रामचरित मानस : किष्किन्धा की महागाथा (प्रथम खंड)

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प्राचीन भारत के दक्षिण में एक सुदृढ राज्य था लंका जहाँ राजा को कुबेर कहा जाता था। कुबेर बहुत ही व्यापारिक दिमाग वाले थे, जिन्होंने व्यापार के दम पर लंका को स्वर्ण नगरी बना दिया था। वे अन्य देशों में भी व्यापार स्थापित करने लगे, जिसके कारण लंका में उनका विरोध शुरू हो गया। लंकावासी नही चाहते थे कि उनकी संपन्नता का रहस्य अन्य देशों में पहुँचे।

कुबेर के विरोधियों में उनका अपना भाई रावण भी था, रावण ने कुबेर का तख्तापलट कर दिया और लंका की गद्दी पर बैठ गया। रावण ने लंका की गद्दी संभालते ही विदेशों में सारे व्यापार रोक दिए, कुबेर के समय से ही लंका एक रहस्य थी उसके बारे में कोई नही जानता था।
रावण के समर्थक अब समुद्र पार करके भारत आते, लूटपाट करते तथा ऋषि मुनियों की हत्या करते। एक बार तो अयोध्या के राजा रघु ने उन्हें पराजित कर दिया था पर रघु की मृत्यु के बाद वे फिर से एक्टिव हो गए। उस समय दक्षिण के सभी राजा भयभीत थे और उन्होने अपना राज्य खाली कर दिया था।
पर एक राज्य था किष्किंधा जिसके राजा शतावान ने रावण की चुनौती स्वीकार की, शतावान वीरता से लड़े और वीरगति को प्राप्त हुए। शतावान बहुत समझदार थे वे जानते थे असुर प्रभावी क्षेत्र में राज्य जितना ढका रहे उतना ही अच्छा है। इसलिए किष्किंधा को जंगलों के बीचो बीच बसाया गया था।
वन में रहने के कारण यहाँ के लोग वानर कहलाये इसका यह अर्थ बिल्कुल नही है कि ये लोग बंदर थे या वैसे दिखते थे। शतावान का कोई पुत्र नही था दो भतीजे थे बाली और सुग्रीव, दोनो ही अतिबलशाली और महाज्ञानी थे। मगर बाली को अपनी वीरता का बहुत घमंड था बाली दुष्ट स्वभाव का था जबकि सुग्रीव बड़े ही शांत और सहज स्वभाव के थे। बाली बड़ा था अतः वह स्वयं ही किष्किंधा की गद्दी पर बैठ गया।
बाली ने रावण को छोटा दिखाने के लिए कुछ ऋषि मुनियों को शरण दी जिससे रावण क्रोधित हो गया, रावण ने अपनी सेना भेजी तो वानरों ने उसे पराजित कर दिया।
अंततः रावण स्वयं आया, बाली और रावण आमने सामने हुए। युद्ध के एकाएक बाली ने रावण को अपनी भुजाओं में जकड़ लिया, रावण ने लाख कोशिश की पर बाली विजयी हुआ। अंततः रावण ने प्रस्ताव रखा कि वो किष्किंधा की प्रजा को कभी कोई नुकसान नही पहुँचायेगा साथ ही बाली का हर प्रकार से ध्यान रखेगा।
बाली ने तुरंत ही यह शर्त मान ली और रावण से मित्रता करके शरणागत ऋषि मुनियों की हत्या करवा दी। दूसरी ओर सुग्रीव बाहर थे तब उन पर एक असुर ने आक्रमण किया जिससे एक अन्य वानर ने उनकी रक्षा की। सुग्रीव इस वानर से बहुत प्रभावित हुए ये थे हनुमान, सुग्रीव के आग्रह पर हनुमान जी को किष्किंधा दरबार मे स्थान और सम्मान प्राप्त हुआ।
हनुमान जी कुशाग्र बुद्धि के व्यक्तित्व थे और एक महान योगी तथा विशाल देह वाले महान योद्धा भी थे।
सुग्रीव ने दरबार मे मुद्दा उठाया कि रावण से संधि करने के स्थान पर बाली को चाहिए कि वो अयोध्या के महान सम्राट दशरथ से समर्थन मांगे। यदि रघुवंशी और वानर एक हो गए तो रावण को मार गिराया जा सकता है यह सुग्रीव जी की सोच थी दुर्भाग्यवश उनका सभी ने मजाक उड़ाया।
दरबार के कुछ खास बुद्धिजीवी जैसे हनुमान जी, जामवंत जी, नल और नील ने ही सुग्रीव का समर्थन किया।
दूसरी ओर रावण ने एक और चाल चली उसने एक और दैत्य को बाली से लड़ने भेजा, उस दैत्य का पीछा करते हुए बाली और सुग्रीव एक गुफा तक आ गए, बाली अकेले ही गुफा में घुस गया और जब कई दिनों तक नही आया तो सुग्रीव ने समझा कि बाली मारा गया।
सुग्रीव किष्किंधा लौटे और सिंहासन पर बैठ गए। प्रजा बड़ी खुश थी उत्सव का माहौल था कि अचानक बाली आ गया। बाली ने सुग्रीव पर हमला किया और उनकी पत्नी को अपने अधीन कर लिया। सुग्रीव को भागना पड़ा वे ऋषिमुख पर्वत पर पहुँच गए।
सुग्रीव के पीछे पीछे जामवंत, नल और नील भी आये, वही हनुमान जी दूसरी ओर योग साधना में बैठे थे। सुग्रीव का बुरा समय आरंभ हो गया था वही उन्हें समाचार मिला कि अयोध्या में पुत्र वियोग में राजा दशरथ चल बसे। श्री राम और लक्ष्मण जी वन में है तथा भरत उनकी खड़ाऊ सिंहासन पर रखकर राजपाठ चला रहे है।
सूर्यवंशियों का सिंहासन खाली था यह जानकर सुग्रीव के दुख की सीमा नही रही हालांकि राम लखन का वनवास उनका और किष्किंधा का वनवास सदा के लिये समाप्त करने वाला था।
(क्रमशः)

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