NIG Zoom November 2021: मुगलई गालियां कदापि स्वीकार्य नहीं !!

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न्यूज़ इंडिया ग्लोबल के मंच पर हमारी मासिक वार्ता अत्यंत सफल रही. शनिवार 13 नवंबर 2021 दोपहर 3 बजे इस ज़ूम वार्ता  का आयोजन हुआ. माननीय पारिजात त्रिपाठी जी, आदरणीया उमा प्रभाकरन जी, सुश्री सुनीता मेहता जी, श्री दीपक खंडेलवाल जी की उपस्थिति  में यह कार्यक्रम हुआ.  सभी के विचारों ने वार्ता के लक्ष्य को दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ने के लिये और भी प्रेरित  किया है. ज़ूम मीटिंग  की इस वार्ता का विषय था–” हमारा हिंदू समाज और मुगलई गालियाँ”. नवंबर माह की इस ज़ूम मीटिंग में सभी उपस्थित सदस्यों  ने अपने विचार  व्यक्त किए और कई नए सुझाव भी दिए.

उमा प्रभाकरन – ये है हिन्दुत्व पर भाषाई अत्याचार

उमा प्रभाकरन जी ने कहा कि गालियों का अर्थ हिंदुत्व पर अत्याचार है. हमारी ओर से एकता के अभाव ने ईर्ष्या और गाली-ग़लौज का प्रसार हमारे हिंदू में किया. हम चुप रह जाते हैं तो ही हमें कोई पायदान बना सकता है.

दीपक खंडेलवाल – हमारा मौन है उत्तरदायी

दीपक खंडेलवाल जी ने बताया कि हमारे हिंदू समाज  में गालियों को बढ़ावा देने के पीछे हमारा मौन भी रहा है. हमारे इतिहास के पन्नों को पलटे तो पाएगें कि हमारे सनातन धर्म में महिलाओं का स्थान देवी तुल्य रहा है  . यहाँ नदियों को भी माता शब्द से संबोधित  करते हैं तो गालियों का जन्म हमारी सनातन  संस्कृति से असंभव है. यह भी कहा कि बदलाव  आ रहा है तभी हम आज हमारे अतिथियों को अब ताजमहल के स्थान पर गीता उपहार स्वरूप  भेंट करने लगे हैं.

सुनीता मेहता – गांधी के नकलची बन्दर बन गये हम

सुनीता मेहता जी ने कहा कि हम हिंदू नकल करते हैं ये हमारी कमज़ोरी है और हमने संयम  में रहना  छोड़  दिया है. हम अपनी ओर देखेगें तो, समझ पाएगें कि सामने वाले को  एक ऊँगली दिखाते समय तीन ऊँगलियाँ हमारी तरफ भी मुड़ी हुई हैं तो हमें स्वयं पर कार्य करना होगा.

पारिजात त्रिपाठी – मुगलों की गालियों में है उनकी सोच

पारिजात त्रिपाठी जी के अनुसार गालियाँ मुग़लों की भाषा व सोच है यह हमारी संस्कृति नही.  उनकी संस्कृति  में महिलाओं का सम्मान  ही नही किया जाता. गालियाँ  हमारी भारतीय संस्कृति  की धरोहर नही. गालियाँ  नही अपशब्द का प्रयोग अवश्य होता रहा है हिंदी भाषा में धूर्त, कामी, दुष्ट, अधीर आदि. उन्होंने आगे कहा कि सनातन संस्कृति में कहा गया है कि यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता! अर्थात जहां नारी की पूजा की जाती है वहीं देवता बसते हैं.
भारतीय जीवन शैली में कदम कदम पर धार्मिक मूल्य भारतीयों का मार्गदर्शन करते हैं. ऐसी संस्कृत और हिंदी वाली धरती पर गालियों के लिए कोई स्थान नहीं . मुग़लई भाषा से जन्मे गंदे शब्द आज गाली बन कर बेशर्मी से हिन्दुओं की जुबान पर चढ़े चुके हैं . नारी के यौन अंगों पर आधारित हैं ये गालियाँ जो हिन्दू  संस्कृति में देवी के समान पूजनीय है. बताया कि गाली देने वालों को देवी पूजा बिल्कुल नही करनी चाहिए  क्योंकि ये सब गालियाँ माँ जगदंबा  को लगती हैं. उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि यह सब कुछ जानने के बाद भी यदि कोई हिन्दू गाली दे तो ऐसे हिंदू का बहिष्कार कर देना  ही उचित है और कहा कि खुल कर अपने नाम के साथ जुड़े हुए हिन्दू सरनेम को हटा कर मुगलई सरनेम भी लगा लेना चाहिए ऐसे हिंदू को जो गालियाँ देते हैं.

मुगलियत के बचे निशान हैं उनकी गालियां 

 “मुग़ल चले गए मुग़लियत छोड़ गए” . गालियाँ  हमारी हिंदू संस्कृति की देन नही परन्तु अपशब्द  ज़रूर बोले जाते हैं हिंदी भाषा में निर्दयी, कपटी इत्यादी. सबका यही नारा है “ईमानदारी  से सभी प्रयास करेगें  और अपने-अपने ग्रुप तथा कम्यूनिटी  तक यह बात पहुँचाएगें.”
13 नवंबर को हुई न्यूज़ इन्डिया ग्लोबल की इस वार्ता में बहुत सारे नए विचार व सुझाव भी साझा किए गए ताकि बिगड़े परिवेश में कैसे सुधार लाया जाए.  इन सुझावों पर कार्य भी होगा और आशा है सबका साथ जन जागृति और विकास की लहर को ज्वार-भाटे में परिवर्तित  होने में समय नही लगेगा.  प्रत्येक माह की पंद्रह तारीख एनआईजी ज़ूम मीटिंग के लिये तय की गई है जो राष्ट्र निर्माण व चरित्र निर्माण के प्रयोजन से ये मीटिंग्स अनवरत जारी हैं.
भारत माता की जय ! वंदे मातरम ! जय माँ भारती !