पूछता है देश: मीडिया संगठन गुंडों की संस्थाएं हैं क्या?

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दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि आज मीडिया संगठन ऐसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नशा कर रहे हैं कि उन्हें आज हर तरह के झूठ फैलाने की आज़ादी मिलने के बाद भी इनको लगता है कि मोदी ने “अघोषित आपातकाल” लगाया हुआ है.

मीडिया संगठनों की बैठक में 6 पत्रकारों पर राजद्रोह के केस दर्ज किये जाने की निंदा की गई. ये संगठन हैं प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया, एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया, इंडियन वीमंस प्रेस कॉर्प्स और दिल्ली यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट – इन सभी का मतलब है कि पत्रकार लोगों को बेलगाम बयानबाजी की इज़ाज़त मिलती रहे जिससे वो हर किसी की मान-मर्यादा को तार तार करते रहे.
जिन लोगों पर राजद्रोह के केस दर्ज हुए हैं, उनको दूध के धुले पत्रकार होने पर कई सवालिया निशान लगे हुए है. इसी लिये देखने में आता है कि वे प्रायः नरेंद्र मोदी के लिए मन में नफरत का जहर पाले रहते हैं और उसी को उगलते भी रहते हैं. ये पत्रकार हैं क्या या देश को आग लगाने की इन्होनें सुपारी ली हुई है? \
जिन ‘खास’ पत्रकारों पर केस दर्ज हुए हैं, उनमे राजदीप सरदेसाई, नेशनल हेराल्ड की सम्पादकीय सलाहकार मृणाल पांडे, कारवां पत्रिका के मुख्य संपादक परेशनाथ, प्रबंध संपादक अनंत नाथ, कार्यकारी संपादक विनोद के जोश और अपनी पत्नी की हत्या में आरोपित कांग्रेस सांसद शशि थरूर शामिल हैं.
राजदीप सरदेसाई ने एक ट्रैक्टर ड्राइवर की ट्रैक्टर पलटने की वजह से मौत के लिए अफवाह उड़ाई कि उसकी मौत पुलिस की गोली से हुई और सभी आरोपियों ने इस खबर को अपने अपने तरीके के उछाला. इस तरह की झूठ फैलाने का मकसद केवल दंगा भड़का कर राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने के सिवाय और कुछ नहीं था.
ये लोग कोई छोटे-मोटे पत्रकार नहीं हैं बल्कि ये मंजे हुए खिलाडी हैं जिनके कई ‘गुट’ है जिसे लुटियन और खान मार्किट गुट भी कहा जाता है. जो पत्रकार संगठन इन पर दर्ज मुकदमों पर विधवा-विलाप कर रहे हैं, वो भी इन सभी के गुटों के ही सदस्य हैं. इन लोगों की झूठ की फैक्टरियों पर रोक लगना बहुत जरूरी है वरना ये देश को आग लगाने में बहुत बड़ा रोल अदा कर सकती हैं.
शेखर गुप्ता ने तो खुलेआम लेख छापा था कि नरेंद्र मोदी को परास्त करने लिए उसके खिलाफ जम कर झूठ फैलाया जाये – राजदीप सरदेसाई तो 18 साल से अपने संगी साथी पत्रकारों और कांग्रेस के नेताओं और चुने हुए वकीलों के साथ मिल कर नरेंद्र मोदी के खिलाफ हर तरह के झूठ फैलाने का काम कर रहे हैं. और अबकी बार तो राजदीप और उनके गुट ने महामहिम राष्ट्रपति को भी नहीं छोड़ा और उनके खिलाफ भी झूठ परोस दिया.
अब इन लोगों के मुक़दमों से अदालतों को अपनेआप को अलग रखना चाहिये क्यूंकि ये लोग बहुत निम्नस्तरीय हरकतों को अंजाम दे रहे हैं.  इसी महन पत्रकार राजदीप ने एक दूसरे आशुतोष नामक पत्रकार के साथ मिल कर एक डॉक्टर अजय अग्रवाल के खिलाफ फर्जी स्टिंग किया और उसका चरित्र हनन करके उसका कैरियर बर्बाद कर दिया. 10 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति दी थी और अब देर से ही सही, इनका न्याय जरूर होगा.
पत्रकार संगठनों को ऐसे निम्नस्तरीय और बदले की भावना से काम करने वाले पत्रकारों को सुरक्षा देने की बजाय आत्म-निरीक्षण करना चाहिए कि क्या ऐसी अभिव्यक्ति की आज़ादी का दुरूपयोग करना उचित है? ये लोग अगर ऐसे ही चलेंगे तो सरकार भी कानून के तहत कार्रवाई करने का अधिकार रखती है.
अक्सर सुनने में आता है कि जनता इनका इलाज सड़कों पर भी करना चाहती है और यदि कभी ऐसा हो गया तो इनको अच्छा नहीं लगेगा.  ऐसे तत्व सरकार के खिलाफ ही झूठ ही नहीं फैलाते,अपनी ही बिरादरी के सजग और जिम्मेदार पत्रकारों के खिलाफ भी नफरत का माहौल बना कर दुष्प्रचार करते हैं.
(सुभाष चन्द्र)
“मैं वंशज श्री राम का”
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Disclaimer: उपरोक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं जिनसे न्यूज़ इन्डिया ग्लोबल की सहमति हो यह आवश्यक नहीं.
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