पालकी में हो के सवार चली रे! : Ansuni Anuradha

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आज फिर आपकी अनुराधा एक बार फिर आपके साथ ….एक नया मोड़ …नए सफर पर….अपने वो  गाना। तो सुना ही होगा …जिसमे माधुरी ने लोगो को अपना खूब दीवाना बनाया..वेसे तो उनका हर गाना,, हर फिल्म,, का मतलब ही दीवानों की लंबी कतार है… लेकिन आज अनुराधा बात कर रही है.. पालकी मे हो के सवार चली रे….जी हां…

  आया कुछ याद ..बस आज की हमारी कहानी    की  नायिका कुछ ऐसा ही कर दिखाने वाली है…

   बात कुछ बीते दौर की…जहाँ लड़कियों की बात  ज्यादा गंभीरता से नहीं ली जाती थी,,  लड़कियों की घर मे बस इतनी पहचान थी की पराया धन है ,, की पराया धन है..  माँ की लाडली, बापू की पयारी, भाइयो की सर चढ़ी बहन.. लेकिन जब तक इनकी बात सुनती रहे,, सर झुका के ..

तो ऐसे ही ये भी बात है एक  हरियाणा के गांव की .. छोरी जाटो की थी…  जो सर मे आ गई कर के ही मानेगी.. एक बार बोल दे फिर किसी की न सुने.. दिमाक ख़राब ,, इरादे मजबूत,,

सुन्नीत्ता नाम है मारा.. सुनती किसी की न …

तीन भाइयो की अकेली बहन,, पिता की भी कोई अपनी बहन नहीं थी,, चार चाचा, ताऊ, उनके भी सब के बेटे,, सुनीता के पिता जी तीसरे नंबर के थे,,  दो पीढ़ी बाद कन्या धन की प्रप्ति हुई थी,, तो  बोलना थोड़ा जल्दी, और थोड़ा सा,, बस थोड़ा ही ज्यादा सिख गई थी, घर मे दूध, मक्खन, दही, मिठाई  कुछ भी हो बड़े ताऊ जी के हुक्म से पहले सुनीता देवी को ही भोग चढ़ता था।

  लेकिन हाँ लाडली पढ़ाई मे भी अच्छी थी,, स्कूल  के खेलो मे हिस्सा लेना और इनाम जीत कर आना इसकी पूरी गारंटी थी,, खैर दसवीं मे बहुत अच्छे नंबरो से अवल आई थी ,, इसी ख़ुशी मे ताऊ जी ने पूरे गांव का भोज रख दिया। और बिरादरी के सभी लोग भी आये। क्यू की लाडली का समारोह था तो सब को आना जररूरी था,, गर कोई गलती कर देता, बड़े ताऊ जी बिरादरी से उसका हुक्का पानी बंद करा देते,, बड़े ताऊ जी की चलती बहुत थी,,

आज गांव ऐसा सजा था जैसे कोई विवाह का शुभ अवसर हो,, चारो और चहल , पहल,  आज दिन सुबह तीन बजे ही निकल आया था, बड़े ताऊ जी डर के मारे,, नगर निगम की गाड़ी समय से पहले आ गई थी सारे गांव मे छिड़काव जो करना था,, रास्तों पर चुना डाला जिससे आने जाने वालों को परेशानी न हो,  टेन्ट के बाहर  बैनर लगाया गया ..और बड़े बड़े अक्षरों मे बड़े ताऊ जी लिखवाया …  मारी  अवल सुन्नित्ता बेटी …  75%   नंबर सबसे आगे..

