NIG Story: मैं भी हूँ एक कली

आजकल मैं घर से बहुत ही कम निकलती हूँ क्योंकि सर्दियाँ मुझे पसंद नहीं. गर्मियां मुझे बहुत भाती हैं और तभी गुप्ता जी और उनके परिवार के लोग मेरी शक्ल देख पाते हैं. पर अभी दो माह हो गए मैं घर से बाहर नहीं आई हूँ. ये दिसंबर बीत जाए उसके बाद आएगी जनवरी फिर फरवरी फिर मार्च. मार्च के बाद मौसम मेरे लायक आ जाएगा फिर तो दिन और रात बाहर ही रहूंगी. अभी तो रसोई घर के बगल में बने स्टोर रूम के किवाड़ के पीछे दीवाल पर बना गहरा छेद ही मेरा घर है. ये बात अलग है कि मेरे घर का दरवाजा हमेशा खुला रहता है.
हाँ, मैं एक छिपकली हूँ और छिपी हुई हूँ अभी क्योंकि सर्दियां मेरी त्वचा को तंग कर देती है. इसलिए अपनी खोली में पड़ी-पड़ी मैं अपने तन की गर्मी से ही अपने को गर्म रखती हूँ. मैं लेटी तो रहती हूँ मगर मेरी आंखें और कान दिन में खुले ही रहते हैं. मुझे आहटें भी सुनाई पड़ती हैं और आवाज़ें भी. कभी-कभी कोई कीड़ा गलती से राह भूल कर भीतर चला आता है तो मुझे भोजन मिल जाता है और उससे एक-दो दिन गुजारा हो जाता है. पर कभी-कभी हफ्ते भर भी कोई मक्खी मकड़ी या कॉकरोच इस  तरफ नहीं फटकता तो भूख से आंतें कुलबुलाती हैं. पर बाहर निकलने की हिम्मत नहीं होती क्योंकि भूखे रह कर तो ज़िंदा रह सकती हूं पर सर्दी में ठंडे हो कर जान नहीं देनी है मुझे.
पड़े-पड़े तमाम आवाज़ें मेरे कानों तक चली आती हैं जो प्रायः मिश्रित हो होती हैं. टीवी की आवाज़ सबसे भारी होती है क्योंकि गुप्ता जी के बच्चे फूल वॉल्यूम पर टीवी चलाते हैं और इस कारण डाट भी रोज़ खाते हैं पर वे बच्चे हैं न इसलिए दिल में नहीं रखते और रोज़ डाट भूल जाते हैं अगली डाट खाने तक. पर मैं गिनती रहती हूँ कि इस हफ्ते कितनी बार गुप्ता जी और गुप्ताइन ने बच्चों पर टीवी की आवाज़ को लेकर गुस्सा उतारा है. पर वो आवाज़ भी टीवी से भारी नहीं होती. टीवी से भारी आवाज़ गुप्ता जी के आठ साल के बच्चे की होती है जब वो अपनी पूरी ताकत लगा कर रोना शुरू करता है. और इस गलाफाड़ रुदन को रोकने के लिए झट से उसकी मांग भी मान ली जाती है. लेकिन गुप्ताइन रोज़ किसी न किसी बात पर झगड़ती रहती हैं गुप्ता जी से लेकिन न गुप्ता जी कभी रोये न ही उनकी कोई मांग गुप्ताइन ने आज तक मानी.
तो कुल मिला कर ज़िंदगी इस घर की इसी तरह चल रही है और किवाड़ के पीछे मेरी ज़िंदगी भी साथ-साथ चली जा रही है. पिछले छह साल से तो मैं ही देख रही हूँ इस घर में शोर ही इस घर की पहचान है. जब शोर नहीं होता तो पड़ोसी खुश होते हैं कि चलो गुप्ता जी की फैमिली कुछ दिन के लिए अल्मोड़ा चली गई है. अब कुछ दिन कटेंगे शान्ति से. पर मुझे नहीं अच्छा लगता है शान्ति में. क्योंकि जब से इस घर में शिफ्ट किया है, मम्मी के साथ बचपन से आज तक शोर ही शोर देखा है. इसलिये जब भी शोर नहीं होता सन्नाटा मुझे खाने दौड़ता है. ऐसे में मैं खुद से ही बात कर लेती हूँ ताकि शोर मेरे आसपास कुछ न कुछ बना रहे और मुझे ज़िंदगी का एहसास होता रहे.
