इसके विरूद्ध थी कि “लड़का-लड़की एक साथ पढ़ेगें? कहीं कोई ऊँच-नीच हो गई  तो? ना बाबा ना अँजलि तू किसी गर्ल्स कॉलेज में दाखिला ले ले”| पर सुमोना भवानीपुर कॉलेज ज्वाईन कर रही थी तो मेरा भी वही मन था पढ़ने का|
जैसे-तैसे सुमोना की पिशी माँ ने मेरी माँ को मना लिया और इस तरह हम दोनों सखियों ने उम्र के सोलहवें सावन में कॉलेज में कदम रखा|
पहला दिन था हम दोनों कॉलेज पहुँचे| क्लास में प्रवेश करने ही वाले थे कि एक छड़ी ने हमारा रास्ता रोक लिया| नजरें उठा कर देखा तो एक गोरा,लम्बे कद का लड़का खड़ा था| गुलाबी होंठ चेहरे पर शरारत भरी मुस्कान और उसकी आँखें…हाँ उसकी आँखों में कुछ बात थी| बहुत संजीदा…सजीव…मगर ठहरी हुई बड़ी-बड़ी कमल जैसी आँखें| ऐसी आँखें मैंने पहले कभी नही देखी थी| ज़ेहन में एक पुराना गीत बजने लगा…”ये आँखें देखकर हम सारी दुनिया भूल जाते हैं”..बजे ही जा रहा था…मैं…सुध-बुध भूल बैठी थी| तभी किसी तीखी मर्दाना आवाज़ ने मेरा ध्यान भंग कर दिया| “ऐ लड़की !! कहाँ ध्यान है तुम्हारा? मैंने उसकी ओर देखा फिर सुमोना को देखा|
सुमोना ने आँखों ही आँखों में इशारा किया और उस लड़के से  पूछा.”क्या बात है…रास्ताए कैनो दाड़िये आछो”?(रास्ते में क्यों खड़े हो हमारे)
उस लड़के ने कहा “आज कॉलेज का पहला दिन है| हम सीनियर्स को अधिकार होता है कि पहले दिन जूनियर्स की रैगिंग करें”|
उन दिनों कॉलेज में रैगिंग होती थी पहले दिन|
सुमोना ने डाँट भरे लहजे में कहा..”रास्ता दो..”लड़के ने कहा.”नहीं हटूँ तो क्या कर लोगी,आज के दिन प्रिंसिपल और प्रोफेसर भी कुछ नहीं कहते”| ये कहकर वो मुस्कुराने लगा|
सुमोना उसकी ढिठाई को भाँप गई थी इसलिये उस लड़के से मुँह लगना बेहतर न समझ अपने दादा (बड़े भाई) लोकेश को बुलाने  के लिये फोन किया…”कहने लगी ऐई  लोकेश दादा कॉलेजे एकटा नोगंरा छेले रैगिंग कोरते दाड़िये आछे| जेते दिच्छी ना क्लासे”
उसने बांग्ला में कहा था कि एक गंदा लड़का गेट पर रास्ता रोककर खड़ा है जाने नही दे रहा क्लास में.
