परख की कलम से: तिलक जी की जयंती पर विशेष – वे थे कांग्रेस के मुखर हिन्दूवादी नेता

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100 वर्ष पुरानी बात है जब कांग्रेस एक महान राष्ट्रवादी पार्टी हुआ करती थी मगर इसमे दो गुट बन चुके थे – गरम दल और नरम दल।
गरम दल मानता था कि जब देश मे राजा-महाराजाओं का शासन था तो भारत सोने की चिड़िया था अंग्रेजो ने उसे गरीब बनाया इसलिए ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंकना चाहिए।
वही नरम दल मानता था कि कांग्रेस को लेबर पार्टी की तरह अंग्रेजो के साथ रहकर भारत का प्रतिनिधित्व करना चाहिए।
बहरहाल, गरम दल भारी पड़ रहा था इसका नेतृत्व करने वालो में अग्रणी थे बाल गंगाधर तिलक। तिलक के नेतृत्व में सबसे पहले क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी उत्पादों को जला डाला।
तिलक वैदिक शिक्षा के बड़े समर्थक थे। उनका व्यक्तित्व इतना बड़ा हो चुका था कि लोगों ने स्कूल पद्धति की जगह गुरुकुलों को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया।
तिलक ने ही गांधीजी की पहचान की और साउथ अफ्रीका से भारत आने पर उनका भव्य स्वागत किया। तिलक अफ्रीका में गांधीजी के अहिंसावादी आंदोलनों से बड़े प्रसन्न थे।
1916 में जब कांग्रेस अधिवेशन के दौरान तिलक और गांधीजी लखनऊ आये तो दूर-दूर तक सिर्फ सिर ही सिर दिखाई दे रहे थे। इसी अधिवेशन में उन्होंने कहा कि स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे हासिल करके रहूँगा!
और देखिये स्मरणीय दृश्य – उस समय रामप्रसाद बिस्मिल ने उन्हें बग्घी में बैठाया था और बैलों को हटाकर खुद उसे चलाने लगे थे।
ये जलवा था बाल गंगाधर तिलक का, महीने के आधे दिन ये जेल में होते थे क्योकि इन्होंने कुछ मराठी अखबार शुरू किए थे और उसमें वे ब्रिटेन विरोध में कोई कसर नही छोड़ते थे। सबसे बड़ी बात इनका केस मोहम्मद अली जिन्ना लड़ता था।
1910 का दशक प्रथम विश्वयुद्ध झेल रहा था उस पर तिलक के कारण हर हफ्ते बड़े आंदोलन हो रहे थे हालांकि अंग्रेजो ने हर आंदोलन को कुचल भी दिया। मगर युद्ध और आंदोलन के कारण राष्ट्रवाद का संचार हुआ।
1919 तक तिलक काफी हद तक गांधीजी से प्रभावित हो चुके थे।
तिलक ने अपने अंतिम समय मे गांधीजी की अहिंसावादी नीतियों का समर्थन भी किया और आंतरिक चर्चा के दौरान एक बड़ा बयान दे दिया कि गांधी ही कांग्रेस के सबसे बड़े स्तम्भ है इसका नतीजा यह हुआ कि अगले 30 वर्षो के लिये कांग्रेस के हर निर्णय पर गांधीजी की छाप रही और इसका नुकसान विभाजन के समय हुआ।
बाल गंगाधर तिलक भारत के पहले हिंदूवादी नेता भी थे, सड़क निर्माण से पहले नारियल फोड़ना या किसी राजनीतिक कार्य से पहले यज्ञ हवन करवाना – ये सब उन्होंने ही शुरू करवाया था जो कि आज भी यथावत जारी हैं।
पंडित नेहरू, चंद्रशेखर आजाद और 1920 में उभरकर आये तमाम महापुरुष तिलक को ही अपना आदर्श मानते थे।
तिलक की 1920 में मृत्यु हुई थी 27 वर्ष बाद जब देश आजाद हुआ तो पंडित नेहरू ने सबसे पहले उनकी मूर्ति लखनऊ में स्थापित की और आधिकारिक रूप से कहा कि तिलक ही क्रांति के जनक थे।
आश्चर्य की बात है जिसके व्यक्तित्व की छाप गांधीजी और चंद्रशेखर आजाद जैसे दिग्गजों पर पड़ी थी, आज उसका नाम लेने वाले भी बहुत कम है। कांग्रेस को खड़ा करने वाले को आज कांग्रेस ही भुला चुकी है, कदाचित उन्हें हिंदूवादी होने का दंड उन्ही की पार्टी दे रही है।
165 वी जयंती पर लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जी को शत शत नमन!

 

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