वैसे तीन महीने पहले यानी सितंबर में एक बार शोर से थोड़ी परेशानी मुझे भी हो गई थी. पर वो शोर रोज़ वाला नहीं था. उस दिन कुछ ख़ास ही शोर था. उस शोर में बच्चे के रोने का शोर भी था, गुप्ताइन के चीखने का भी, गुप्ता जी के कोसने का भी और मोहल्ले वालों की आवाज़ें भी -सब उसी में शामिल थीं. किसी को ये ज़रा भी फ़िक्र नहीं थी कि घर में कोई और भी है जिसे शोर से समस्या हो सकती है जैसे मैं. पर छिपकलियों की यही समस्या है कि वे अपनी समस्या कहें तो किससे कहें. मम्मी तो अब रही नहीं वर्ना मेरी समस्या सुन कर हमेशा की तरह कहतीं – कोई बात नहीं बच्ची, धीरे धीरे आदत हो जायेगी तुझे. जब ज्यादा शोर हो न तो कान बंद कर लिया कर अपने.
खैर, ये तो सब कहने वाली बात है. भला मैं अपने कान कैसे बंद कर सकती थी. हाँ ये हो सकता था कि मैं मम्मी के कान बंद कर देती और वो मेरे. दोनों की बचत हो जाती शोर से. तो बात ये उस दिन की थी जब दिन दहाड़े ही गुप्ता जी को गुप्ताइन ने घर से निकाल डाला था. गुप्ता जी हक्के-बक्के रह गए. भला ये भी कोई बात होती है. पड़ोसी देखेंगे तो क्या कहेंगे. पहले तो काफी देर तक धीरे-धीरे दरवाजे पर मुँह लगा कर बोलते रहे. इस बोलने में समझाना भी था कोसना भी था और गुस्सा भी था. मुझे तो सब साफ़ सुनाई दे रहा था क्योंकि मैं तो झींगुर के चलने की आवाज़ भी सुन सकती थी लेकिन गुप्ता जी इतने धीमे बोल रहे थे कि उतने धीमे गुप्ताइन को कुछ सुनाई नहीं दिया. हाँ, पड़ोसियों को ज़रूर भनक लग गई कि ऐसी क्या बात है कि पिछले दो घंटे से गुप्ता जी दरवाजे पर ही खड़े हैं.
पड़ोसियों को देख कर गुप्ता जी ने कुछ देर अभिनय का सहारा लिया ऐसे दिखने लगे जैसे कुछ सोचने में लगे हों और घर से भीतर जाने वाले हों या फिर शायद बाहर.निकल कर घर के भीतर कुछ भूल गए तो अब उसकी याद कर रहे हों. जब एक-दो पड़ोसी आ कर पूछने लगे तो गुप्ता जी को हिलना पड़ा. बिना मतलब में ही मार्केट के दो चक्कर लगा आये. लेकिन गुप्ताइन ने अब भी दरवाज़ा नहीं खोला था. भीतर से बच्चे की चिल्लाने की आवाज़ आ रही थी. वो कह रहा था कि मुझे खेलने जाना है बाहर दोस्त इंतज़ार कर रहे हैं. पर गुप्ताइन ने किसी की एक न सुनी. उनको लग रहा था कि दरवाज़ा खोलेंगी तो बच्चा बाद में बाहर जाएगा, बच्चे का बाप पहले भीतर आ जाएगा. बच्चा एक दिन नहीं खेलेगा तो चलेगा लेकिन उसके बाप को सजा नहीं मिली तो नहीं चलेगा.
जब बाहर खड़े-खड़े पैर दुखने लगे तो गुप्ता जी लगे बड़बड़ाने. उधर उनके पीछे धीरे-धीरे पड़ोसियों का कुनबा भी जुड़ता जा रहा था. सब ऐसे देख रहे थे जैसे अब गुप्ता जी कुछ देर में दया की तरह दरवाज़ा तोड़ ही देंगे और फिर लेंगे जम कर गुप्ताइन की खबर. या फिर गुप्ता जी की जलीकटी सुन कर गुप्ताइन दरवाजा खोल कर बाहर आएँगी और फिर गुप्ता जी की करेंगी जम कर धुलाई. जो भी हो मजा तो पड़ोसियों को ही आने वाला था वो भी फ्री में.
