परख की कलम से: बुद्ध का महान जीवन भी संदेश था !

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श्री राम के बाद से ही सूर्यवंशियों की स्थिति कुछ खास नही रह गयी थी। धीरे धीरे सूर्यवंशियों की शक्तियां बंटने लगी और शासन का केंद्र चंद्रवंशी बन गए।
महाभारत के बाद फिर समय बदला कुछ सूर्यवंशी कपिलवास्तु के शासक बने और शाक्य कहलाये।
इसी के राजा शुद्धोधन के यहाँ एक पुत्र जन्मे सिद्धार्थ, सिद्धार्थ के बारे में कहा गया था कि या तो ये अपने पूर्वज रघु की तरह महान राजा बनेंगे या फिर विश्वामित्र से बड़े ऋषि बन जाएंगे।
एक दिन सिद्धार्थ नर्तकियों का नृत्य देखते देखते सो गए, मध्यरात्रि में नींद खुली तो देखा कि इन नर्तकियों का सारा श्रंगार उतर चुका है और वे बेहद बदसूरत दिख रही है, उनके मन में आया कि वे क्षणिक सुख के लिये कही अन्याय तो नही कर रहे।
जिस रात उन्हें पुत्र हुआ उसी दिन उन्होंने महल त्याग दिया। तपस्या में वे भूखे प्यासे बेहाल हो गए लेकिन उन्हें ज्ञान नही मिला अंत मे एक लड़की ने उन्हें खीर दी जिसे खाकर उनकी सुप्त चेतना जागी और अंततः उन्हें ब्रह्मज्ञान प्राप्त हुआ।
बुद्ध ने कभी अहिंसा को सर्वश्रेष्ठ नही कहा बल्कि प्रेम और करुणा की बात कही। उनका कहना साफ था कि वेद और यज्ञ मनुष्य की भलाई के लिये है ना कि मनुष्य के शोषण के लिये।
जब अजातशत्रु ने अपने पिता का वध कर दिया और वह पश्चाताप करने लगा तो दरबार के ब्राह्मणों ने उसे हजारो तरह के कर्मकांड करवाये और उसने जमकर धन लुटाया फिर भी जब बात नही बनी तो इस बार वह बुद्ध की शरण मे आया।
बुद्ध ने उसे दो हांडिया दी एक मे शुद्ध घी दूसरे में पत्थर, बुद्ध के कहने पर उसने उन्हें पानी मे रखा और फिर डंडे से तोड़ा। घी तो पानी पर तैरने लगा मगर पत्थर डूब गए, तब बुद्ध ने कहा कि यही कर्मो की प्रकृति है सगुण होंगे तो तर जाएंगे अन्यथा डूब जाएंगे। मैं और ब्राह्मण कुछ नही कर सकते।
यही बुद्ध का मार्ग था जो कि सबसे सरल और सबसे महान है, हालांकि बाद में आये भिक्षुओ ने भी इसे व्यापार ही बना लिया। जब अशोक के साथ भारत बौद्ध राष्ट्र बना तब तक इसमे कई जटिलताएं आ गयी। अशोक ने स्तूप और बौद्ध प्रतिमाएं बनवाकर बौद्ध धम्म की नींव खोद डाली।
इसका फायदा एक बार फिर ब्राह्मणों को मिला, पुष्यमित्र शुंग के साथ ही फिर से सनातन धर्म लौट आया। ब्राह्मणों ने कर्मकांडो में सुधार किये, बलि प्रथा को काफी हद तक नियंत्रित कर लिया। रही सही कसर विक्रमादित्य ने पूरी कर दी, उन्होंने पूरे भारत में हिन्दू देवी देवताओ की मूर्ति बनवाना शुरू कर दिया।
शंकराचार्य के साथ सनातन ने फिर पैर जमा लिए और बौद्ध धम्म एक समय की बात होकर रह गया। बौद्ध को धर्म कहना गलत होगा क्योकि बुद्ध ने कभी धर्म की बात की ही नही।
मैं बुद्ध की कही सभी बातों का समर्थन नही करता। मगर एक दिन विश्व को शांति के लिये बुद्ध का मार्ग अपनाना ही होगा और यह तब ही संभव है जब अवैदिक धर्म समाप्त हो जाये।
बुद्ध पूर्णिमा पर हिन्दुओ का दायित्व है कि वे अपने गौरवशाली इतिहास को याद करे और समझें कि रामायण और महाभारत काल मे एक भी अंधविश्वास नही था इसलिये भारत सोने की चिड़िया था। हिन्दू सिर्फ वेद, रामायण और महाभारत का अध्ययन करें अन्य किसी ग्रंथ का नही चाहे वह रामचरितमानस हो, भागवतजी हो या फिर पुराण।
भगवान बुद्ध मनु और इक्ष्वाकु के वंशज ही नही बल्कि अंतिम आशा भी है जो मानव समाज को अज्ञान से मुक्त कर सकती है। अहिंसा को नही आर्य आष्टांगिक मार्ग को अपनाए। हम भारत को फिर से महान राष्ट्र बना सकते है बस हमे राम, कृष्ण और बुद्ध के मार्ग पर चलने की आवश्यकता है।
(परख सक्सेना)

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