मोदी सरकार का तीनों कृषि कानून वापस लेने का ऐलान, राकेश टिकैत ने आंदोलन खत्म करने पर कही ये बात

गुरु पर्व और कार्तिक पूर्णिमा पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्र को संबोधित किया. इस दौरान पीएम मोदी ने तीन कृषि कानूनों को वापस लेने का ऐलान कर दिया. अपने 18 मिनट के संबोधन में पीएम ने कहा कि मैं आज देशवासियों से क्षमा मांगते हुए यह कहना चाहता हूं कि हमारी तपस्या में कोई कमी रह गई होगी. सरकार तीनों कृषि कानूनों को नेक नीयत के साथ लाई थी, लेकिन शायद हम कुछ किसानों को इसके बारे में समझाने में असफल रहे.

किसान आंदोलन पर टिकैत का ऐलान

प्रधानमंत्री के संबोधन के बाद भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा है कि आंदोलन तत्काल वापस नहीं होगा. राकेश टिकैत ने ट्वीट किया, ‘आंदोलन तत्काल वापस नहीं होगा, हम उस दिन का इंतजार करेंगे जब कृषि कानूनों को संसद में रद्द किया जाएगा. सरकार MSP के साथ-साथ किसानों के दूसरे मुद्दों पर भी बातचीत करें.’

देश के नाम मोदी का 11वां संबोधन

सुबह 9 बजे प्रधानमंत्री का संबोधन शुरु हुआ. कोरोना के दौर में देश के नाम पीएम का ये 11वां संदेश था. पीएम ने कहा कि हमारी सरकार किसानों के कल्याण के लिए पूरी सत्य निष्ठा से, किसानों के प्रति समर्पण भाव से, नेक नीयत से ये कानून लेकर आई थी. हम अपने प्रयासों के बावजूद कुछ किसानों को ये समझा नहीं पाए. कृषि अर्थशास्त्रियों ने, वैज्ञानिकों ने, प्रगतिशील किसानों ने भी कृषि कानूनों के महत्व को समझाने का भरपूर प्रयास किया.

जीरो बजट खेती पर सरकार का जोर

पीएम ने कहा कि आज ही सरकार ने कृषि क्षेत्र से जुड़ा एक और अहम फैसला लिया है. जिसमें जीरो बजट खेती यानी प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए और देश की बदलती आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर क्रॉप पैटर्न को वैज्ञानिक तरीके से बदलने की दिशा में काम किया जाएगा.

2020 में पास हुए थे तीनों कृषि कानून

तीनों कृषि कानून 17 सितंबर 2020 को संसद से पास हुए थे. इसके बाद से लगातार किसान संगठन विरोध कर इन कानूनों को वापस लेने की मांग कर रहे थे. किसान संगठनों का तर्क था कि इस कानून के जरिए सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को खत्म कर देगी और उन्हें उद्योगपतियों के रहमोकरम पर छोड़ देगी. जबकि, सरकार का तर्क था कि इन कानूनों के जरिए कृषि क्षेत्र में नए निवेश का अवसर पैदा होगा और किसानों की आमदनी बढ़ेगी. सरकार के साथ कई दौर की वार्ता के बाद भी इस पर सहमति नहीं बन पाई. किसान दिल्ली की सीमाओं के आसपास आंदोलन पर बैठकर इन कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे.