Noida Twin Towers: धूल में मिलाई जायेंगी 40 मंजिला दो इमारतें, अवैध निर्माण के लिये सुपरटेक पर चला सुप्रीम हथौड़ा

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ये एक ऐसी सच्ची कहानी जो आज प्रॉपर्टी के क्षेत्र के बड़े सच से पर्दा उठाती है. ये आज के दौर में इस सेक्टर का एक बड़ा सच है जिसके वजूद से वो लोग बड़ी अच्छी तरह से बावस्ता हैं जिन्होंने इसका दर्द भुगता है क्योंकि ये पीड़ा एक दिन की नहीं की नहीं होती, इसमें बरसों बरस की आहें होती हैं.
मामला ये रियल एस्टेतट कंपनी सुपरटेक से जुड़ा हुआ है जिसके खिलाफ हाल ही में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया है कि उसकी बनाई गई एमेराल्ड बिल्डिंग के दो टावर्स गिरा दिये जायें. ये एक हैरतअंगेज फैसला है मगर माननीय अदालत ने इस फैसले से देश के सामने एक मिसाल पेश की है और आने वाले दिनों में चाहे वो बिल्डिंग बनाने वाले हों या बिल्डिंग में रहने के लिये फ्लैट्स खरीदने वाले हों –सभी को इससे मार्गदर्शन जरूर मिलेगा. चाहे इसे गलती कहें या जान-बूझ कर किया गया अपराध –इसकी सजा का दोहरा भुगतान नहीं होना चाहिये न खुद को न अपने ग्राहकों को.

तब दर्द ज्यादा होता है जब कोई बेकरारी अपने अन्जाम पर पहुंच रही होती है और ऐन वक्त पर वक्त की मार उस पर पड़ती है और उम्मीदें टुकड़ों में टूट कर बिखर जाती हैं. ये खयाल नहीं जिन्दगी का वो सच है जो कभी-कभी जिन्दा हो कर सामने खड़ा हो जाता है. लेकिन आज जिस सच की हम बात कर रहे हैं वो जुड़ा हुआ है नोएडा शहर से और यहाँ की एक बड़ी खूबसूरत बिल्डिंग से जिसमें फ्लैट खरीदने वालों के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है और वे किस्मत की इस नाइन्साफी पर यकीन नहीं कर पा रहे है.

