Tokyo Olympics 2020: आज के भारत का नंगे पैर दौड़ने वाला धावक

सच भी इतना ही पथरीला है जितना पी नागानाथन का जीवन, कंकड़ों पर नंगे पैर दौड़ लगाई है तभी सफलता ने उनको चुना है..

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जहाँ चाह वहाँ राह| इस कहावत पर मिल्खा सिंह के बरसों बाद आज पच्चीस वर्षीय पी नागानाथन बिल्कुल खरे उतरे हैं| इन्होंने ऑलम्पिक में बतौर धावक भाग लेने के लिये नंगे पैर दौड़ लगाई है या कहें नंगे पैर दौड़ कर ओलंपिक तक पहुंचे हैं आज ये!
 

कौन हैं पी नागानाथन

पी नागानाथन भारत की तरफ से टोक्यो ओलंपिक में जा रही टीम का हिस्सा हैं और भारत के लिये धावक के तौर पर इस अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में भारत का नेतृत्व करने के लिये चुने गये हैं. पेशे से कांस्टेबल नागानाथन ग़रीब परिवार से ताल्लुक रखते हैं| ग़रीबी में जन्म लेना अलग बात है परन्तु इंसान अपने भाग्य का निर्माता स्वयं होता है| नागानाथन ने ये साबित कर दिया कि दृढ़-संकल्प वाली इच्छाशक्ति से मानव कुछ भी कर सकता है|

कठिन संघर्ष किया है नागानाथन ने

पी नागानाथन ने नौकरी के साथ छुट्टियों और वीकेंड में मजदूरी करनी शुरू की| उन्होंने बताया कि “जब मैंने दौड़ लगाना शुरू किया तो मेरे पास जूते नही थे| इसलिये मैं नंगे पैर ही दौड़ा। बाद में जब मैं डिस्ट्रिक्ट स्पोर्ट्स मीट में गया तो मेरे स्कूल ने मुझे एक जोड़ी जूते गिफ्ट किये |”

ओलम्पिक में जाना तय

पी नागानाथन ओलम्पिक में बतौर धावक टोक्यो जा रहे हैं जहाँ वे भारत के प्रतिनिधि के रूप में 4400 रिले की दौड़ में शामिल होंगे| इस दौड़ में उनके साथ त्रिची के अरोकिया राज, केरल के मोेहम्मद अनस और दिल्ली के अमोस जैकब भी होंगे|

इतिहास में बीए किया है नागानाथन

आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि नागानाथन ने बीए (इतिहास में) की पढ़ाई की परन्तु वे इंजीनियरींग करना चाहते थे| पैसों की तंगी और महंगी फीस न भर पाने के कारण वे इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला न ले सके| अपने पुराने दिनों को याद करते हुए उन्होंने बताया कि ” मैं कॉलेज की फीस भरने के लिये पार्ट टाईम काम करता था| सेमेस्टर के अंत में खेल में मेरी परर्फॉर्मेेंस को देखते हुए मेरी फीस कम कर दी जाती थी|”

पसीना बहा कर बनाये रास्ते

पी नागानाथन को खेल कोटे से सशस्त्र रिज़र्व कांस्टेबल की नौकरी साल 2017 में मिली| वर्ष 2019 में ऑल इंडिया मीट में गोल्ड-मेडल से पुरस्कृत हुए| वे अपने मजबूत इरादों के बल पर आगे बढ़ते गये और जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में सीएएम ट्रॉफी भी जीती|

हुई डेढ़ माह की कठोर ट्रेनिंग

पटियाला के “फेडरेशन कप” जो कि फरवरी माह में आयोजित हुआ था भाग ले कर दूसरे स्थान पर रहे|
तत्पश्चात भारतीय टीम का हिस्सा बनने का सौभाग्य मिला और पैंत्तालिस दिनों की कठिन ट्रेनिंग के उपरान्त उनका चुनाव हो गया|

”मैने कभी नहीं सोचा था..”

अपने अनुभवों को सांझा करते हुए उन्होंने कहा कि ” मैंने कभी सपने में भी नही सोचा था कि मुझे ओलम्पिक में भाग लेने का मौका मिलेगा| मैं अपनी सफलता का श्रेय अपने पुलिस कोच प्रभाकरन ,चेन्नई पुलिस स्पोर्ट्स इंचार्ज और सब-इंस्पेक्टर पॉल डोमिनिक तथा शिवलिंगम को देता हूँ| “

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