परख की कलम से: राजमाता गायत्री देवी का कर्ज है हम पर !!

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जिस समाज को महाराणा प्रताप और पृथ्वीराज एक नही कर सके उसे एक महिला ने एकसूत्र में बांध दिया।

भारत का इतिहास स्त्री के महिमामंडन से भरा हुआ है, जहाँ महिला दिवस जैसे दिनों की कोई आवश्यकता नही है क्योकि यहाँ तो नारी की सदियों से पूजा की जाती रही है। नारी सशक्तिकरण का आरंभ मनुस्मृति की रचना के साथ हो चुका था जब महर्षि मनु ने लिखा था कि “जहाँ स्त्री का आदर होता है वहाँ देवता निवास करते है।”
यमराज से अपने पति को पुनः प्राप्त करने वाली सावित्री से लेकर अंग्रेजो से अपनी झाँसी के लिये लड़ने वाली रानी लक्ष्मीबाई तक भारत भूमि वीरांगनाओं की भूमि रही है और इसे एक दिन के किसी पर्व की आवश्यकता नही है।
बहरहाल इस कड़ी में एक नाम और आता है वह है जयपुर की महारानी गायत्री देवी, जिन्होंने ना सिर्फ जयपुर बल्कि पूरे राजस्थान में अमिट प्रभाव छोड़ा है। बात है 1931 की जब कूच बिहार के राजा को पता चलता है कि उनकी 12 वर्ष की बेटी ने एक चीते को मार गिराया है। तब ही महाराज ने जान लिया कि यह एक अद्वितीय कन्या है अतः उन्होंने उसके पालन पोषण में कोई कमी नही रखी।
राजकुमारी की माँ बड़ौदा के गायकवाड़ घराने से थी, कूच बिहार और बड़ौदा दोनो ही राज्य और उनके राजा काफी विकसित और प्रजा वत्सल माने जाते थे। इन दो घरानों का समीकरण वह राजकुमारी थी गायत्री देवी।
गायत्री देवी ने पढ़ाई लंदन से की और 1939 में एक ऐसा योग बना जब जयपुर के महाराज सवाई मानसिंह कोलकाता आये हुए थे वे पोलो खेल रहे थे और पोलो की ही शौकीन गायत्री देवी से उनकी भेंट हुई। महाराज ने अपने प्यार का इजहार किया जिसे स्वीकार करने में गायत्री देवी ने 3 दिन लिए। अंततः 1940 में गायत्री देवी और राजा मानसिंह का विवाह हो गया और अब गायत्री देवी जयपुर राजघराने की तीसरी बहू बन चुकी थी।
गायत्री देवी महाराज की तीसरी पत्नी थी लेकिन अपनी योग्यता और खूबसूरती के दम पर उन्होंने जयपुर में अपनी अलग ही पहचान बना ली। गायत्री देवी एक खुले विचारों वाली महिला थी, उन्हें सिगरेट का भी शोक था तीरंदाजी का भी और जयपुर के महल में उन्हें शायद ही कभी किसी ने पर्दा करते देखा हो। 1942 में उन्होंने कन्या विद्यालय की स्थापना की इससे यह समझ आ गया की जयपुर की यह महारानी कुछ अलग थी।
1947 में देश आजाद हुआ और महाराज ने जयपुर का विलय भारत मे किया। महाराज सवाई सिंह को जब राजप्रमुख बनाया गया और वे दरबार मे उपस्थित हुए तो राजपूतो के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा था जब महारानी सबके सामने महाराज के साथ सिंहासन पर बैठी हो। गायत्री देवी कहने को तीसरी पत्नी थी लेकिन उनके सिंहासन पर बैठने से जयपुर इस बात का गवाह बना की वे ही महाराज की मुख्य रानी थी।
बहरहाल महारानी गायत्री देवी महिलाओ के पुनरुत्थान के लिये काम करती रही और अंततः 1956 में जब जयपुर को राजस्थान में मिलाया गया तब जाकर उनकी राजशाही का सही अंत हो गया। महाराज और महारानी दोनो ही कांग्रेस की नीतियों के विरोधी हो चुके थे, दोनो प्रजावत्सल थे। राजपाठ भले ही जा चुका था मगर जयपुर के लोग अब भी पत्रों के माध्यम से अपनी शिकायते महाराज को ही दर्ज करवा रहे थे।
आखिरकार निर्णय लिया गया कि राजा रानी दोनो स्वतंत्रता पार्टी में शामिल होंगे। यह कांग्रेस के विरुद्ध एक नई शुरुआत थी, गायत्री देवी ने लोकसभा के लिये 1962 में पहला चुनाव लड़ा और वे इतने बड़े अंतर से जीती की यह जीत गिनीज बुक में दर्ज हुई।
