Parakh ki kalam se: अब लाहौर, कराची और पेशावर चाहिये!

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पाक अधिकृत कश्मीर एक मुद्दा है मगर भारत को चाहिए कि पाकिस्तान के तीन शहर लाहौर, कराँची और पेशावर भी हमारे नक्शे में हो।

पिछले कुछ दिनों में ऐसे लेखों की बाढ़ आ गयी है जो कहते है कि लाहौर भारत का अंग होना चाहिए, इसका एक बड़ा कारण ऐतिहासिक है।

यदि आप विक्रमादित्य के समय की अर्थव्यवस्था देखे तो इतना समझ मे आता है कि मध्य एशियाई देश हमेशा से हमारे असली बिजनेस पार्टनर रहे है। प्राचीन भारत के लोग लाहौर में उत्पादन करते थे, पेशावर से यह सामान उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान होते हुए रूस और यूरोप तक जाता था जो कि बेहद सस्ता मार्ग था।

मगर 1947 में जब पाकिस्तान बना तो ये दो प्रमुख शहर पाकिस्तान में चले गए। केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख का वह हिस्सा जो अफगानिस्तान से लगता है वह भी पाकिस्तान के नियंत्रण में है। पाकिस्तान भारत और उज्बेकिस्तान के बीच कोई ट्रेड नही होने देता जिसके कारण इन देशों की निर्भरता चीन पर इतनी ज्यादा है कि वे अब डरने लगे है।

उज्बेकिस्तान बहुत बार पाकिस्तान को बोल चुका है की हमे भारत से व्यापार करने दो मगर पाकिस्तान ने बॉर्डर सील की हुई है। इसकी वजह से उज्बेकिस्तान OIC में हमेशा पाकिस्तान का अन्य मुद्दों पर विरोध करता है।

यदि हमें चीन से आर्थिक युद्ध जीतना है तो ये रास्ता हमे हर हाल में चाहिए। चीन भी अपना अधिकांश सामान इसी रास्ते से यूरोप भेजता है और चूंकि इस रास्ते की उपलब्धता भारत को नही है इसलिए चीन अकेला खिलाड़ी बन गया है।

वर्तमान में ना सही मगर दूर भविष्य में हमें इस गलियारे की बहुत जरूरत है। जो लोग लेखन में स्मार्ट है उनसे आग्रह है कि आप अपने लेखों के माध्यम से एक छोटे स्तर का यह अलख जगाए की लाहौर और पेशावर भारत के लिये कितने उपयोगी है।

लाहौर और पेशावर भारत की संस्कृति पर कैसा प्रभाव डालते है? एक प्रकार से भारतीयों को 2040 तक लाहौर और पेशावर की कमी खलनी चाहिए। यदि 1947 की बात करे तो लाहौर की गिनती दिल्ली के बाद होती थी, यहाँ 40% हिन्दू और सिख थे जो पक्के व्यापारी थे।

1961 तक इन्हें यहाँ से खत्म कर दिया गया इनकी दुकानों और हवेलियों पर जेहादी आ गए। 1980 तक ये हवेलिया और दुकाने जर्जर हो गए क्योकि मुसलमान इन्हें संभाल नही सके और आज भारत की टियर 3 सिटीज भी लाहौर से आगे निकल गयी है।

अमृतसर से लाहौर मात्र 40 किलोमीटर दूर है, मगर जब आप दोनो की तुलना करते है तो दुख होता है कि लाहौर कितना पिछड़ चुका है। लाहौर का इतिहास भी बड़ा रोचक है, भगवान श्री राम ने निर्वाण से पूर्व अपनें बड़े बेटे कुश को अयोध्या का राजा बनाया था।

लव को उस समय पश्चिमी भारत भेजा गया था जहाँ उन्होंने लाहौर बसाया था। हालांकि बाद में सूर्यवंशियों में गृहयुद्ध हुआ और लाहौर पर कुश के वंशजों ने अधिकार कर लिया था। उसके बाद से ही लाहौर चंद्रवंशी, मौर्य, गुप्त, राजपूत, मराठा और सिख साम्राज्य का अंग बनकर ठाठ का गढ़ बना रहा।

हमारा इतना प्राचीन शहर आज पाकिस्तान के पास है, ये पाक अधिकृत कश्मीर से बड़ा मुद्दा है बस कोई उठाता नही। अगली पीढ़ी को चाहिए कि वे राष्ट्र के विकास के लिये अपनी इस औद्योगिक नगरी को फिर से मूलधारा से जोड़े और राष्ट्र को विकास मार्ग पर ले जाये।

(परख सक्सेना)