मैं तो वैसे ही डरी हुई थी| बीच-बीच में वो लड़का मुझे घूर भी रहा था जिससे झेंप कर मैं नज़रें झुका रही थी|
सुमोना के भाई ने कहा “उस लड़के को फोन दो”|
सुमोना ने उसे भाई से फोन पर बात करने को कहा..पहले वो सुमोना को घूरता रहा फिर मोबाईल हाथ में लेकर भारी-भरकम आवाज़ मे  कहा –  “हलो बोलुन (बोलिये)”
उधर से दादा की आवाज़ आई और पल-पल उस खड़ूस,सड़ू से लड़के के भाव बदलने लगे|
पहले वो सकपकाया, फिर कुछ जिज्ञासा दिखी उसके चेहरे पर, फिर वो हल्का मुस्कुरा़या और देखते ही देखते ज़ोर से हँसने लगा|
मुझे लगा कि इसे भी मिरगी का दौरा पड़  गया है क्या?.राम-राम..या पागल है…राँची के पागलखाने से आया है क्या?.. उफ्फ…तभी उसने भाई को कहा “अरे तू लोकेश!! यार तुझसे मिले ज़माना हो गया| अच्छा ये तेरी बहनें हैं? चल-चल कोई बात नहीं, तू चिंता मत कर मैं हूँ ना …इनका पूरा ख्याल रखूँगा”|
मेरे मन में चल रहा था…”यार ये क्या हो गया? मुझे तो लगा था दादा इस खड़ूस लड़के को ज़ोर की डाँट लगायेगें| मगर ये दोनों तो अच्छे दोस्त निकले|
वो लड़का सुमोना से बातें करने लगा| अपना परिचय दिया -“मैं पीयूष.. पीयूष है मेरा नाम..आपके दादा का बचपन का दोस्त| हम एक साथ एक ही स्कूल में पढ़ते थे| मेरे पिताजी सरकारी कार्यालय में कार्यरत हैं तो बीच में उनका तबादला दिल्ली हो गया था तो मैं वहाँ चला गया था| कुछ साल वहीं था अब हम कोलकाता वापस आ गये हैं पिछले साल|” वो लड़का भी बंगाली ही था|
मैं अपने ही विचारों की उधेड़-बुन में थी कि सुमोना ने मुझे चिकोटी काटी| मैं वर्तमान मैं आ चुकी थी| वो लड़का…क्या कहते हैं उसे…खड़ूस..नहीं…नहीं..पीयूष बड़ी हैरान और मासूम निगाहों से मेरी तरफ देख रहा था| उसने हाथ बढ़ा़या और मेरी आँखों में आँखें डालकर कहा- “हलो आई एम पीयूष मजुमदार…आपनि”? ..मैं उसकी आँखों  में न देख पाई और नज़रें झुका कर कहा…”अँजलि…अँजलि अग्रवाल” और झट से उससे अपना हाथ छुड़ा लिया जो उसने बड़ी ज़ोर से पकड़ा था| उफ्फ.., “बदमाश छेले” मन ही मन कहा मैंने..
उसने तपाक से पूछ लिया.. “अभी कुछ कहा आपने अँजी!!!!”
मैंने उसे घूरा और कहा – “कॉल मी अँजलि, मेरे दोस्त बस मुझे अंजी कहते हैं”| वो मुझे देखता रहा और फिर ठहाका लगा कर हँस पड़ा| कहने लगा “सो स्वीट यू आर।  पर हमारी तो दोस्ती हो गई अभी-अभी,.है ना!”
मैंने बिना देखे उसकी ओर सर हिलाया|
उसने हमें क्लास रूम में जाने का रास्ता दे दिया| सुमोना मुझे खींच कर क्लास रूम में ले जाने लगी| मैंने पलकें उठाकर कनखियों से देखा तो वे मुझे ही देख रहा था| मैं सहम गई कि उसने मुझे देखते हुए देख लिया| वो मुस्कुराने लगा और.और उसने मुझे  हल्के से हँसकर कहा “वेरी स्वीट गर्ल”|
मैं जल्दी से मुड़ गई और उसकी तरफ फिर देखा भी नही|
सुम्मो का हाथ कस कर पकड़ लिया, जैसे कोई छोटा बच्चा अपनी माँ का हाथ पकड़ लेता है घबरा कर|
खैर, कुछ देर में प्रोफेसर साहब आ गये क्लास में और मैं भी कुछ  देर में सामान्य हो गई|
कॉलेज में स्कूल जैसे बंधन और रेस्ट्रीक्शन नहीं| मैं और सुम्मो बहुत खुश थे| खूब मन लगा कर पढ़ रहे थे| मैंने और सुम्मो ने कॉमर्स लिया था| पीयूष साइंस स्टूडेंट था| बहुत बुद्धिमान था वो| चुटकियों में गणित के कठिन से कठिन सवाल हल कर देता था|
अब तो अक्सर वो खड़ूस पीयूष हमसे टकराने लगा| कभी हमारी खेैरियत पूछने के बहाने, कभी लाईब्रेरी में तो कभी कॉलेज कैंटीन के अंदर| मुझे एक आँख नही  भाता था वो|
कोई भी मौका नहीं छोड़ता था मुझे टीज़ करने का..मेरा नाम निकाल दिया था उसने..”नाज़ुक गुड़िया”..उफ्फ…मुझे बहुत क्रोध आता था…दिल करता था उसे…खड़ूस…भूत..सड़ू…सब कुछ कह कर वहाँ से भाग जाऊँ पर न जाने कुछ कह नही पाती थी उसे|
