परख की कलम से: आधुनिक महिलाओं के छोटे कपड़ों का असली राज ये है

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कुछ लोगों की सोच है कि मॉडर्न बनना है तो अंग्रेजो और अमेरिकियों की संस्कृति अपनाओ।मगर ब्रिटेन या पश्चिम देशो का कल्चर वास्तव में क्या है? यह तस्वीर है ब्रिटिश शाही परिवार की एक सदस्य की जिनका नाम है केट मिडलटन। आप गूगल पर इनके अनगिनत फोटो देखिए और बस एक फोटो ढूंढकर बता दीजिए की किस फोटो में ये फूहड़ता का प्रदर्शन कर रही है।
इसी तरह अमेरिका की कोई भी फर्स्ट लेडी घटिया कपड़ो में घूमती नही दिखेगी वह पूरी सभ्यता के साथ रहती है, जबकि जैकलीन कैनिडी और मेलनिया ट्रम्प तो किसी जमाने मे मॉडल भी थी। ये महिलाएं अपना स्टेट्स मेंटेन करती है न कि मानिसक दिवालियापन।
लेकिन भारत मे कुछ लोगो को लगता है कि जितने कम कपड़े पहनो उतने मॉडर्न होते है। मगर जिन लोगो की आप सांस्कृतिक गुलामी करना चाहते है पहले उन्हें तो सही से जान लीजिये। जैसे भारत मे कुछ प्रथाएं थी की घर बनवाने में पत्थरों का प्रयोग सिर्फ राजा कर सकता है उसकी प्रजा नही।
ठीक इसी तरह ब्रिटेन में एक गंदा नियम था की ऊँचे घराने की महिलाएं पूरे कपड़े पहनेंगी जबकि निम्न वर्ग की महिलाएं (क्लर्क, मजदूर) अपने बदन को पूरा नही ढकेगी। इसी परंपरा ने सो कॉल्ड शॉर्ट्स को जन्म दिया और धीरे धीरे इसका स्वरूप बदल गया।
ठीक इसी तरह अमेरिका में बड़े घर की लड़कियां पूरे कपड़े पहनती थी जबकि मजदूर वर्ग की लड़कियां खेतो में काम करती है शॉर्ट्स पहनना उनकी मजबूरी थी।
इसलिए यदि किसी को लगता है कि उन्होंने अपनी बेटी, बहु या बहन को वाहियात कपड़े पहनने की इजाजत देकर बहुत मॉडर्न कदम उठाया है तो यह आपकी अज्ञानता से अधिक कुछ नही है क्योकि पश्चिमी संस्कृति के अनुसार आप निम्न वर्ग से अधिक और कुछ नही है।
वहाँ के उच्च वर्ग की महिलाएं तो आज भी अपनी संस्कृति को जानती है। अब आप निर्णय ले कि समाज मे महिलाओ का दर्जा क्या होगा रानी का या फिर मज़दूर का।
पोस्ट का विरोध छोटे कपड़ो से नही है, विरोध है कारण से। क्योकि अधिकांशतः इन कपड़ो के पहने जाने का कारण खुद को ओवेरस्मार्ट दर्शाना होता है ना कि महज कपड़े पहनना। छोटे कपड़े पहनना गलत नही है मगर इन कपड़ो को अपना विकास समझना विध्वंसक है।
(परख सक्सेना)

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