चलना होगा जरा पीछे. इस पूरे दौर को बताने में दस साल पहले के नोएडा में जाना होगा. इस सच्ची कहानी को अपने अन्जाम पर पहुंचने में दस साल से ज्यादा का वक्त लग गया. मगर इसकी असली शुरुआत हुई थी लगभग सोलह साल पहले सन 2004. साल 2004 से 2012 के बीच इस भूखंड पर निर्माण के प्रोजेक्ट को और मैप को समय-समय पर साल 2005, 2006, 2009 और 2012 में अनुमति प्रदान की जाती रही. और यही वो दौर है जिसके दौरान इन प्रोजेक्ट्स को लेकर अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध पाई गई है.
अब कहानी को आप ऐसे समझ सकते हैं कि ये है जीत एक लंबी लड़ाई की जिसमें चार वरिष्ठ नागरिकों ने लगभग दस साल तक संघर्ष करते हुए प्रदेश के एक जानेमाने बिल्डर को घुटनों पर ला दिया है और साबित कर दिया है कि अंत में सत्य की विजय होती है. इस जीत के नायकों में शामिल हैं उन्यासी साल के यूबीएस तेवतिया, चौहत्तर साल के एसके शर्मा, पैंसठ साल के रवि बजाज और उनसठ साल के एमके जैन. इन चारों याचिकाकर्ताओं के न्याय की मांग को एक बार नहीं दो दो बार जीत हासिल हुई है.
हालात पर एक पूरी नज़र डालें तो कुल मिला कर ये मामला क्या है. नोएडा के सेक्टर 39-ए में एक रिहाइशी बिल्डिंग है जिसका नाम है सुपरटेक एमेराल्ड. इसका निर्माण साल 2009 से पहले हो चुका था और इसमें लोगों ने रहना भी शुरू कर दिया था. इस बिल्डिंग के लोगों में चार ही ऐसे जागरूक लोग थे जिन्होंने सुपरटेक ग्रुप द्वारा यहाँ ट्विन टावर के निर्माण की गैरकानूनी योजना का विरोध किया. और फिर यूबीएस तेवतिया, एसके शर्मा, रवि बजाज और एमके जैन ने मिल कर इसके खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया.
रियल एस्टेट कंपनी सुपरटेक के खिलाफ इस बड़ी जीत की कहानी के चारो विजेताओं ने उस समय सुपरटेक के इस अवैध निर्माण का विरोध किया लेकिन जब अधिकारियों और मालिकों से इस विरोध पर उनकी बातचीत बेनतीजा रही तो उन्होंने हालात को किस्मत के भरोसे छोड़ने का फैसला नहीं किया. और तब इस लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिये इन चारों ने एक लीगल कोर कमेटी बना ली औऱ पहुंच गये अदालत. जानते हुए भी कि जरूरी नहीं कि जीत उनके ही हिस्से में आये, उन्होंने एक लंबी लड़ाई का आगाज़ कर दिया औऱ इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनके सच को स्वीकार कर लिया.
बिल्डर ग्रुप सुपरटेक को खिलाफ चार लोगों की इस लड़ाई में साल 2014 में आया पहला ऐतिहासिक फैसला. और सच की जीत पर यकीन रखने वाले इन चारों लोगों के अलावा सभी हैरान रह गये जब अदालत ने माना कि सुपरटेक एमेराल्ड बिल्डिंग के प्रांगण में बने ये ट्विन टावर्स अवैध हैं. अदालत ने नोएडा प्राधिकरण को ऐसा होने देने के लिये कड़ी फटकार लगाते हुए आदेश दिया कि इन टावर्स को ध्वस्त किया जाये और बिल्डर इस ध्वस्तीकरण से पीड़ित होने वाले सभी होमबायर्स को उनके पैसे ब्याज सहित वापस करे. इतना ही नहीं अदालत ने और मिलीभगत के दोषी अथॉरिटी के अधिकारियों पर भी कार्रवाई का आदेश दिया.
सुपरटेक कंपनी अब भी अपनी गलती मानने को तैयार नहीं हुई औऱ इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ उसने सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी. और फिर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाइयों का सिलसिला लगभग साढ़े सात चला और फिर आ गया वो दिन भी जब दूसरा ऐतिहासिक फैसला सुना दिया सुप्रीम कोर्ट ने. जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच ने इस लड़ाई में फिर चारों याचिकाकर्ताओं का साथ दिया और सुपरटेक के खिलाफ फैसला सुनाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दो माह के भीतर इन टावर्स को गिरा दिया जाये और दो माह के भीतर ही पीड़ित होमबायर्स का पैसा ब्याज सहित लौटाया जाये और इन दोनो ही कामों में लगने वाला पैसा सुपरटेक को देना होगा.
एमराल्ड कोर्ट टावर मामले में विभिन्न विभागों के कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सुपरटेक के 915 फ्लैट और दुकानों वाले 40 मंजिला दो टावरों का निर्माण नोएडा प्राधिकरण के साथ सांठगांठ कर किया गया है. साढ़े सात साल पहले जब मुकदमा शुरू हुआ था तब सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश पर अपील के दौरान रोक लगा दी थी. अब नोएडा प्राधिकरण की निगरानी में इस निर्माण को ध्वस्त करने के सुप्रीम आदेश के बाद इस बिल्डिंग के रहवासियों में खुशी की लहर देखी जा रही है. आइये अब जान लेते हैं इन ट्विन टावर्स के बारे में जिनको दो माह के भीतर तोड़ दिया जायेगा.
प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भ्रष्टाचार के मामलों के खिलाफ कड़ाई दिखाते हुए सुपरटेक एमेराल्ड टावर मामले में अथॉरिटी की मिलीभगत के गहन जांच के निर्देश दिये हैं. मुख्यमंत्री ने निर्देश दिये हैं कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अक्षरशः पालन सुनिश्चित कराया जाये और एक एक दोषी की पहचान करके उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया जाये. इस प्रकरण में पूर्व में सुनवाई के समय समस्त तथ्यों से उच्चाधिकारियों को अवगत नहीं कराए जाने के कारण नियोजन विभाग के दोषी कर्मियों के विरुद्ध विभागीय कार्यवाही भी शुरू कर दी गई है. मुख्यमंत्री योगी ने बाकायदा एक बैठक बुला कर इस जांच के लिये एसआईटी घोषित कर दी है और अब आने वाले दिनों वे सभी चेहरे बेनकाब होंगे जिन्होंने विभिन्न सरकारी विभागों में रहते हुए भ्रष्टाचार के इस कारनामें में सहयोगी भूमिका अदा की है.
दो बड़ी कामयाबियां मिली हैं इस लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने वालों को. पहली तो ये है कि उनकी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के दिये फैसले ने एक नज़ीर पेश की है जिसके बाद अवैध निर्माण करने वाले लोगों की इन गैरकानूनी कोशिशों पर बंदिश लगेगी. दूसरी बड़ी बात ये है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अदालत के फैसले को सम्मान देते हुए इस भ्रष्टाचार में अथॉरिटी के अधिकारियों की मिलभगत की जांच के आदेश दे दिये हैं और उनके द्वारा गठित एसआईटी ने इस मामले पर अथॉरिटी के प्लानिंग विभाग के पूर्व मैनेजर को सस्पेन्ड भी कर दिया है. ज़ाहिर है इन कोशिशों से अवैध निर्माण के साथ ही भ्रष्टाचार पर भी लगाम लगेगी.
सुपरटेक एमेराल्ड के अवैध निर्माण वाले इस मामले सुप्रीम अदालत के सुपर जजमेन्ट के बाद अब सुपरटेक बिल्डर इस बिल्डिंग की आरडब्ल्यूए को 2 करोड़ रुपये का भुगतान करेगा. अब दो माह में होगा रिफंड और तीन माह में गिरेंगे दोनो महाटावर. टावर तो गिरेंगे ही लेकिन इसके पूरे आसार हैं कि इंग्लैन्ड शिफ्ट होने की तैयारी में नजर आ रहे सुपरटेक ग्रुप के मालिकान अगर रिफंड वापसी से बचने का कोई बहाना ढूंढ लेंगे और मामले को फिर अदालती लड़ाई के लिये तैयार कर देंगे तो वो अगली लड़ाई होमबायर्स के लिये कितने वक्त के साथ कितनी तकलीफों की कुर्बानी लेगा, ये सवाल भी ला-जवाब है.

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