बाकि जगहों पर तो सुमोना साथ होती थी तो मैं कम्फर्टेबल होती थी| परन्तु एडिशनल में मेरा विषय कला और साहित्य था तो सुम्मो का होम साइंस| बदकिस्मती से उस खड़ूस का भी विषय कला और साहित्य था| हफ्ते में दो बार क्लास होती थी| कभी-कभी टैगोर हॉल में प्ले भी होता था बांग्ला साहित्य पर| ज़्यादातर शरतचन्द चट्टोपाध्याय ,रविन्द्रनाथ टैगोर के उपन्यासों  पर आधारित नाटक होते थे| मेरा रूझान था इसमें तो मैं क्लास  बंक नही करती थी| वो तो बस कभी-कभी अटेंडेंस के लिये आता था| बहुत ही इर्रिटेटिंग था वो।
मैं देख रही थी आजकल हर क्लास में आने लगा और प्ले में भी| हरदम मेरे साथ वाली सीट पर आ कर बैठ जाता और देखता रहता मुझे| गालों पर  हाथ धरे कोेहनी बेंच  पर टिकाये, जैसे बाबू मोशाय क्लास करने नही आये..मुझे देखने आये हैं| मुझे मन ही मन बहुत क्रोध आता था उस पर| परन्तु कर भी क्या सकती थी|
एक दिन प्ले के दौरान मैं कुछ नोट्स लिखने में व्यस्त थी| तभी बांग्ला गाने की आवाज़ आई..बहुत ही मधुर.”आमि चिनि गो,चिनि तुमा देर…ओ गो बिदेसिनी.तुमी थाको सिंधु पारे ओ गो बिदेसिनी..”.पहले मुझे लगा कोई रिकार्ड बज रहा है गिटार की संगत के साथ| पर अचानक मैंने सर उठाया तो देखा कि बाबू मोशाय यानि कि पीयूष गिटार बजा रहा था और खुद ही गा भी रहा था| बहुत सुंदर आवाज़ थी उसकी| मैं खींची चली गई उस ओर| सबने गाना खत्म होने पर तालियाँ बजाई तो मुझे होश आया| वो दौड़कर मेरे पास आया और कहने लगा “कैमोन लाग्लो आमार गान टा अंजी!!”?
(मेरा गाना कैसा लगा अंजी?)
मैंने नज़रे ऊपर-नीचे घुमाते हुए कहा…”नॉट बैैड”..ऐसा इसलिये कहा कि वो समझ न जाये कि मैं उसके गाने से प्रभावित हो गई हूँ|
खैर, आगे का किस्सा सुनाती हूँ| सावन-भादों के दिन थे..मौसम सुहाना हो जाता है इस रुत में| हमारा कॉलेज दो दिनों के लिये हॉली डे ट्रिप पर मायापुर जा रहा था|
घर से मनाही हो गई थी…परन्तु हमेशा की तरह पिशी माँ ने माँ को मना लिया| मैं और सुम्मो बहुत उत्साह से जाने की तैयारी करने लगे|
सही .. वक्त पर हम कॉलेज पहुँचे| सब बस में बैठ ग़ये|बस चली ही थी कि किसी ने बाहर से गेट खटखटाया| ड्राईवर ने  बस रोक दी| दरवाज़ा खुला तो मुझ पर घड़ों पानी पड़ गया|
मेरे मुँह से निकला.खड़ूस।
सुम्मो ने मेरा हाथ दबाया| मैं चुप हो गई| सोच रही थी ये कहाँ से आ टपका| अब दो दिन सर खा जायेगा उफ्फ..   |
रास्ते भर वो आदतन मुझे छेड़ता रहा| सुम्मो से हँस-हँसकर बातें कर रहा था और बीच-बीच  में मुझे देख रहा था| मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था|
खैर, हम मायापुर पहुँच गये|
रात हो गई थी सब थके थे| खाना खाकर सब अपने-अपने कमरों  में सोने चले गये| वो खड़ूस न जाने क्यूँ हमें हमारे कमरे तक छोड़ने आया| फिर जाते-जाते मुस्कुरा कर देखा मुझे| न जाने क्यूँ मैंने भी पहली बार उसे देखकर  गुस्से से नही शरमा कर नजरें झुका लीं|
अगले दिन हम राधा-कृष्ण का मंदिर देखने गये| वो मेरे बिल्कुल साथ-साथ चल रहा था| हम सब अपने-अपने मोबाईल से पिक खींच रहे थे उस ऐतिहासिक भव्य मंदिर की| मैंने नोटिस किया कि वो मंदिर की कम मेरी तस्वीरें ज़्यादा खींच रहा था| मैंने ऐसे दिखाया जैसे मुझे कुछ पता नही| पर न जाने क्यूँ मुझे उसका ऐसा करना बुरा नही लगा| हमें सब कुछ बहुत ध्यान से देखना-समझना था क्यूँकि वापस जाकर  “प्रोजेक्ट मायापुर” पर एक  रिपोर्ट बना कर देनी थीे|
हम बैठे थे मंदिर के परिसर में| मैं कृष्ण-राधा की मनमोहक मूरत को एकटक निहार रही थी| तभी पीयूष ने अपनी बाँसुरी निकाली और बजानी शुरू कर दी.”तेरे सुर और मेरे गीत…दोनों मिलकर बनेगी प्रीत”..मैं उस मुरली की धुन में खो गई..अचानक उसने कहा..”पसंद आया”?
