परख की कलम से : भारत बन सकता है सुपरपॉवर

Share on facebook
Share on twitter
Share on pinterest
Share on telegram
Share on whatsapp
Share on email

रावण और कुबेर का देश रहा श्रीलंका आज भूखे मरने की हालत में आ गया है।
दरसल पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देशों में नेता प्रधानमंत्री बनते ही ये सोचता है कि किसी भी तरह 5-10 साल अच्छा कमाकर निकाल लूं और देश अगली सरकार भरोसे छोड़ जाऊं।
यही हुआ भी है श्रीलंका ने वित्तीय आपातकाल की घोषणा की है, जब 1965 में भारत मे आर्थिक संकट आया था और भारत को अमेरिका से सस्ते गेँहू खरीदने पड़ रहे थे तथा शास्त्री जी उपवास रखने की अपील कर रहे थे।
उस समय सलाहकारों ने उन्हें कहा था अभी हालात उतने बुरे भी नही है हम काबू पा सकते है आप आपातकाल मत लगाइए।
अब सोचिए श्रीलंका में यह आपातकाल लग चुका है वहाँ स्थिति क्या होगी? सस्ते गेँहू और उपवास से भी बदतर हालात है तो क्या श्रीलंका की स्थिति भी यमन और लीबिया जैसी हो जाएगी? इसकी संभवानाएं तो बिल्कुल है।
श्रीलंका एक परनिर्भर देश है ये पूरी तरह खरीददारी पर ही टिके है, ऊपर से चीन का कर्जा अलग। चीन की ब्याज दरें किसी को भी नही पता, जाहिर है पूर्व सरकारों ने अपना कार्यकाल अच्छे से निकालने के चक्कर मे भविष्य को ताक पर रख दिया था।
दरसल चीन इन कमजोर देशो को पहले लोन देता है इस लोन का ब्याज इतना होता है कि सरकार बिकने लगती है और जब कर्जा नही चुका पाती तो अपना कोई शहर चीन को गिरवी रख देती है और चीन इस तरह अपना साम्राज्य बढ़ाता है।
श्रीलंका पहले ही हंबनटोटा बंदरगाह गिरवी रख चुका है हो सकता है अब कोई अन्य शहर चीन के पास गिरवी रख दे। पाकिस्तान पहले से ही चीन की जेब में आ चुका है, अफगानिस्तान में भी चीन अपनी पैठ जमाने लगा है।
मगर यक्ष प्रश्न यही है कि चीन क्या इन सबका फायदा उठाकर सुपरपॉवर बन सकेगा? तो इसका सीधा सा प्रतिप्रश्न है “what next after Xi Jinping”
चीन जिस पैसे से इन कमजोर देशो को खरीद रहा है वो चीन की जनता का पैसा है। जब अगला राष्ट्रपति आएगा तो उस पर प्रेशर होगा खुद को शी जिनपिंग से अच्छा साबित करने का। जाहिर है वह जल्दबाजी में बड़ी बड़ी गलतियां करेगा।
वही गलतियां जो सोवियत संघ करता था, चीन में गृहयुद्ध तय ही समझिए, क्योकि कम्युनिस्ट पार्टी बहुत करप्ट है। शी जिनपिंग ने भी ना जाने कितने पैसे खिलाये होंगे और अपनी पसंद के अफसर नियुक्त किये होंगे।
न जाने कितने ही कार्यकर्ता है जो इस समय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता चाहते होंगे। जब जिनपिंग के बाद इनका नम्बर आएगा तो ये लोग चीन में थोड़ी आजादी जरूर देंगे और यही पतन भी शुरू होगा।
चीन का विभाजन निश्चित रूप से होगा क्योकि यही हर साम्राज्यवादी शक्ति का इतिहास रहा है।
दूसरी तरफ अमेरिका है जिसे अब सुपरपॉवर कहना एक फॉर्मेलिटी ही लगती है। जो बाइडन एक अमेरिकी नागरिक कम और चीन के मित्र ज्यादा लगते है।
हाल ही में उन्होंने बेतुका बयान दिया कि अमेरिका को अपना सारा ध्यान चीन और रूस पर करना चाहिए। रूस का नाम लेने की जरूरत ही क्या थी? अब वो कोई पहले की तरह सोवियत यूनियन तो है नही, ये बयान देकर आप बस चीन और रूस के गठबंधन की घोषणा ही कर रहे है।
एशिया में अमेरिका का एक ही सबसे शक्तिशाली दोस्त है वो है भारत। बिल क्लिंटन से लेकर डोनाल्ड ट्रंप तक हर राष्ट्रपति ने पूरी कोशिश की भारत से मजबूत संबंध रखने की लेकिन बाइडन के आने के बाद भारतीयों के मन मे अब अमेरिका को लेकर खटास दिखाई दे रही है।
दरसल बाइडन वो करना चाहते है जो उन्हें अच्छा लगता है ना कि वो जो अमेरिका के लिये अच्छा हो। वाशिंगटन के जिस सिंहासन को वो एन्जॉय कर रहे है उसके लिये अब्राहम लिंकन, वुडरो विल्सन और फ्रेंकलिन डी रुजबेल्ट ने अपना खून पसीना एक किया है।
2024 तक बाइडन अमेरिका को कितना नुकसान पहुँचाते है इसी पर निर्धारित होगा कि अमेरिका अब सुपरपॉवर है भी या नही।
यदि 2050 के विषय मे सोचा जाए तो व्यक्तिगत दृष्टि से तीन ही देश है जो सुपरपॉवर बन सकते है भारत, फ्रांस और ब्रिटेन।
जग सिर मोर का सिंहासन भारत के पास ही होना चाहिए मगर तब तक भारत को कई सुधार करने होंगे पहला इस्लामिक आतंकवाद से बचाव, दूसरा जातिवाद का अंत और तीसरा सबसे महत्वपूर्ण, मात्र छः राज्य है जो भारत की 80% अर्थव्यवस्था चला रहे है बाकी 22 के लोगो को बहुत ऊपर उठने की जरूरत है।
सरकारी नौकरी से हटकर पूँजीवाद की ओर आना पड़ेगा इन तीन चरणों को पार करके ही भारत सुपरपॉवर बन सकता है।