   सुनीता बेटी का दिमाक कुछ आज ज्यादा ही ख़राब हो रहा था ,, सीधे महुँ सुबह से किसी से बात नहीं कर रही थी,, गांव की पहली पढ़ी लिखी लड़की जो थी। अब जोर शोर से समारोह आरंभ हुआ,, बधाई और आशीर्वाद देते हुए पूरा परिवार, और रिस्तेदार बहुत खुश थे।

   की इसी बीच पंजाब से आये एक खास रिस्तेदार जो बहुत ही सम्प्पन परिवार से थे,, उनका बेटा  अभी अभी 2 महीने पहले ही जम्मू , कश्मीर बॉर्डर पर  सूबेदार की पोस्ट पर भर्ती हुई थी,, रिस्तो की कमी उनको भी नहीं थी,, लेकिन वो इस परिवार से संम्बध जोड़ना चाहते थे।

छोटा सा  ही परिवार था दो भाई बड़े बेटे की भी बहुत आछे परिवार मे शादी हुई थी, वो और पिता जी सारी ज़मीन जायदाद का हिसाब रखते थे। क्यू की राजवीर छोटा था तो उसे शरु से ही। पढ़ाई मे रखा,और माँ की बहुत इच्छा थी मेरा एक बेटा सरकारी नोकरी पर हो और  वो भी फ़ौज मे।

   बस दोनों परिवारों की सहमति होते ही सुनीता का बहुत धूम  धाम से रिश्ता हुआ,,  शादी ऐसी जो सालो गांव वाले, बिरादरी भूल न पाए।

  अब सुनीता अपने घर पंजाब, गुरदास पुर की बड़ी हवेली की छोटी मालकिन थी,, घर मे नोकर चाकर, सब था लेकिन  फिर भी हवेली के अंदर के काम तो देखने ही पड़ते थे। सब कुछ नोकरो के ऊपर तो नहीं  छोड़ा जा सकता था।

सुनीता जहाँ बहुत ही लाड़ प्यार से पली बड़ी हुई थी,, वही बड़े घर की बड़ी बड़ी जिम्मेदारी …. अपनी तरफ से तो ठीक ही करती लेकिन फिर भी कही न कही गलती हो ही जाती,, हाँ बस ऊपर बेठे भगवान इतना शुक्र मानते की अभी वो किसी को जवाब नहीं देती थी,, शादी के 15 दिन हो चले थे आज राजवीर को अपनी ड्यूटी पर वापस जाना था। अभी तो ठीक से जान भी नहीं पाए थे दोनों एक दूसरे को की बिछड़ने की घड़ी भी आ गई। अभी रिस्तेदार भी ठीक से विदा नहीं हुए थे,, की राजवीर का बक्सा ,बिस्तरबंद, बंध चूका था।

    कल से ही उदास सुनीता  बस चुप चाप कही कोना ढूढ़ कर अपने आंसू पोछ देतीं ,, राजवीर भी कहाँ जाना चाह रहा था। एक बार तो मन मे आया छोड़ दू नोकरी यही भाईसाब, और पिता जी के साथ …. लेकिन ये संभव तो नहीं था।  राजवीर की गाड़ी का समय हो चला था, ,, भाईसाब और कुछ दोस्त स्टेशन तक छोड़ने जा रहे थे। की सुनीता ने अपने कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया था और कमर कर बस रो रही थी,,  अब हाथो की भरी भरी चूड़िये, गले का मंगल सूत्र, पैरों कि पायल सब जैसे बोझ लग रहे थे।  माँ बार बार राजवीर को प्यार , आशीर्वाद दे रही थी लेकिन राजवीर की नज़रे किसी और को ढूढ़ रही थी। भाईसाब बार बार हॉर्न दे रहे थे…. चल भई …ओ फौजी…आ जल्दी,, गाड़ी तेरा इंतज़ार नहीं करने लगी।।।

   लेकिन फौजी…  तो एक बार अपनी सुनीता को देखना चाहता था,,  बढ़ते कदम बार बार रुक रहे थे की दवाज आ गया और चौखट पार गाड़ी मे बैठ गया।