मैं मुस्कुराने लगी .मैंने कहा उससे.”कितनी सुंदर बाँसुरी बजाते हो पीयूष आप”|
पीयूष ने कहा कि जब वो गाँव में रहता था तो अपने दादाजी के साथ रोज़ मंदिर जाया करता था| वही वो बाँसुरी बजाने का अभ्यास करता था और ईश कृपा से ये उसने वही सीखा बजाना बस कुछ ही दिनों में|
उसने मुझे गीता के बहुत सारे श्लोक और उनका अर्थ भी समझाया | मैं हैरान थी उसके इस अद्भुत रूप और ज्ञान को देखकर|
अभी कुछ देर पहले वो मुझे बहुत ही निम्न दर्जे का एक आशिक आवारा लग रहा था परन्तु उसकी समझ,हुनर और सुंदर ज्ञान की सत्यता पर जब प्रकाश पड़ा तो मेरी आँखें चौंधिया गई ये देखकर|
ये सुमोना भी न जाने मंदिर देखते-देखते कितनी दूर निकल गई थी अपनी ही धुन में कि उसे मेरे साथ न होने का भान भी न रहा|
मैं भी पीयूष के साथ उस वक्त एक अलग ही दुनिया में विचरण कर रही थी..बिना पंखों के|
उसने मुझे राधा-कृष्ण के गूढ़ प्रेम का रहस्य बताया…उसने कहा ..”जानती हो अंजी कृष्ण ने राधा से विवाह क्यूँ नहीं किया?क्यूँकि कृष्ण राधा में ही बसे थे| वे दोनों पृथक थे ही नहीं और राधा-कृष्ण के विवाह न होने के पीछे कई किदवंतियाँ प्रसिद्ध हैं जिनमें एक ये भी है कि -राधा के भाई ने कहा था कि यदि इन दोनों का विवाह हुआ तो दोनों के वंश के वंश का विनाश हो जायेगा| कृष्ण राधा से इतना प्रेम करते थे कि राधा जी के गर्म दूध पीने से छाले कृष्ण की ग्रीवा में उभर आते थे| बस इसीलिये उन्होंने राधा से विवाह नहीं किया”| मैं उसकी बातों में जैसे खो गई थी..मंत्रमुग्ध-सी|
तभी उसने हँसकर कहा.”ओ नाज़ुक गुड़िया…”.मैं चौंक गई..
