परख की कलम से: अब एक Aryavart की तैयारी करनी होगी !

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आज विषय अति गंभीर मगर रोचक है बात को सीधा कहने की जगह घुमाकर कहना सटीक होगा।
जरासन्ध को हराकर भी कृष्ण ने मथुरा छोड़ दी, इसका एक बड़ा कारण यह भी था कि यदुवंशियों का एक बड़ा हिस्सा अब भी कृष्ण से कंस वध को लेकर नाराज था। संभव था ऐसे लोग अन्य यदुवंशियों को भड़काते या गद्दारी करते।
इसलिए कृष्ण ने द्वारिका की स्थापना का विचार सामने रखा, जरासंध मथुरा का भूखा था उसे मथुरा मिल गयी और यादवो ने मथुरा से भी श्रेष्ठ द्वारिका का निर्माण कर लिया और आगे का जीवन शान से बिताया। जबकि मथुरा में होते तो फिलोसोफी को लेकर लड़ रहे होते।
अब मुख्य शास्त्र पर आते है, यहाँ मथुरा का अर्थ भारत से है, तत्कालीन यदुवंशी आज सवर्ण है और जरासंध से अभिप्राय भीमटो से है।
अम्बेडकरवादी आज भी हमारी ही स्थापित कम्पनियो में नौकरी कर रहे है और हमारे ही खिलाफ जहर उगल रहे है। मतलब साफ है इनकी नफरत कभी समाप्त नही होने वाली है।
हम कितना ही उन्हें गले लगा लें मगर उनके मन मे यह बातें घर कर चुकी है कि हमने 84 हजार स्तूप तोड़े और कई बौद्ध मंदिरों को हिन्दू मंदिरों में परिवर्तित किया। उनके यूटयूब चैनल इसी नफरत से भरे पड़े है।
मेरा मत है कि हम सवर्ण ये स्वीकार कर लेते है कि हमने उन पर अत्याचार किये और पश्चाताप स्वरूप हमे इस देश को अपने अपने व्यापार और धन समेत छोड़ देना चाहिए। इक्ष्वाकु के समय से हम यहाँ है कदाचित हमारा समय पूर्ण हो चुका है।
वैसे भी हम कोई मजहब तो है नही, है तो बस मनु द्वारा स्थापित मानव सभ्यता। सभ्यता धरती के किसी भी टुकड़े पर हो वह सभ्यता ही कहलाएगी।
मैं किसी भी प्रकार से देशद्रोह का समर्थन नही कर रहा बस सवर्णो से अपील कर रहा हुँ कि अब हमें इस देश के हित के लिये इस देश को छोड़ देना चाहिए वरना हमारे साथ वही होगा जो रूसी क्रांति में चर्च के साथ हुआ था।
प्रश्न मौत से भयभीत होने का नही है अपितु प्रगति और विकास का है। आप इस पोस्ट को हवा में कही गयी बात कह सकते है, मगर इस पोस्ट को उसी तर्ज पर लिखा गया है जैसे कार्ल मार्क्स ने साम्यवाद की थ्योरी दी थी। यह कैसे होगा मैं नही जानता मगर ऐसा कुछ होना चाहिए यह दृढ़ है।
अगले 150 वर्षो में हम इसे क्रियान्वित कर सकते है, यदि पाँच हजार वर्ष पूर्व समुद्र के बीच द्वारिका खड़ी हो सकती थी तो अब एक आर्यावर्त क्यो नही हो सकता। सवर्ण हिन्दुओ को इस पर विचार करना चाहिए और प्रशांत महासागर में एक बड़े द्वीप की खोज करना चाहिए।
पाठको में से भी कितने ही होंगे जो अपनी प्रगति के लिये अपने परिवार से अलग हुए होंगे, ये कायरता नही थी अपितु नवनिर्माण था। सवर्णो को फिर से अपने ऐतिहासिक नवनिर्माण की दिशा में विचार करना चाहिए।
हमारे पास आज तकनीक है, दिमाग है, पैसा है हम बस आरक्षण और दलितवाद की राजनीति की वजह से पीछे है। क्यो न कारण को उसकी जड़ समेत उखाड़ फेंका जाए? आगे आप अपने विचार रखने के लिए स्वतंत्र है…. जनसँख्या कम हो मगर श्रेष्ठ हो!
(परख सक्सेना)

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