जयपुर की जनता हैरान थी पहली बार कोई महारानी महल से निकलकर उनके दुखो को जानने जनता के समग्र उपस्थित थी। मगर गायत्री देवी की ये उपलब्धियां इंदिरा गांधी को खटक रही थी, इसका एक कारण यह भी था कि कहा जाता है इंदिरा गांधी राजा मानसिंह को चाहती थी मगर मानसिंह ने इंदिरा को दरकिनार करके गायत्री देवी को चुना था।
व्यक्तिगत और राजनीतिक दोनो मुद्दों पर गायत्री देवी की जीत इंदिरा गांधी को खटक रही थी। 1970 में अचानक महाराज की मृत्यु हो गयी, उनकी पहली पत्नी के पुत्र भवानी सिंह अगले राजा बने। पति की मृत्यु से गायत्री देवी टूट गयी और राजनीति से दूरी बनानी शुरू कर दी, 1975 में जब आपातकाल लगा तो इंदिरा गांधी की प्रमुख शत्रु दो महिलाएं थी पहली जयपुर की राजमाता गायत्री देवी दूसरी ग्वालियर की राजमाता विजयाराजे सिंधिया।
जिस समय गायत्री देवी सो रही थी उसी समय पुलिस महल में प्रविष्ट हुई और राजमाता को गिरफ्तार कर लिया। राजमर्यादा के उल्लंघन की यह पराकाष्ठा ही थी कि पुलिस राजमाता के कक्ष में घुस गयी। जयपुर के पैलेस और किले को खोद डाला गया मगर कोई धन नही मिला, तब गायत्री देवी को जेल में तीसरी श्रेणी की महिलाओ के साथ रखा गया।
राजमाता जब जेल में थी तब जयपुर रियासत की हर विरासत को खजाने की खोज में खोदा गया लेकिन ज्यादा कुछ हासिल नही हुआ। तत्कालीन महाराज भवानी सिंह के विरुद्ध भी कार्रवाई हुई, महाराज भारतीय सेना में उच्च अधिकारी रह चुके थे और 1971 के युद्ध मे इंदिरा गांधी ने खुद उन्हें सम्मानित किया था। महाराज की गिरफ्तारी का खुद सेना ने विरोध किया मगर इंदिरा गांधी ने कोई परवाह नही की और अपना खेल जारी रखा।
आखिरकार 6 माह की जेल के बाद गायत्री देवी रिहा की गई, इतना अत्याचार उन्होंने पहली बार सहन किया था जिससे वे टूट गयी और राजनीति से पूर्ण रूप से दूरी बना ली। राजमाता के साथ हुए दुर्व्यवहार का सबसे ज्यादा रोष राजपूत समाज मे व्याप्त हुआ। इसलिए जब स्वतंत्रता पार्टी जनसंघ में और जनसंघ बीजेपी में परिवर्तित हुआ तब जयपुर के ही नही बल्कि पूरे राजस्थान के राजपूत समाज ने बीजेपी का साथ दिया और यह समाज अब तक बीजेपी परंपरागत वोट बना हुआ है।
आश्चर्य है जिन राजपूतो को कभी पृथ्वीराज चौहान, राणा सांगा, महाराणा प्रताप और महाराज अजीत सिंह जैसे महापुरुष एक ना कर सके उसी राजपूत समाज को एक महिला ने एकसूत्र में बांध दिया था। हालांकि राजमाता गायत्री देवी ने सन्यास लेने के बाद अपना ध्यान धार्मिक और सामाजिक क्रियाकलापों में लगा दिया। 1997 में उनके पुत्र की मृत्यु हो गयी जिससे वे टूट गयी और 2009 में लंबी बीमारी के चलते 90 वर्ष की आयु में वे भी परलोक सिधार गयी।
जयपुर की विरासत राजा मानसिंह की पहली पत्नी के बच्चों को मिली, स्वाभाविक था कि राजमाता गायत्री देवी ने एक जंग अपने परिवार से भी लड़ी थी और बड़ी मुश्किल से एक खजाना अपने लिये एकत्र कर रखा था जो उनकी मृत्यु उनके पौतो में बाँट दिया गया।
महिला दिवस पर जब भी नारी सशक्तिकरण की बात होती है तो गायत्री देवी को साइड लाइन कर दिया जाता है।
मगर समाज को यह ध्यान होना चाहिए कि वह एक ऐसी अद्भुत महिला थी जिन्होंने राजस्थान में महिलाओ की शिक्षा की वकालत की जिसे अंग्रेजो ने हाशिये पर पहुँचा दिया था। वे गायत्री देवी ही थी जिनकी बदौलत आज राजस्थान में बीजेपी का डंका बजता है, वे गायत्री देवी ही है जिन्होंने सबसे बड़े राजपूत घराने में पर्दा प्रथा को न सिर्फ अस्वीकार किया अपितु उसे अपने अंत तक पहुँचा दिया, 20वी सदी में वे एकमात्र स्त्री थी जो अपने पति के साथ सिंहासन पर बैठी और रामायण काल की हमारी गौरवशाली परंपरा को जीवित किया।
जब जब महिला दिवस बनाया जाएगा और नारी सशक्तिकरण की बात होगी तब तब न्याय की देवी सदा ही राजमाता के लिये आँसू बहायेगी क्योकि सो कॉल्ड फेमिनिस्ट कभी उनके साथ न्याय कर ही ना सके।

(परख सक्सेना)

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