पूछता है देश : आचार संहिता क्या चुनाव आयोग के लिए भी चाहिए?

एक और बड़ा सवाल ये भी है कि ममता बनर्जी से डर लग गया क्या?..

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बड़ा सवाल है देश के सामने कि आचार संहिता (Code of Conduct) क्या चुनाव आयोग के लिए भी चाहिए ?
एक और सवाल कि ममता बनर्जी से डर लग गया क्या?
 भारत के चुनाव आयोग का आचरण बड़े लम्बे समय से संदेह के घेरे में रहा है. मनमोहन सिंह सरकार के 10 साल और जब जब कांग्रेस सत्ता में रही, तब तब आयोग पर कांग्रेस के मनमुताबिक काम करने का आरोप लगता रहा है.
चुनाव आयोग शुरू से कांग्रेस के पक्ष में और भाजपा के विरोध में खड़ा नज़र आता रहा है –मैंने पहले भी अपने लेख में लिखा था कि चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने 2019 में योगी आदित्यनाथ को 72 घंटे चुनाव प्रचार करने से रोका था केवल बजरंग बली का नाम लेने के कारण.
यही वे चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा थे जिन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक रिलीज़ रोक दी थी -इतनी हिम्मत कभी किसी चुनाव आयुक्त ने कांग्रेस के टॉप लीडर्स के लिए नहीं दिखाई.
2007 में याद कीजिये ,सोनिया गाँधी ने नरेंद्र मोदी को “मौत का सौदागर” कहा था –चुनाव आयुक्त थे उस समय के  एन गोपालास्वामी –उन्होंने सोनिया को नोटिस तो जारी किया मगर क्या कोई कार्रवाई की गई, ये किसी को पता नहीं चला. जाहिर है सोनिया के खिलाफ कुछ करने की हिम्मत ही नहीं थी.
नरेंद्र मोदी द्वारा सभी स्वायत्त संस्थाओं को पूर्ण स्वतंत्रता देने का परिणाम है कि इन सस्थाओं के लोग ही सरकार को आँखें दिखा रहे हैं –मगर उन्हें पता नहीं, वो खुद अपने को बेनकाब कर रहे हैं.
ममता बनर्जी को मुसलमानों को TMC के लिये वोट देने के वाले बयान को लेकर उनको केवल 24 घंटे के लिए बैन किया गया.
अगले दिन ममता बनर्जी धरने पर बैठ गईं जिससे लगता है आयोग इस कदर भयभीत हो गया कि ममता के CRPF के जवानों को घेरने के बयान पर उनका जवाब 10 अप्रैल को मिलने की तिथि के बाद भी 6 दिन से कोई कार्रवाई नहीं कर पाया.
जबकि आज एक और ऑडियो सामने आया ममता का जिसमे उनकी विशाक्त मंशा जाहिर हो रही है सभी CRPF जवानों को बंदी बनाने की.
दूसरी तरफ आयोग ने 10 अप्रैल की सीतलकूची गोलीबारी की घटना के लिए भाजपा के राहुल सिन्हा को 48 घंटे और भाजपा राज्य अध्यक्ष को 24 घंटे के लिए बैन कर दिया.
राहुल सिन्हा ने कथित तौर पर सीतलकूची हिंसा पर कहा था कि 4 नहीं 8 मरने चाहिए थे. दिलीप घोष ने कहा था कि यदि कोई सीमायें पार करेगा तो जो सीतलकूची में हुआ, वो और जगह भी होगा.
सुरक्षा बल अगर शांतिपूर्ण मतदान कराने में मदद करते हैं तो उनकी सुरक्षा करना चुनाव आयोग का दायित्व है – अगर 400 लोगों की भीड़ सीतलकूची में सुरक्षा बलों पर हमला करेगी तो कुछ भी हो सकता था –सुरक्षा बलों ने संयम से काम लिया वरना 4 तो क्या 40 भी धराशाई हो सकते थे.
चुनाव आयोग को उस सीतलकूची कांड की CBI जांच के आदेश देने चाहिए जो पता चल सके कि सुरक्षा बलों पर हमला करने वाले कौन थे –क्या वे सच में देश के नागरिक थे ?
अंत में ये कहना गलत नहीं होगा कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता कायम करने के लिए आचार संहिता बननी अनिवार्य प्रतीत होती है ताकि आयोग की मनमानी रोकने का उपाय हो सके. –ठीक है, चुनाव अच्छी तरह से होते हैं मगर कार्रवाई करने में ये भेदभाव करना उचित आचरण नहीं है आयोग का.
(सुभाष चन्द्र)

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