वो मुझे ही देख रहा था और अचानक उसने मेरा हाथ पकड़ लिया| मैं बिल्कुल सुन्न पड़ गई|
हाथ-पैर बिल्कुल ठंडे पड़ गये मेरे बर्फ जैसे|
पीयुष ने कहा …”अंजी!! क्या मेरी राधा बनोगी? आई लाईक यू..तुम बहुत भोली…निश्छल और मासूम हो| मुझे पहली ही नज़र में तुमसे प्रेम हो गया था”| लव इन फर्स्ट साईट सुना तो था आज देख भी लिया था|
मेरी आँखें शर्म से बोझिल थी…दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था,.ज़बान पे जैसे ताला लग गया था| कुछ कह नहीं पाई मैं| बस उसे देखती रही..उसने शायद मेरी मन:स्थिति को भाँप लिया था| मेरे सर पर प्यार से हाथ रख कर कहा “कोई बात नहीं…तुम सोच कर जवाब देना अंजलि| मैं प्रतीक्षा करूँगा तुम्हारे उत्तर की”|
तभी सुम्मो की दूर से आवाज़ कानों में सुनाई पड़ी…”अंजी ओ अंजी…अरे, कहाँ रह गई तुम”
उसकी आवाज़ सुनकर मैंने झट से अपना हाथ पीयूष से छुड़ा लिया| वो मुस्कुरा रहा था और मैं झेंप गई|
अगले दिन हम वापस कोलकाता लौट रहे थे| इस बार पीयूष बिल्कुल हमारी सामने वाली सीट पर बैठा था| जहाँ से वो मुझे अच्छी तरह देख पाये| अंताक्षरी का दौर चल रहा था उसने एक से एक प्रणय गीत गाये और बीच-बीच में मुझे देख कर मुस्कुरा भी रहा था| मेरे कोमल मन में कब प्रेम-पुष्प खिल गये,  मुझे पता ही न चला|
कॉलेज फिर से शुरू हो गया और हमारे फर्स्ट ईयर के पेपर भी| वो भी व्यस्त हो गया परिक्षा की तैयारियों में|
आखरी पेपर था.मैंने परीक्षा के बाद उससे कहा कि “पीयूष, मैं आपसे कुछ कहना चाहती हूँ| कल मुझे मिलिये विक्टोरिया पैलेस के पास” वो बहुत खुश हुआ और सहमति में सर हिलाया|
दूर खड़ी सुमोना मुझे उससे बातें करते देख रही थी|
मैं और सुमोना घर वापस लैट रहे थे कॉलेज से| रास्ते में मुझे कई बार ये महसूस हुआ कि सुमोना मुझे बार-बार देख रही है और जब मैं उसकी तरफ देखती तो ऐसा कुछ नही था|
खैर हम घर लौट आये| सुमोना ने जाते-जाते कहा “ऐई अंजी!! आज रात ग्रुप स्टडी करते हैं| तू इकॉनोमिक्स में बड़ी कमज़ोर है| आज तुझे “ब्रेक इवन प्वाइंट” समझाऊँगी| कल तूने क्लास में प्रोफेसर को ग़लत डैफीनेशन सुनाई थी| चल मिलते हैं फिर..” ये कह कर वो चली गई और मैं अपने घर आ गई|
शाम के आठ बजे थे.पीयूष का संदेश आया… “आई लव यू मेरी राधा..” मैं मन ही मन मुस्कुराने लगी..ये सोचकर ही बहुत खुश थी कि मैं कितनी सौभाग्यशाली हूँ कि मुझे सुम्मो जैसी जान छिड़कने वाली मित्र और पीयूष जैसा गुणी,धीर,शील प्रेमी मिला है| खुद पे ही इतरा रही थी| बार-बार दर्पण के सामने खड़ी हो कर खुद को ही निहार रही थी जैसे पहली बार देखा है खुद को| आज स्वयं को एकदम नया-सा महसूस कर रही थी| शीशे के आगे खड़े होकर यूँ बातें कर रही थी जैसे पीयूष से ही कह रही हूँ कि “पीयूष मैं आपसे बहुत प्रेम करती हूँ..मैं आपकी राधा बनना चाहती हूँ “..और ये कहते-कहते शरमा गई मैं|
तभी द्वार पर दस्तक हुई सुमोना थी| हम दोनों ने खूब गप्पें लड़ायीं| थोड़ी पढ़ाई भी की|
रात का तीसरा पहर था मेरी नींद खुल गई| घड़ी देखी सवा तीन बजे थे| मैं उठी और पास रखे पानी का गिलास उठाकर पीने लगी| तभी सुम्मो भी उठ बैठी| वो मुझे ही देख रही थी| बड़ी अजीब निगाहों से| मुझे घबराहट होने लगी और भय भी लगा पर …पर मैंने हिम्मत करके उससे पूछ ही लिया.”ऐई सुम्मो कि होयछे..राग होयछे तुमा के ” (क्या हुआ है, तुम.मुझ से गुस्सा हो?)