अचानक हुआ ये कि एक पड़ोसी ने सहानुभूति जता दी. गुप्ता जी से पूछा कि क्या बाहर निकाल दिया है आपको? – कौन निकालेगा मुझे बाहर? ये मेरा घर है..वो तो ज़रा गलतफहमी हो गई है इसलिए दरवाजा नहीं खोल रही हैं. गुप्ता जी ने पूरे आत्मविश्वास से पूछने वाले की आंखों में आंखें डाल कर जवाब दिया. गुप्ता जी की बड़ी बेटी दार्शनिक की मुद्रा में बगले के कमरे की खिड़की से बाहर की और ऐसे देख रही थी जैसे शून्य में खो गई उसकी दृष्टि इस साल फेल होने से बचने का कोई रास्ता ढूंढ ही लेगी. उसे न गुप्ता जी दिख रहे थे न गुप्ता जी के पीछे भावुकता से भरे हुए ढेर सारे पड़ोसी.
कुछ देर में ही गुप्ता जी का धीरज चूक गया. गुप्ता जी अपनी पर आ गए और खुल कर गुप्ताइन की लानतें-मलामतें करने लगे. उधर बच्चा भी जोर-जोर से शुरू हो गया. उसकी माँ उससे भी ऊंची आवाज़ में गुप्ता जी की सात पुश्तों की खबर लेने लगी. पड़ोसियों को मजा आने लगा. उन्हें लगा कि असली खेल तो अब शुरू हुआ है. ऐसे में एक पड़ोसी ने फिरकी ले ली. गुप्ता जी से बोलै – मेरी मानो तो पुलिस बुला लो गुप्ता जी !
अब गुप्ता जी पड़ोसी पर टूट पड़े. सबके घरों में होती हैं लड़ाइयां. तुम्हारे घर पर नहीं होती क्या? सारा मुहल्ला जानता है बेटे के दहेज के लिए इतना मुँह फाड़ते हो कि बेटे की शादी नहीं होने दी अभी तक. चालीस का होने वाला है इस साल. पड़ोसी धीरे से खिसक लिया. अब दूसरा आ गया सामने उसकी जगह. उसने बोला – एक बात तो है गुप्ता जी, भाभी जी डरती नहीं हैं आपसे!
गुप्ता जी उस पर भी भड़कने वाले थे कि अचानक दरवाजा खुल गया. दरअसल बच्चे ने अम्मा की नजर बचा कर किसी तरह कुर्सी खींच कर उस पर चढ़ कर ऊपर से कुण्डी खोल ली थी और उसके बाद बच्चा बाहर तो पीछे-पीछे अम्मा भी बाहर आ गई. अब दोनों महारथी आमने-सामने थे. गुप्ता जी सन्नाटे में आ गए. सारे पड़ोसी सांस रोक कर आगामी युद्ध की प्रतीक्षा में थे. पर इससे पहले कि गुप्ताइन खुल्ले आम गुप्ता जी की क्लास ले लेतीं, उनकी बेटी भी बाहर पधार गई और उसने समझदारी कर परिचय देते हुए पापा का हाथ पकड़ा और उनसे बोली – पापा, अब आप जल्दी से सॉरी बोलो मम्मी को ! आइंदा से मम्मी को आप चिढ़ाना नहीं. मम्मी को बीपी है न, आपको भी पता है.इसीलिये जल्दी गुस्स्सा आ जाता है उनको..
गुप्ताइन भीड़ के कारण गुप्ता जी को आग्नेय नेत्रों से घूरती रह गईं. कुछ बोल पातीं इससे पहले ही बेटी पापा जी को लेकर अंदर प्रवेश कर गई. पापा जी तो इतनी जल्दी में थे कि बेटी का हाथ कस कर पकड़े हुए थे और उससे पहले ही घर में घुस गए. इतने शोर के कारण मेरी नींद टूट गई थी. मुझे बाहर आ कर देखना पड़ा कि आखिर माज़रा क्या है. आज क्या कोई त्यौहार है, कोई फंक्शन या कुछ और. ज़रा मैं भी तो देखूं. किवाड़ के पीछे की दीवाल से होते हुए कमरे के बाहर आई और फिर बाहर के दरवाजे से हो कर मेन गेट पर पहुंची तो देखा अब तक मामला सुलट सा गया था शायद.
