परख की कलम से: भारत का तख्ते ताउस टर्की में पड़ा शर्मिंदा है!

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भारत का तख्ते ताउस अब कुछ इस हाल में टर्की में पड़ा शर्मिंदा है। भारत चाहे जितना अमीर हो जाये मगर आगामी पीढ़ी यह ध्यान रखे कि जब तक हम ईरान से तख्ते ताउस जितनी रकम और दरिया ए नूर नामक हीरा तथा ब्रिटेन से कोहिनूर हीरा नही ले लेते हमारी लड़ाई पूरी नही होगी।

बात 1737 की है जब पेशवा बाजीराव दिल्ली जीत चुके थे हालांकि मुगल बादशाह को हटाने में सफल नही हुए थे पर इससे दुनिया भर में संदेश गया कि मुगल अब कमजोर है और इसी का फायदा उठाया ईरान के बादशाह नादिर शाह ने।
नादिर शाह ने 1739 में भारत पर आक्रमण किया और मुगलो को हराया, मुगल बादशाह मुहम्मद शाह की ओर से अवध का नवाब सादत खान और हैदराबाद का निजाम चिंकूलीज खान लड़े थे। सादत खान नादिरशाह से मिल गया और नादिरशाह को दिल्ली लूटने के लिये आमंत्रित किया।
नादिरशाह ने दिल्ली में प्रवेश किया और मुहम्मद शाह एक कैदी की तरह चल रहा था। नादिरशाह ने खुद को हिंदुस्तान का बादशाह कहना शुरू कर दिया, वह 3 महीने दिल्ली में रुका शुरू में उसने दिल्ली को नही लूटा। नादिरशाह की हरकतों को पेशवा बाजीराव पुणे में समझ रहे थे मगर ये वो दौर था जब मराठो का युद्ध पुर्तगालियों से चल रहा था इसके अलावा छत्रपति शाहू नही चाहते थे कि पेशवा नादिरशाह से जा भिड़े।
पेशवा मुगलो की सहायता करने को आतुर थे उस समय मराठो की शक्ति छत्रपति के पास होती थी। अतः अब मुगलो को स्वयं ही नादिरशाह से निपटना था, नादिरशाह को 3 महीने ही हुए थे कि दिल्ली में किसी ने अफवाह फैला दी कि नादिरशाह मर गया है। अफवाह जैसे ही फैली दिल्लीवासियों ने ईरानी सैनिकों को मारना शुरू कर दिया इससे नादिरशाह भड़क गया और उसने दिल्ली में कत्लेआम मचा दिया।
दिल्ली में खून की नदी बहने लगी, साथ ही नादिरशाह ने शाहजहाँ द्वारा बनवाया तख्ते ताउस (मयूर सिंहासन) लूट लिया और उसमे जड़ा कोहिनूर हीरा भी। कोहिनूर हीरा द्वापर युग की स्मयन्तक मणि था जिसे श्रीकृष्ण ने यादवों को सौंपा था।
कोहिनूर हीरा इतना कीमती था कि यदि वह मुगलो के पास होता तो मुगल फिर से खुद को खड़ा कर सकते थे। यह इतना महंगा था कि दुनिया भर की गरीबी 3 बार मिटा सकता था। इसके साथ ही नादिरशाह दरिया ए नूर नामक अन्य हीरा भी लूट ले गया।
1748 में ईरान में नादिरशाह की बेरहमी से हत्या कर दी गयी और तख्ते ताउस को कई हिस्सों में तोड़ कर अलग अलग काम मे लिया गया। इसके साथ ही कोहिनूर हीरा नादिरशाह के गुलाम अहमदशाह अब्दाली के हाथ लग गया और बाद में महाराज रणजीत सिंह के पास होता हुआ धोखे से इंग्लैंड पहुँच गया। कोहिनूर अब भी ब्रिटिश महारानी के ताज में जड़ा है।
तख्ते ताउस का बैठने वाला हिस्सा अब टर्की के एक सिंहासन में लगा है और बस यही तख्ते ताउस की अंतिम निशानी है। दरिया ए नूर ईरान की रिजर्व बैंक के कब्जे में है। इसीलिये आज जब भी देखता हूं कि ईरान में कोई बम धमाका हो रहे है लोग भूखों मर रहे है एक मानव होकर भी इसका दुख नही होता।
ईरान और ब्रिटेन से दोस्ती आज हमारी मजबूरी है मगर आने वाली पीढ़ी को संदेश है कि आज से 100-200 या 500 वर्षो बाद जब भी मौका मिले ईरान से अपना खोया सम्मान जरूर प्राप्त करो और ब्रिटेन से कोहिनूर। ईरान में कत्लेआम क्यो ना मचाना पड़े मगर उन्हें याद दिलाओ की मुसलमानो के साथ हमारी लड़ाई राष्ट्रीय है अंतरराष्ट्रीय नही की दुनिया की कोई भी ताकत हिन्दू मुस्लिम झगड़ो का फायदा उठा ले।
जिस तरह यहूदी अपने बच्चो को येरुशलम की दीवार के बारे में बताते थे ठीक उसी तरह हर भारतीय लाल किले में हुई इस लूट के बारे में अपने बच्चों को बताए। मुसलमानो से निवेदन है कि वे भी अपने बच्चों को इसके लिये आगाह करे, हमारी शत्रुता इस्लाम या पैगम्बर से नही है बल्कि कट्टरपंथ से है जिस दिन इस्लाम से कट्टरपंथ समाप्त हो जाएगा हमारी कट्टरता भी शून्य हो जाएगी।
(परख सक्सेना)