उसने कुछ कहा नही.फिर कुछ क्षण बाद वो बोली..”अँजलि, मैं जानती हूँ कि तू पीयूष से प्रेम करने लगी है..मैंने देखा था. तेरी आँखों में उसके लिये प्रेम..देख इन्कार मत करना और झूठ भी मत बोलना मुझसे”|
मैंने कहा.”सुम्मो तू सच कह रही है.हाँ मैं उससे प्रेम करने लगी हूँ और कल उससे प्रेम का इज़हार करने वाली हूँ मिलकर.विक्टोरिया पैलेस शाम पाँच बजे| उसके बाद सबसे पहले तुझे ही बताने वाली थी ये बात| तुझे नही कहूँगी तो और किसे कहूँगी सुम्मो”|
सुमोना मुझे देखकर मुस्कुराने लगी पर उसकी मुस्कुराहट आज  मुझे बड़ी रहस्यमयी-सी लगी| मैंने नज़रअंदाज़ किया|कहा उसे …”चल सो जाते हैं, चार बज रहे हैं .फिर आठ बजे कॉलेज भी तो पहुँचना है ना रिज़ल्ट लेने”| मैं सोने ही लगी थी कि सुम्मो ने मेरा हाथ थाम लिया…मैं चौंक गई..मैने देखा वो मेरी आँखों में देख रही थी लगातार| मैने कहा…”क्या हुआ सुम्मो ?… कुछ कहना है!.”?
उसने कहा “हाँ अंजी, मैं तुझसे कुछ कहना चाहती हूँ”|
मैंने कहा – “तो बोल  ना!!”
सुम्मो ने कहा…”याद है अंजलि, तूने मुझे एक वचन दिया था कि तू मुझे गुरू मानती है और मुझे गुरू दक्षिणा देना चाहती है| मैंने कहा था कि समय आने पर माँग लूँगी”|
मैंने हँसकर कहा…”हाँ…हाँ,.. मैंने कहा था.बोल क्या चाहिये तुझे…?…मेरी वो पिंक ड्रेस या मेरे वो कुंदन के झुमके या मेरी फेवरेट किताब रोमियो-जूलियट वाली?..बोल ना क्या चाहिये? वैसे मेरा सब कुछ ही तो तेरा है, सुम्मो”|
मैंने बेपरवाही से कहा था ये लेकिन उसने पलट कर कहा- “सब कुछ मेरा है?…सोच ले…अँजी पहले.”
मैंने कहा “सोचना क्या है कह जो दिया…तू बोल तो सही, तुझे क्या चाहिये…अब बोल ना जल्दी..मुझे नींद भी आ रही है सुम्मो”|
“मुझे पीयूष चाहिये, अँजी!!!”
एक बार तो मुझे लगा कि मैंने कुछ ग़लत सुन लिया। मैंने कहा…”क्या कहा?.फिर से बोल…मुझे लगा तू पीयूष कह रही है?”
उसने कहा…”तुमने ठीक सुना, अँजी …मैं गुरुदक्षिणा में तुमसे तुम्हारा पीयूष ही माँग रही हूँ| पहले ही दिन से उससे प्रेम करने लगी थी” ..वो कहती जा रही थी और मेरे पैरों तले की धरती खिसकती जा रही थी|
जब उसने अपनी बात खत्म की…कुछ क्षण हमारे बीच मौन छा गया| पिन ड्रॉप साईलेंस..मेरी आवाज़ हलक में ही अटक गई| सोच रही थी कि कुछ देर पहले सब कुछ कितना अच्छा था ना!!
मैं और सुम्मो कितने खुश थे।.मैं पीयुष के साथ अपने भावी जीवन के रंगीन सपने देख रही थी और अचानक ये वर्तमान के  चाबुक का कैसा  कठोर प्रहार हुआ रंगीन सपनों पर.. सब को सब टूट कर बिखर गये|
मैंने फिर हिम्मत जुटाई और सुम्मो की तरफ देखा जैसे मेरी नज़रें उससे कह रही थीं कि “कुछ और माँग लेती सुम्मो.मेरी…मेरी जान माँग लेती…हँसते-हँसते दे देती…पर ये क्या तूने तो मुझसे मेरा प्यार ही माँग लिया”
आज मुझे रामायण के  वो दृश्य याद आ गये जब कैकयी ने महाराज दशरथ से वो माँग लिया था जो उनके बस में ही नही था| मेरी भी मन:स्थिति राजा दशरथ के समान हो गई थी| वो अपने वचन से बँधे थे और मैं अपने वचन से नही मुकर सकती थी|
मैंने धीरे-से सुम्मो का हाथ अपने हाथों में लिया और उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा कि “ठीक है सुम्मो मैं अपना वचन निभाऊँगी| तेरी गुरू दक्षिणा देना मेरा धर्म है और कर्तव्य भी| आज से पीयूष तेरा है| मैं कभी अब उसके बारे में नहीं सोचूँगी| वचन देती हूँ तुझे”|
सुमोना का चेहरा खिल उठा..”तू सच कह ऱही है ना, अँजलि”?
