रामचरित मानस : किष्किन्धा की महागाथा (द्वितीय खंड)

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सुग्रीव के साथ हुए छल से अनभिज्ञ हनुमान जी किष्किन्धा पहुँचे तो बाली ने उनका मजाक बनाना शुरू कर दिया, उन्होंने बाली से कहा कि अपने भाई की स्त्री का हरण करना तेरे जीवन की सबसे बड़ी भूल है, जो राजा स्त्री तथा विद्वानों का सम्मान नही करता उसका राज्य स्वतः ही नष्ट हो जाता है। बाली तो बाली था उस पर हनुमान जी के शास्त्रो का कोई असर नही हुआ।

हनुमान जी ने तुंगभद्रा नदी पार की और सुग्रीव की खोज करते हुए ऋषिमुख पर्वत पर आ गए। ज्ञातव्य हो ऋषिमुख पर्वत और तुंगभद्रा नदी अब भी कर्नाटक में है।
सुग्रीव जी को आश्वासन दिया कि प्रभु इच्छा से सब ठीक होगा। दक्षिण भारत मे अधर्म अपने पैर जमा चुका था, ऋषिमुख पर्वत पर बैठे सुग्रीव और उनके सहयोगी रोज देखते थे कि असुर आते है और महिलाओ को उठाकर ले जाते है। यह देखकर सुग्रीव और उनके सहयोगी गुस्से से भर जाते।
13 वर्ष बीत गए, हमेशा की तरह एक विमान हवा से बात करते हुए निकला जिसमे एक स्त्री थी, उस स्त्री ने अपने आभूषण निकालकर फेक दिये और चीखकर कहा कि यदि मेरे पति श्री राम और देवर लक्ष्मण भैया मिले तो उन्हें बता देना की मेरा हरण रावण ने किया है।
ये आभूषण वानरों ने सुग्रीव जी को दे दिये, सुग्रीव दुखी थे पर अब दुख की घड़ी दूर होने का समय नजदीक था। वह स्त्री कोई और नही बल्कि अयोध्या की युवराज्ञी और कार्यकारी महारानी सीता थी। श्री राम और लक्ष्मण वनवास पर थे और सीता जी की खोज करते हुए शबरी के आश्रम पहुँच गए थे।
शबरी एक बार महाराज सुग्रीव से मिल चुकी थी, वे जानती थी कि सुग्रीव असुरों के विरोधी है और सूर्यवंशियों के समर्थक थे। अतः माता शबरी ने श्री राम को ऋषिमुख पर्वत की ओर भेज दिया, श्री राम यहाँ हनुमान जी से मिले और फिर सुग्रीव जी से।
श्री राम और सुग्रीव एक ही प्रकार के दुख के शिकार थे, दोनो ने अग्नि को साक्षी मानकर शपथ ली कि वे एकजुट होकर आपसी सहयोग से दक्षिण ही नही अपितु समस्त भारत वर्ष में धर्म की पुनः स्थापना करेंगे।
श्री राम का सहयोग पाकर सुग्रीव ने बाली को चुनौती दी और दोनो में भीषण युद्ध हुआ जिसके बाद हम सभी जानते है कि श्री राम ने बाली का वध कर दिया। धूल में पड़े बाली को हनुमान जी की एक एक बात याद आने लगी और उसे पश्चाताप भी हुआ। अंततः किष्किंधा में फिर से खुशियां लौट आयी और सुग्रीव का राज्याभिषेक हुआ।
अभियान शुरू हुआ लंका की खोज का, चूंकि रावण का विमान दक्षिण दिशा में गया था अतः दक्षिण में हनुमान जी और जामवंत जी को भेजा गया। हनुमान जी को इसीलिए अंगूठी दी गई थी, हनुमान जी लंका गए सीताजी का पता लगाया और वापस किष्किंधा लौट आये।
सुग्रीव जी समेत पूरी सेना धनुषकोटि के तट पर आ गयी और मार्ग खोजने लगी समुद्र लांघने का। वानर सेना में नल और नील दो अभियंत्री थे जिन्होंने सेतु बांधने का कार्य अपने हाथों में लिया।
उन्होंने कई लकड़ियों की एक पटरी तैयार की और उसे लंका तक जोड़ दिया। इसके बाद उन्होंने पत्थरो में छिद्र किये ताकि वे डूब ना सके, वही भारी पत्थर इस पटरी पर बिछाए गए और अंततः लंका तक कि सड़क मात्र 2 दिन में तैयार हो गयी जो कि हमारे इंजीनियर आज भी नही कर सकते। हजारों साल पहले बना वो सेतु आज तक यथावत है जबकि हमारी सरकारों द्वारा बनवाये ब्रिज 15 साल से ज्यादा नही चलते।
बहरहाल अब सेना लंका पर चढ़ाई को तैयार थी और किष्किंधा के वीरों की गाथा भारत ही नही अपितु विश्व इतिहास में एक छाप छोड़ने वाली थी।
(क्रमशः)