पूछता है देश: स्वतंत्र भारत में किसी महिला को फांसी क्या हैरान नहीं करती?

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स्वतंत्र भारत में किसी पहली महिला को फांसी !! बहुत हैरान कर देने वाली खबर है ये. और इसकी वजह है निर्दयता की पराकाष्ठा जिसे सुन कर कोई भी कांप उठे.
13 बरस पूर्व, अंधे प्यार में शबनम ने अपने प्रेमी सलीम के साथ मिल कर अपने माँ बाप और 10 महीने के भतीजे समेत परिवार के 7 लोगों को बेहोशी की दवा पिला कुल्हाड़ी से काट डाला.
अमरोहा की अदालत ने उसे फांसी की सजा दी थी और हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट एवं राष्ट्रपति के पास दया याचिका भी ख़ारिज होने के बाद अमरोहा के जिला जज ने शबनम और सलीम का डेथ वारंट मांगा है.
महिला अपराधी को फांसी देने के लिए उत्तर प्रदेश का एकमात्र फांसी घर मथुरा में है जहां उसे तारीख तय होने पर फांसी दी जाएगी.
ऐसी क्रूरता की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता, कोई परायों का क़त्ल करे, वो भी सोचना कठिन है मगर यहां तो अपराधी ने प्रेमी के साथ मिल कर अपनों को ही बड़ी निर्ममता से ख़त्म कर दिया.
उसके 12 वर्ष के बेटे को एक दंपती बुलंदशहर में पाल रहा है -वो अपने बेटे को पढ़ लिख कर नेक इंसान बनने की
सलाह दे रही है और कह रही है कभी जिद ना करना और उसे याद मत करना.
ऐसी निर्दयता से बचने के लिए बच्चों को शुरू से ही संस्कार देने की जरूरत है पर आज मजहब के नाम पर बच्चों को शुरू से ही अपराध के लिए बरगलाना एक आम बात होती जा रही है.
शबनम के अपराध में वैसे कोई मजहबी नज़रिया नहीं था मगर आज अपने मजहब के लिए दूसरों का क़त्ल करने में देर नहीं लगती.
वैसे शबनम और सलीम के फांसी से बचने के सभी मार्ग बंद हो गए हैं मगर फिर भी न जाने कौन वकील कौन सा तुर्रा निकाल लाये, कह नहीं सकते -कोई उसके धर्म को भी आधार बना सकता है या उसके बच्चे की उम्र का भी सहारा ले सकता है.
जब दिशा रवि की उम्र का रोना रोया जा सकता है तो शबनम के बच्चे के लिए भी किया जा सकता है –वैसे इन सब बातों पर कोर्ट ने संज्ञान ले लिया होगा लेकिन एक बार फिर मौका तलाशने में क्या हर्ज है.
(सुभाष चन्द्र)
“मैं वंशज श्री राम का”