परख की कलम से: हिन्दू-सिख मिल कर बनायें तो फिर कोई रोक न सकेगा हिन्दू राष्ट्र को

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हिंदुओं और सिखों को आपसी समीकरण बनाकर ही अखंड भारत का निर्माण करना होगा..ईसाई और बौद्ध धर्म का भारत मे कोई भविष्य नही!
पिछले सप्ताह कुछ 25 सिख परिवारों के ईसाई धर्म मे परिवर्तित होने की खबर आयी। इससे हिंदूवादियों में एक क्रोध और निराशा फैल गयी, विश्व हिंदू परिषद ने तो उन्हें दोबारा सिख बनाने की शपथ तक ले ली लेकिन प्रश्न यह है कि क्या ईसाईयों या बौद्धों से आपको सच मे खतरा है?
सबसे पहली बात बौद्धों की करे तो भारत मे आज का बौद्ध धर्म सिर्फ अम्बेडकरवाद पर टिका है। बौद्ध धर्म की नींव प्रज्ञा, करुणा और समता पर टिकी थी जबकि अम्बेडकरवाद की नींव ब्राह्मणों से नफरत पर टिकी है। जिस समय अंबेडकर की लहर थी उस समय हिन्दुओ की आबादी 53 करोड़ थी जिनमे से मुश्किल से 17 लाख ने बौद्ध धर्म अपनाया। इनमें से भी एक बड़ी तादाद वापस हिन्दू धर्म मे लौट आयी।
अब भी कई दलितों के बौद्ध धर्म अपनाने की घटनाएं देखी जाती है मगर यदि आप प्रतिशत देखे तो वह शून्य से भी बहुत कम है। बौद्ध धर्म हिन्दू धर्म को निगलकर ही प्रधान धर्म बन सकता है मगर हिन्दू धर्म को कमजोर होने में समय लगेगा तब तक इस्लाम का फन उसे डसने के लिये तैयार हो चुका होगा। इस्लाम की हिंसा के आगे बौद्ध धर्म आधे दिन भी नही टिक सकता। इसलिए यदि आप यह कहे कि भारत का भविष्य बौद्धों के हाथ मे होगा तो यह एक कल्पना मात्र है।
अब बात करते है ईसाई धर्म की तो जब 1818 में भीमा कोरेगाँव में मराठाओ की हार हुई तो ना सिर्फ मराठा साम्राज्य का पतन हुआ बल्कि ईसाई मिशनरी भारत भृकुटि के मुकुट पर चोंच मारने लगे। मराठाओ की पराजय के बाद अंग्रेजो ने धर्म परिवर्तन के लिये मिशनरीज को आमंत्रित किया। 130 वर्ष के राज में अंग्रेज सिर्फ 2% आबादी को ईसाई बना सके जिसमे भी अधिकांश योगदान सिर्फ मदर टेरेसा का था।
मिशनरीज अपनी आबादी के लिये आदिवासियों पर निर्भर है जिनकी तादाद पहले ही घटती जा रही है और उनके कई इलाके तो ऐसे है जहाँ मिशनरीज तो क्या सेना का पहुँच पाना भी संभव नही है। इसलियें मिशनरीज की समस्या जितनी बड़ी दिखती है उतनी है नही।
समस्या सिर्फ इस्लाम की होगी क्योकि मुसलमानो का हमला सीधा होता है। एक हिन्दू लड़की निकिता तोमर ने इस्लाम नही अपनाया तो उसे सीधे गोली मार दी गयी और दोषी को सामुदायिक समर्थन भी मिला। मुसलमान तब तक लड़ेगा जब तक या तो वह स्वयं समाप्त नहीं हो जाता या फिर गैर मुसलमानो को नही कर देता।
लेकिन मुसलमानो की जीत हिन्दुओ और सिखों की मुट्ठी में है यदि हिन्दू और सिख अपने धर्म को लेकर कट्टर भी बने रहे तो भी मानवता का लाभ ही है।
इस बीच यदि कुछ सिख ये सोचते है कि मुसलमान खालिस्तान के लिये उनके सहायक होंगे तो ये सिख धर्म की आत्महत्या सिद्ध होगा क्योकि मुसलमान कभी तैयारी का मौका नही देते। ध्यान रहे 1947 में कश्मीर जैसे ही अलग देश बना पाकिस्तान ने बिना देर किए उस पर हमला किया ताकि उसे संभलने का मौका ना मिल जाये और ना ही कही भारत कश्मीर पर अपना हाथ रख दे।
कश्मीर वाला हाल खालिस्तान का भी है यह बस एक लटकी हुई गाजर की तरह है ताकि सिख हिन्दुओ से अलग हो जाये। बहरहाल सिखों को मूर्ख बनाना उतना आसान नही क्योंकि वह समृद्ध समाज है इस तरह अब भारत के सूत्रधार दो ही धर्म बचते है एक हिन्दू दूसरे सिख। भारत जग सिर मोर बनेगा या फिर अफ्रीका से भी गरीब देश इसकी जिम्मेदारी इन्ही दो पर होगी।
(परख सक्सेना)