परख की कलम से: कृष्ण व बुद्ध दोनो ही पूजनीय हैं!

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द्रौपदी फूलो से भरी टोकरियां सजाकर भगवान विष्णु की पूजा कर रही थी। इसी बीच श्री कृष्ण आ गए और उन्होंने इसका कारण पूछा तो द्रौपदी ने बताया कि यह सब भगवान को पतिरूप में प्राप्त करने के लिये है।
श्रीकृष्ण ने कहा – वेदों का उद्देश्य भगवान को बंधनो में बांधना नही है अपितु स्वयं बंधनो से मुक्त होना है। द्रौपदी ने पूछा कि फिर मैं पूजा कैसे करूँ, कृष्ण मुस्कुराए और कहा स्वयं को इन तृष्णाओं से मुक्त कर लो विष्णु स्वयं मिल जाएंगे।
कहने का अर्थ है कि हिन्दू धर्म ने कभी कर्मकांडो का समर्थन किया ही नही। मूर्ति पूजा का उद्देश्य सिर्फ ध्यान को एकाग्र करना है ना कि ईश्वर को प्रसन्न करना। श्रीकृष्ण ने तृष्णाओं को ही दुख का मूल बताया और उससे मुक्ति को मोक्ष का मार्ग कहा।
लेकिन एक गलती की वो यह कि वे बातो बातो में सभी को बोल गए कि मैं पिछले जन्म में राम था। इससे कृष्ण के नाम पर धर्म का व्यापार शुरू हो गया। जिस कृष्ण ने कामनाओ से मुक्त होने का रास्ता दिखाया लोग उन्ही की मूर्ति के दर्शन की कामना में व्यस्त हो गए।
कदाचित कृष्ण एक बार फिर आते तो दीवार से सिर फोड़ चुके होते। बहरहाल वे बुद्ध रूप में वापस आये, इस बार उन्होंने नाप तौलकर स्टेटमेन्ट दिये। उन्होंने कभी अपने पूर्व जन्मों का जिक्र नही किया, हालांकि बाद में भिक्षुओं ने श्री राम को बुद्ध का पूर्व जन्म कहा।
बुद्ध भगवान पर टिप्पणी करने से भी बचे, यदि वे बोलते की भगवान नही है तो लोग उन्ही के नाम पर व्यापार शुरू कर लेते जो। यदि बुद्ध कहते कि भगवान है तो उन्हें अपने बारे में बताना ही पड़ता और यह अवतार असफल हो जाता।
बहरहाल बुद्ध की सिर्फ दो बाते ध्यान रखने योग्य है कि पहली मनुष्य का अंतिम लक्ष्य मुक्ति पाना है और दूसरी इसके लिये कर्मकांडो की आवश्यकता नही है सुख की कामना से मुक्त होकर भी निर्वाण प्राप्त किया जा सकता है।
बुद्ध हमेशा कुटिया में रहे, सोने चाँदी से दूर। आज उनके बड़े बड़े स्तूप और मंदिर है और एक जगह तो हीरे का सिंहासन। यह सब अंधविश्वास नही तो और क्या है।
बुद्ध से कोई विशेष बाते सीखने योग्य नही है, जो बातें बुद्ध ने कही वही कृष्ण ने उनसे पहले कही मगर कृष्ण ने कर्मयोग भी सीखाया। बुद्ध के पिता शुद्धोधन अंत समय तक गिरगिराते रहे लेकिन बुद्ध ने उन्हें दुखी होने दिया जबकि कृष्ण ने एक नई व्यवस्था स्थापित की।
बुद्ध की आँखों के सामने विरुधक ने उनकी जन्मभूमि कपिलवस्तु को उजाड़ दिया, महिलाएं और बच्चे चीखते रहे मगर बुद्ध ने उनका रक्षण नही किया जबकि कृष्ण ने हर बेसहारा को सहारा दिया और सभी का रक्षण किया।
पोस्ट का उद्देश्य कृष्ण और बुद्ध में तुलना करना नही है बल्कि यह बताना है कि हर योगी ने धर्म की परिभाषा अपने अपने युग के अनुरूप की है। हिन्दू धर्म को मूल रूप में लाना परम आवश्यक है, अन्यथा आने वाली पीढ़ी कर्मकांडो और पूजा पाठ को ही हिंदुत्व मानेगी और धीरे धीरे हिन्दू धर्म का या तो रूप नकारात्मक हो चुका होगा या फिर वह समाप्त हो जाएगा।
हिन्दू कृष्ण और बुद्ध दोनों ही का थोड़ा थोड़ा अनुसरण करें, मूर्ति पूजा, चढ़ावा और मंदिरों को ज्यादा महत्व ना दे बल्कि वेद, उपनिषद, यज्ञ तथा कर्मयोग को जीवन मे उतारे।
आप 10 नही 100 दिये जलाये मंदिर में 1 नही 50 प्रतिमाएं रखे मगर यह सब आपके निजी स्वार्थ के लिये है इसे आपकी कामनाओ के बदले दी जाने वाली रिश्वत ना समझे क्योकि ईश्वर आपके अज्ञान के बंधनो से मुक्त है।
26 मई को बुद्ध पूर्णिमा है सभी हिन्दू घर मे शुद्ध घी का दिया जलाये और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करे मगर तृष्णाओं से मुक्त होकर। हिन्दू धर्म को यदि आगे ले जाना है तो उसका स्वरूप रामायण महाभारत वाला होना चाहिए ना कि पिछले 2500 वर्षो वाला।
(परख सक्सेना)

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