परख की कलम से: हमें अपने Hindu धर्म की सच्चाइयों को जानना होगा!

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तुलसीदास जी ने हनुमान चालीसा 16वी सदी में लिखी उससे पहले लोग भूत प्रेत से कैसे बचते थे?
द्वारिका यादवों ने 5000 वर्ष पूर्व बसाई तो क्या उससे पहले 3 ही धाम थे?
रामेश्वरम को श्री राम ने बसाया तो क्या इससे पहले 11 ही ज्योतिर्लिंग थे?
मध्यकाल में कुछ सूफियों ने भक्ति आंदोलन चलाया था जिसके चलते हिन्दू धर्म को बचाने के लिए इसमे कई बातें जोड़ ली गयी जो कि वैदिक काल मे नही थी। इन्ही में मंदिरो के चमत्कार, मूर्ति पूजा जैसे घोर अंधविश्वास शामिल है। इसी दौर में ऊपर लिखी मिथ्या धारणाओं को बढ़ावा मिला।
श्रीकृष्ण ने एक बात बड़ी अच्छी कही थी कि किसी भी परंपरा को महज इसलिए मत मानो की इसका निर्वहन तुम्हारे पूर्वज करते आये है क्योकि उनका युग अलग था।
पांडवों ने लगभग हारने वाला युद्ध इसलिए जीता क्योकि उन्हें भगवान पर पूरी श्रद्धा थी और वे निष्काम होकर लड़ रहे थे। युद्ध मे जाने से पहले पांडव किसी तीर्थ पर नही गए थे न ही कोई मन्नत उन्होंने मांगी थी।
ये था वैदिक युग, वेदों का मूल साफ है सत्यं वद, धर्मं चर। हिन्दू धर्म मे कामनाओं और अपेक्षाओं के लिये कोई स्थान नही है, यदि आप सत्य के मार्ग पर है तो आप नास्तिक ही क्यो ना हो भगवान आपके साथ है अन्यथा नही।
जहाँ तक ज्योतिर्लिंगों और धामों की बात है तो इन स्थानों पर जाना आवश्यक है क्योकि हिन्दुओं को एक दूसरे से जोड़े रखने के लिए ही आदि शंकराचार्य ने इन्हें स्थापित किया था।
मगर जब आप वृंदावन जाकर सोचते है कि इस मंदिर का बड़ा महत्व है तो यह अज्ञानता से ज्यादा कुछ नही। भगवान कण-कण में है, वो आपके किसी मंदिर का मोहताज नही है, मंदिर जाइए और ध्यान लगाकर वापस आ जाइये। मंदिर योग साधना का शिविर होता है न कि ट्रस्ट की झोली भरने की दुकान।
श्री राम और कृष्ण के जीवन मे बहुत सी बातें बाद में जोड़ दी गयी। अपनी पत्नी को दबा कर रखना है इसलिए अग्निपरीक्षा का प्रपंच डाल दिया गया। खुद को बहुविवाह करने थे तो कृष्ण को 16000 पत्नियों की कथा से बदनाम कर दिया। जबकि कृष्ण से बड़ा योगी उनके बाद आज तक नही जन्मा।
आने वाले हिन्दू अपने धर्म को पहचाने आवश्यकता है अंधकार को नष्ट करके वेदों के मार्ग पर चलने की, वेद ही एकमात्र मुक्ति का मार्ग है। मंदिर और तीर्थ स्थल भिन्न भिन्न संस्कृतियो को एक करने के लिये है ना कि परंपराओं के नाम पर गंदगी मचाने के लिये।
जब परंपराओं के नाम पर कचरा गंगा में फेका जाता है तो महान सम्राट भागीरथ की आत्मा यही कही भटकती होगी और तरस खाती होगी की वे गंगा को इस नरक में क्यो ले आये?
जब परंपराओं के नाम पर किसी पशु की बलि दी जाती है तो चंद्रगुप्त और विक्रमादित्य जैसे शासको की आत्माएं सोचती होगी कि जो पुरुषार्थ अमुक पशु पर दिखा रहे हो वो मुगलो और अंग्रेजो के समय कहाँ था?
हिन्दू धर्म एकमात्र धर्म है जो पूरी तरह सम्पूर्ण है और हर व्यक्ति को स्वतंत्रता देता था। समाज को आडंबर, अंधविश्वास और अज्ञानता से बाहर निकालना ही हर हिन्दू का कर्तव्य होना चाहिए।
हमारी संस्कृति वो नही है जो मध्यकाल के सूफी आंदोलन में बनाई गई थी, वह केवल एक ढाल थी आपको हिन्दू बनाये रखने के लिये। आज हम स्वतंत्र है तो हमे चाहिए कि हम फिर वेदों के मार्ग पर लौटे, अपने मंदिरो को इन अंधकारों से मुक्त करे और वेदमंत्रों को जीवन मे उतारें।
(परख सक्सेना)

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