    गाड़ी की जाती आवाज सुनीता को और बैचेन कर रही थी की खिड़की से बहार देखा लेकिन उड़ती धूल मे कुछ साफ नहीं दिख रहा था। दो, तीन घंटे हो गए थे,, सुनीता कमरे से बाहर नहीं आई,,

  की जिठानी जी ने जोर से दवाज बाज़या ,, सुनीता,, .. सुनीता..  क्या कर रही है…आ बहार  खेत पर  मजदुरो का खाना भेजना है,,  शहर से आये है न  …..नया ट्यूबेल लग रहा है…  रसोई आज हमें ही देखनी है.. सुनीता  अभी भी खिड़की पकडे खड़ी थी… दरवाजा दुबारा बजता है .. अब मै बार बार तुझे ही बुलाती रहूंगी काया…   सुनीता खुद को सँभालती हुई,,, अब तो वो छः महीने बाद ही आ पाएंगे …  और सर पर दुप्पटा करती हुई कमरे से बाहर निकल आई..

   रसोई के काम मे आज मन नहीं लग रहा था । तो रोटी कभी मोटी हो जाती,, कभी जल जाती,, दाल भी आज….  और सुनीता अब फिर अपने कमरे मे तकिए को अपना साथी समझ गले मिल कर रो रही थी।

   आज तीन दिन बाद राजवीर का फोन आया ,, सब से बात होने के बाद अब सुनीता को फोन मिला.. पहली लाइन.. कब आओगे जी… और  बस बिना जवाब दिए फ़ोन काट दिया राजवीर ने,, दोनों तरफ   हल्की बुँदे गिर रही थी,,

   सुनीता  कुछ दिन माँ के पास गई लेकिन सहेली, भाभीय, अपनी किताबे अब सब से नाता टूट चुका था।  और फिर एक बार सुराल गेंदा फूल,, अब जिठानी हुकुम चलाती,, और सुनीता जी हजूरी,,  सासु माँ को बस टाइम से दो रोटी मिल जाये ..बहुत है.. लेकिन जिठानी की हुकूमत दिन पर दिन बढ़ती जा रही थी,, राजवीर होते तो बरदाश करना थोड़ा आसान हो जाता।। पर अब..

     एक तो जिठानी रिश्ते मे बड़ी और ऊपर से 11 फेल  ,, सुनीता बेचारी रिश्ते मे भी छोटी,, और 10वि पास,,  आज तो हद हो गई  घर के नोकर खेत पर काम कर रहे थे   ,, सबका खाना बनाया,,  सास का कमरा साफ किया,, अभी खाना भी नहीं खा पाई थी की जिठानी जी ने हुकुम सुना दिया जरा मेरे तलवो की मालिश कर दे, पैरों मे बहुत दर्द है…  मज़े की ज़िन्दिगी जी रही है .. मुझे देख तेरे जेठ कैसे आर्डर पे ऑडर  चलाते है…   बस सुन कर पुरानी सुनीता नीद से जाग गई,, और पहला डायलॉग … सुन्नीत्ता नाम है मारा.. सुनती किसी की न..   आज की सुपर हिट फिल्म सब ने देखी,,   बस किसी तरह बात सासू माँ ने संभाल ली,,, और सुनीता को बोला तू छोटी है चल माफ़ी मांग ले…

  न्यूज़ मे आ रहा था ,, बॉर्डर पर आतंकी हमले मे हमारे सेनिको ने जोरदार जवाबी कार्यवाही की,, दोनों और सैनिक कमान संभाले थे,, अपने तिरंगे के सम्मान के खातिर जान लेने, देने को तैयार…
माफ़ी …माफ़ी मांगे मेरी तो …जूती भी न…
और सुनीता सीधे अपने कमरे मे.. सामने एक बैग मिला और तीन जोड़ी सूट रख ,, पैसे ले सुनीता निकल पड़ी,, बिना किसी की परवाह किए,,, बस स्टैंड पर पुहुच तो गई,,