“हाँ.. बिल्कुल सच..अब पीयूष तेरा है सिर्फ तेरा”|
उसने मुझे गले लगा लिया| मेरी आँखों में आँसू थे…पीयीष को खो देने का..मैंने बिना उसे कुछ बताये , बिना कुछ पूछे उसका भविष्य सुनिश्चित जो कर दिया था सुमोना के साथ| उधर सुमोना की आँखों में खुशी के आँसू थे कि उसे उसकी गुरू दक्षिणा मिल गई थी|
वो घर जाने लगी ये कह कर कि- “तैयार हो जा कॉलेज जाना है”| मैंने हौले से सर हिला दिया|
माँ ने आवाज़ लगाई कि “अँजलि …जल्दी उठ जा …दादी की सात बजे की ट्रेन है…मसूरी की.’…मैंने आव देखा न ताव…कहा” माँ मुझे भी जाना है दादी के साथ मसूरी”.दादी प्रानिक हीलर हैं और वहाँ के सेंटर में कुछ महीनों के लिये हीलींग सिखाने जा रही थी| हमारा घर है  वहाँ तो रहने की सब व्यवस्था थी| माँ से कहा मैंनें “अब तो मेरी परीक्षा भी खत्म हो गई| आज रिज़ल्ट के बाद दो महीने की छुटुटी है| मैं जाऊँ माँ दादी के साथ “.और मैं लिपट गई माँ से|
माँ ने प्यार से मुझे चूमा और कहा “ठीक है जा .तैयारी कर ले अपनी..मैं पापा से कह देती हूँ तेरी तत्काल में टिकट निकलवा देगें..समय नहीं है..मैं कह दूँगी सुमोना को… तेरा रिज़ल्ट ले आयेगी कॉलेज से|
मैं दादी के साथ चली गई|
उधर सुमोना पीयूष से मिली| बताया कि मैं चली गई मसूरी| पीयूष को गुस्सा आया होगा मुझ पर…पर मेरे पास और कोई रास्ता न था|
सुमोना ने एक झूठ जोड़ दिया इस कहानी में कि मेरा विवाह बचपन में ही तय हो गया है और पीयूष से अपने दिल की बात कह दी| मैंने सुमोना को ग़लत नही समझा- “प्रेम और जंग ऩमें सब जायज है”ये सोचकर|
पीयूष ने भी शायद आस छोड़ दी होगी और मुझे धोखेबाज़ समझा होगा|
वे दोनों अब एक-दूसरे के साथ खुश थे और मैं…मैंने पीयूष से किया वादा निभाया…राधा बन कर.आजीवन.मैं वापस न लौटी दो वर्ष| वही कॉलेज ज्वॉईन किया| पढ़ाई पूरी की और दादी से हीलिंग सीख कर वही सेंटर में अपनी सेवा देने का प्रण लिया| माँ थोड़ी नाराज़ थी पर माँ है ना ज़्यादा दिन नाराज़ न रह सकी और शायद कुछ-कुछ समझ भी गई थी|इसीलिये मेरे फैसले पर सवाल नही किया|
ये थी मेरी गुरूदक्षिणा..मेरी सुम्मो के लिये..जिसने मुझसे गुरूदक्षिणा नही बल्किं मुझसे मुझको ही माँग लिया था..जैसे गुरू द्रोणाचार्य ने एकलव्य से उसका अँगूठा माँग लिया था,.ठीक वैसे ही..
ये न्याय था या अन्याय मैं समझ नही पाई| बस ये संतोष था मन में और प्रसन्नता भी कि मैंने अपना वादा निभाया गुरूदक्षिणा देकर..अपनी सुम्मो को..
(अँजू डोकानिया)

2 COMMENTS

  1. बहुत बधाई अंजू कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ती जाओ। मैं तो कहानी में पूरी तरह से डूब गई चलचित्र सी सामने घूम गईं घटनायें,काबिल लेखन के लिए मां सरस्वती सदा सहायक रहें।

  2. धन्यवाद दीदी उत्साहवर्धन के लिये|पूरा प्रयास करूँगी कि आगे इससे भी बेहतर कहानियों का उपहार माँ सरस्वती की कृपा से आप सबको दे सकूँ|सहृदय आभार आपका दीदी

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here