Poetry: समेट लो खुशियों के लमहे !

ज़िंदगी और मृत्यु के साए में
ज़रा सा फासला 
एक ओर ज़िंदगी की रोशनी
और किलकारियां 
दूसरी ओर मृत्यु की ओर बढ़ते कदमों की
बेबसी और खामोशियां 
ज़िंदगी दौड़ रही है 
हंसती मुस्कराती 
और दूसरी ओर 
मृत्यु दस्तक दे रही आहिस्ता आहिस्ता 
ज़िंदगी और मृत्यु के बीच का सफ़र 
कैसे तय किया कैसे पूरी हुई
ये अनवरत यात्रा
लम्हा लम्हा जीते जीते बरस गुजर जाते हैं 
कभी अपने पराए तो कभी
पराए अपने बन जाते हैं 
समय कब पंख बिना उड़ जाता है 
जब तक समझ आता है 
इंसान बस खाली हाथ रह जाता है
समेट लो खुशियों के लम्हे 
जिन में एक  उम्र जी लेते हैं 
सही राह को चुनकर 
ज़िंदगी को नए मायने दे देते हैं
मेरी मुस्कराहट और खिलखिलाहट 
गूंजेगी सदियों तक दिल में तेरे 
मैं रहूं या ना रहूं 
मैं जिंदगी बनकर जियूंगी तुझमें हर पल 
मौत के मौन आगोश में जाकर भी 
रहूंगी मुखरित तुझमें हर पल !