परख की कलम से : दुनिया के दो ऐतिहासिक सबसे कमजोर नेता

1977 में दुनिया ने दो सबसे कमजोर नेता देखे। एक अमेरिका के जिमी कार्टर और दूसरे भारत के मोरारजी देसाई।
भारत का सौभाग्य था कि मोरारजी की सरकार डेढ़ साल में ही गिर गयी और फिर से श्रीमती गांधी सत्ता में आ गई। अमेरिका रोनाल्ड रीगन के नेतृत्व में आ गया और वह भी संभल गया।
पर आज भारत मे जहाँ नरेंद्र मोदी जैसे दिग्गज नेता है वही अमेरिका में एक बार फिर जिमी कार्टर वाला दौर आ गया है जो बाइडन को कार्टर से भी कमजोर राष्ट्रपति कहा जा रहा है।
पहले तो शी जिनपिंग ने उन्हें ताइवान के मुद्दे को लेकर 2 टूक सुना दी और अब उन्ही की कमजोर लीडरशिप के कारण फ्रांस ने अमेरिका से अपने राजदूत वापस बुला लिये।
प्रकरण कुछ यूं है कि दुनिया तीसरे विश्वयुद्ध की राह पर आ गयी है। दो गुट बन गए है मित्र देशो में अमेरिका, भारत, ब्रिटेन, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, इजरायल, जर्मनी और स्पेन जैसे कई देश है। वही अक्ष देशो में चीन, रूस, ईरान जैसे देश है।
सैन्य दृष्टि से ऑस्ट्रेलिया सबसे कमजोर है। ऑस्ट्रेलिया 2016 से ही फ्रांस की एक कंपनी को सबमरीन का कॉन्ट्रैक्ट देने की बात कर रहा था। मगर 3 दिन पहले अचानक अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड ने एक गुट बना लिया और ये सबमरीन अब फ्रांस की जगह अमेरिका बेचेगा।
फ्रांस को दुख यह है कि उसकी कंपनी ने करोड़ो रूपये प्रदर्शनी में खर्च किये और ऑस्ट्रेलिया ने पीठ में छुरा घोप दिया। 2022 में चुनाव होना है फ्रांस में इस समय वामपंथी सरकार है और आँधी दक्षिणपंथ की चल रही है। इसलिए इमैन्यूल मैक्रोन डरे हुए है।
अमेरिकी स्वतंत्रता आंदोलन में फ्रांस की मुख्य भूमिका थी जबकि फ्रांस को हिटलर की नाजी सेना से मुक्त करवाने में अमेरिका की। स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी फ्रांस ने ही अमेरिका को उपहार में दिया था।
फ्रांस अब अमेरिका से व्यापारिक रिश्ते समाप्त करने की योजना बना रहा है। हालांकि अमेरिका के अफसर ऐसा नही होने देंगे इसकी पूरी संभावना है।
मगर भारत इन सबमे एक विजेता बन गया, यहाँ फ्रांस ने अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध घोषणा की और वही भारत की ओर एक कदम बढ़ाते हुए कहा कि हम भारत के साथ बहुपक्षीय शक्ति का निर्माण करेंगे।
अब ये बहुपक्षीय क्या होता है? दरसल अमेरिका हमेशा चाहता था कि वह अकेला सुपरपॉवर बना रहे और भारत, चीन, इजरायल और फ्रांस जैसी क्षेत्रीय शक्तियां सिर्फ अपने क्षेत्रों में ही रहे। जब भी कभी फ्रांस और इजरायल एक साथ आने का प्रयास करते तो अमेरिका सैम अंकल बनकर बीच मे आ जाता।
इसलिए फ्रांस ने भारत के साथ रिश्तों पर जोर दिया है। फ्रांस के भारत से ऐतिहासिक संबंध है, फ्रांस ने ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध मराठा साम्राज्य की बड़ी सहायता की थी। आज़ादी के बाद भी फ्रांस सदा ही भारत का समर्थक रहा।
भारत का रक्षा मित्र पहले सोवियत संघ हुआ करता था मगर आज उसका घटक रूस चीन परस्त है ऐसे में बेहतर है कि भारत फ्रांस के लिये अमेरिका की कमी पूरी करे। इस समय फ्रांस के पास भारत को देने के लिये बहुत कुछ है।
फ्रांस अमेरिका की तुलना में हमेशा ज्यादा अच्छा मित्र है और सबसे बड़ी बात फ्रांस में सरकार किसी की भी हो पाकिस्तान सदा ही उनका शत्रु होगा, जबकि अमेरिका पाकिस्तान का दुश्मन तब ही होता है जब वहाँ रिपब्लिकन पार्टी आती है।
भारत को चाहिए कि वो फ्रेंच कंपनियों को मेक इन इंडिया के लिये उत्साहित करे मगर फ्रांस के आने वाले चुनाव भी अब भारत के लिये आवश्यक हो गए है। इमैन्युल मैक्रोन हमारे लिये बहुत अच्छे सिद्ध हुए मगर यदि सत्ता बदलती है तो अर्थ सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही रूप में बदल सकते है।

 

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