   सामने बस खड़ी थी ,, दिल्ली से हिमाचल…बस….. यही तो मंज़िल थी सुनीता की..न जाने किस की सीट पर कब्ज़ा किया.. बस मे गाना चल रहा था…. पालकी मे होके सवार चली रे…
और अगले तीन घंटे मे वो अपनी मंज़िल के करीब थी,,  उसकी आँखों के सामने मिल्ट्री एरिया था,,  की सूबेदार जी की पत्नी दनदनाती हुई अंदर दाखिल हुई जा रही थी,, की एक जोर दार कड़क आवाज आती है …अरे ..रूको कहा.., कोन है आप.. अन्दर कहाँ जा रही है… और सुनीता अपने तेवर मे .. बता दिया न तो अभी सलाम करोगे …मने.. सूबेदार जी को बोलो सुनीता आई है.. सेक्युरिटी ..कुछ रुक कर ..जी..सुनीता फिर उसी अंदाज मे …कान मे तेल न डालते क्या.. अपड़े सूबेदार राजवीर जी को बुलाओ …बोलो सुनीता आई है… सेक्युरिटी,,, जी आप बैठे मै  अंदर इतलाह करता हूँ…   अंदर वायरलेस जा चूका था,,  सूबेदार जी किसी मिशन को ले कर मीटिंग कर रहे थे,, की  उनका एक साथी तेज़ कदमो से आया ..ओय राजबीर बहार तो चल यार..मुझे लगदा .. पार्जयी आई है,,, राजवीर जैसे किसी ने धक्का दिया हो,, क्या,, कोन,,

   औओ तू चल न,,, और सूबेदार साहब .. मेरेथन मे हिस्सा लेने जा रहे थे,, राजवीर समझता तो था सुनीता को ,, की गर्म दिमाक की है पर ऐसा कर जायेगी,,,

   सारे कैम्पस मे हँसी के ठहाके गूंज रहे थे,,, और ठीक  ढाई मिनट बाद सूबेदार  साहब अपनी सुनीता के सामने खड़े थे ।।

अरे ये तो सच मे सुनीता है,,  अभी भी सिक्योरिटी से अंदर जाने के लिए लड़ रही थी,, अभी  जानता नहीं है मेरे बारे मे… और राजवीर जैसे छलांग मार कर अरे  तुम यहाँ काया कर रही हो…राजवीर को देख सुनीता जैसे गले से लिपट गई,,, कुछ देर के लिए दोनों की सांसें बंद हो गई थी,, आस पास ऐसा माहौल देख,, सब कही न कही अपने आपने प्यार को याद कर रहे थे,,  कोई मुस्कुरा रहा था,, किसी की आँखे नम थी,, कोई हँस रहा जैसे फिल्म की शूटिंग चल रही हो,,  की एक दिन ऐसा भी बनाया जाये  कैम्प्स  मे ,,,

  और अब सुनीता एक सांस मे ,,, पहले तो इसको  डाटो जी,, ये मने  अंदर ही न अन्न दे रहा था।। इसकी बदली कराओ बस,, अभी की अभी,, ।।

राजवीर अच्छा वो सब ठीक है पर तुम यहाँ कैसे,, घर पर सब ठीक,,, और सुनीता जोश मे ,, वही तो सब ठीक न है.. और एक सांस मे सब बोल दिया,,,  बचपने का प्यार देख सब हँस रहे थे,, और सुनीता चिलाती हुई,, अब सुनो मेरी बात ,, मै अब कही जाने वाली नहीं ,, तुम कुछ भी इन्तज़ाम कर लो।। सुनीता जो किसी की न सुनने वाली थी,, अपने राजवीर की सुन रही थी,, और अपनी सुना रही थी,,।।।

   सच बात है दो सच्चे प्रेमियों को मिलने के लिए   कायनात भी जुट जाती है.. लकीरे भी अपना फैसला बदल डालती है,,,,