परख की कलम से: कोसोवो भी भारत के लिये एक खतरे की घण्टी है

Share on facebook
Share on twitter
Share on google
Share on pinterest
Share on telegram
Share on whatsapp
Share on email
FILE

 

आज से 600 वर्ष पूर्व एक संयुक्त सर्बिया नाम का ईसाई देश हुआ करता था, इस पर ऑटोमन साम्राज्य ने आक्रमण किया। सर्बिया की विजय तो हुई मगर उसका दक्षिणी हिस्सा ऑटोमन के हाथ आ गया।
सर्बिया के इस क्षेत्र कोसोवो में भयंकर रक्तपात हुआ, कई पुराने चर्च तोड़कर मस्जिदे तान दी गयी जिन पुरुषों ने इस्लाम नही अपनाया उनके सिर काटकर चौराहे पर लटकाए गए और हजारों ईसाई महिलाओ को इस्लामिक मंडियों में नीलाम किया गया।
1921 में ऑटोमन साम्राज्य को मित्र देशो की सेना ने मिट्टी में मिला दिया और बाद में फ्रांस ने कोसोवो का सर्बिया में विलय कर दिया। मगर सर्बिया के लोगो ने देखा कि कोसोवो सांस्कृतिक रूप से पूरा अलग हो चुका था।
जो कोसोवो वासी कभी सर्बिया की महानता के गीत गाते नही थकते थे वे ही लोग मुसलमान बनने के बाद सर्बिया को शैतानी मुल्क की संज्ञा देते थे और अलग राष्ट्र की मांग कर रहे थे।
1949 में अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शीत युद्ध आरंभ हुआ, सर्बिया सोवियत के गुट में था इसलिए अमेरिका के निशाने पर आ गया। 1991 में सोवियत टूट गया फिर भी सर्बिया रूस के पक्ष में रहा, अंततः अमेरिका ने कोसोवो का मुद्दा उठाया और इस्लामिक विद्रोहियों को भड़काया।
अजीब बात है एक ईसाई देश ने दूसरे ईसाई देश का विभाजन करने के लिये मुसलमानो की सहायता की। 1999 में अमेरिका ने फ्रांस की मदद से सर्बिया पर आक्रमण किया और उसे कोसोवो से खदेड़ दिया जी हाँ वही फ्रांस जिसने कभी कोसोवो का सर्बिया से मिलन करवाया था।
2008 में अमेरिका ने कोसोवो को स्वतंत्र राष्ट्र की मान्यता दे दी। इस्लामिक देशो ने भी मान्यता दी मगर भारत रूस के साथ संबंध बिगाड़ना नही चाहता था इसलिए वह कोसोवो को सर्बिया का ही अंग मानता है।
कोसोवो के पासपोर्ट धारक भारत मे पढ़ नही सकते, खेल नही सकते, नौकरी नही कर सकते क्योकि भारत के लिये कोसोवो जैसा कोई राष्ट्र है ही नही। इसलिए कोसोवो ने भारत से अपील की कि भारत अब उसे मान्यता दे।
चीन और भारत दोनों ही कोसोवो को देश नही मानते, यह भूराजनीति का एक दिलचस्प पहलू है कि जो भारत और अमेरिका एक साथ खड़े होते है वे कोसोवो को लेकर यहाँ विरोधी है और चीन भारत के साथ खड़ा है।
कोसोवो को अलग राष्ट्र की मान्यता देने का तो प्रश्न ही नही उठता, क्योकि कल फिर भारत मे भी इस्लामिक आंदोलन शुरू हो सकते है।
कल को मुसलमान भारत से पूछ सकते है कि कश्मीर घाटी में वे बहुसंख्यक है इसलिए कोसोवो की तर्ज पर उन्हें अलग देश दे दिया जाए। 1947 कभी भुलाया नही जा सकता।
हजारों मील दूर खड़ा कोसोवो भी भारत के लिये एक खतरे की घण्टी है जिसकी गूँज हमारा मीडिया सुन नही पा रहा। मगर ये गूँज सर्बिया ने सुन ली और उनके विदेश मंत्री फौरन दिल्ली को मनाने पहुँच गए और हमारे विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ आकर एक से एक आतंक विरोधी बयान देने लगे।

ट्रेंडिंग

काम की खबरें

देश

विदेश

मनोरंजन

राजनीति