वैदिक-विचार: भारत ने प्रारंभ किया म्यानमार की सैनिक-सरकार का विरोध

संतोष की बात है कि भारत सरकार ने संयुक्तराष्ट्र संघ और दिल्ली, दोनों स्थानों से म्यांमार के फौजी रक्तपात पर अपना मुंह खोलना शुरु कर दिया है..

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मैने चार-पांच दिन पहले लिखा था कि म्यांमार (बर्मा) में चल रहे नर-संहार पर भारत चुप क्यों है? उसका 56 इंच का सीना कहां गया लेकिन अब मुझे संतोष है कि भारत सरकार ने संयुक्तराष्ट्र संघ और दिल्ली, दोनों स्थानों से म्यांमार में चल रहे फौजी रक्तपात पर अपना मुंह खोलना शुरु कर दिया है।
56 इंच का सीना अभी न तो भारत ने दिखाया है और न ही भिड़ाया है। अभी तो उसने सिर्फ सीने की कमीज के बटनों पर उंगलियां छुआई भर हैं। इसमें शक नहीं कि म्यांमार में अभी जो कुछ हो रहा है, वह उसका आतंरिक मामला है। भारत को उससे कोई ऐसा सीधा नुकसान नहीं हो रहा है कि उससे बचने के लिए भारत अपना खांडा खड़काए लेकिन सैकड़ों निहत्थे और निर्दोष लोगों का मारा जाना न केवल लोकतंत्र की हत्या है बल्कि मानव-अधिकारों का भी हनन है।
म्यांमार में फिलहाल ऐसी स्थिति नहीं बनी है, जैसी कि गोआ और पूर्वी पाकिस्तान में बन गई थी। लेकिन दो माह तक भारत की चुप्पी आश्चर्यजनक थी। उसके कुछ कारण जरुर रहे हैं। जैसे बर्मी फौज के खिलाफ बोलकर भारत सरकार उसे पूरी तरह से चीन की गोद में धकेलना नहीं चाहती होगी। बर्मी फौज के खिलाफ बोलकर राजीव गांधी ने 1988 में जिस आपसी कटुता का सामना किया था, उसके कारण भी भारत सरकार की झिझक बनी हुई थी।
बर्मी फौज ने इधर पूर्वांचल के प्रादेशिक बागियों को काबू करने में हमारी सक्रिय सहायता भी की थी। इसके अलावा बर्मी फौज भारत को बर्मा के जरिए थाईलैंड, कंबोडिया आदि देश के साथ थल-मार्ग से जोड़ने में भी मदद कर रही है। अडानी समूह जैसी कई भारतीय कंपनियां बर्मा में बंदरगाह जैसे विभिन्न निर्माण-कार्यों में लगी हुई हैं। यदि भारत सरकार फौज का सीधा विरोध करती तो ये सब काम भी ठप्प हो सकते थे। लेकिन इस मौके पर चुप रहने का मतलब यही लगाया जा रहा था कि भारत बर्मी फौज के साथ है।
ये बात ठीक है कि फौज को बर्मा में जैसा विरोध आजकल देखना पड़ रहा है, वैसा उग्र विरोध उसने पहले कभी नहीं देखा। 1962 से चला आ रहा फौजी वर्चस्व अभी जड़-मूल से हिलता हुआ दिखाई पड़ रहा है। बर्मी फौज को अक्सर बौद्ध संघ का समर्थन मिलता रहा है, जैसा कि पाकिस्तानी फौज को कट्टर इस्लामी तत्वों का मिलता रहता है लेकिन इस बार बर्मी बौद्ध संघ भी तटस्थ हो गया है।
अमेरिकी और यूरोपीय प्रतिबंधों के कारण म्यांमार की आर्थिक स्थिति बदतर होती चली जाएगी। ऐसी स्थिति में भारत चाहे तो बर्मी फौज को किसी शांतिपूर्ण समाधान के लिए मना सकता है। दूसरी तरफ बर्मी जनता की लोकतांत्रिक भावनाओं के प्रति पूर्ण सम्मान दिखाते हुए भारत को चाहिए कि फौज द्वारा पीड़ितों की वह खुलकर सहायता करे।
बर्मी शरणार्थियों को वापस भगाने का अपना निर्णय रद्द करना केंद्र सरकार का सराहनीय कार्य है। यदि भारत सरकार अपनी जुबान हिलाने के साथ-साथ कुछ कूटनीतिक मुस्तैदी भी दिखाए तो म्यांमारी संकट का समाधान सामने आ सकता है।
(लेखक वेदप्रताप वैदिक भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं)

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