दरवाजे के बाहर भी लोग अभी भी इसी इंतज़ार में खड़े थे कि अंदर जा कर गुप्ताइन गुप्ता जी की खबर लेंगी तो मज़ा आएगा. कुछ न कुछ आवाज़ तो बाहर आ ही जायेगी तो फिर दिन बन जाएगा पड़ोसियों का. वैसे दिन तो पहले ही बन गया था. गुप्ता जी की ऐसी छीछालेदर अब तक घर से बाहर कभी नहीं हुई थी. गुप्ता जी  बेचारे अपनी शराफत का बोझ ढोये जा रहे थे. और शुरू से ही उनकी नारी उन पर भारी पड़ रहीं थीं. खैर, इससे मुझे क्या. मैं तो ठहरी छिपकली. न मैं गुप्ताइन को कुछ समझा सकती थी न गुप्ता जी को बता सकती थी कि इतनी शराफत भी ठीक नहीं.
पर मुझे गुप्ता जी भले आदमी लगते थे. बेटी ग्यारहवीं क्लास में थी और अभी से गुप्ता जी ने उसके लिए योग्य वर की तलाश शुरू कर दी थी. वे देशभक्त भी थे और देशभक्त पार्टी भी उन्होंने ज्वाइन कर ली थी. देश की समस्याओं की चिंता उनको उतनी ही थी जितनी देश के प्रधानमंत्री को. देश के प्रधानमंत्री को मैंने टीवी पर एक बार बोलते सुना था तब से मैं उनकी प्रशंसक हो गई थी. उनके विरोधियों को देख कर मुझे दया कम आती थी गुस्सा ज्यादा आता था. बकवास करने की बजाए चुप ही रह लो तो कुछ वोट मिल जाएंगे. जरूरी है कि नौटंकी करो और दुनिया नौटंकीबाज कहे और अपने साथ अपनी पार्टी को भी ले डुबो. न आपमें कोई दम न आपकी पार्टी में. काम तो किसी ने करना नहीं है. अब प्रधानमंत्री देश को आगे बढ़ा रहे हैं तो वो भी आपको हजम नहीं हो रहा है.
मम्मी बचपन से ही मेरी राजनीतिक समझ का लोहा मानती थी. कारण ये था कि मैं ज्यादातर टीवी के पीछे की दीवार पर रह कर ही शिकार मारा करती थी. ऐसे में जब-जब न्यूज़ चलती थी मैं एकाग्रचित्त हो कर सुनती थी मेरी आँखें रहती थीं शिकार पर औऱ कान न्यूज़ पर और मैं खुद टीवी के पीछे दीवाल पर.धीरे-धीरे देश के सारे नेताओं के नाम मुझे याद हो गए थे. कौन कैसा है ये भी पता चल गया था और छह साल में तो इतनी समझ विकसित हो गई थी कि मुझे ये भी पता चल जाता था कि देश का मीडिया क्या दिखा रहा है और क्या छुपा रहा है. सही को गलत कैसे बता रहा है और गलत को सही कैसे जता रहा है. बस एक ही व्यक्ति मुझे ठीक लगता है जो देश में सर्वोच्च देशभक्त कहलाने के योग्य वह है देश का प्रधानमंत्री जो देश के साथ ही साथ देश के बाहर भी देश का डंका बजा रहा था. इसलिये अगर मेरा वोटर आईडी बन जाये तो मेरा वोट देशभक्त पार्टी को ही जायेगा.
फिलहाल हाल ये है कि गुप्ता जी की बेटी नानी के घर गई हुई है. उसके हाफ इयरली एग्ज़ाम खत्म हो गए हैं और अब वो दो हफ्ते बाद वापस आएगी अल्मोड़ा से. इधर छोटे बेटे को करा़टे क्लास क्या ज्वाइन करा दी गुप्ताइन ने कि बेटे ने मोबाइल और कम्प्यूटर गेम खेलना भी बहुत कम कर दिया और आज कल दिन-रात कराटे की प्रेक्टिस में लगा रहता है. कई बार तो एक-दो कराटे मम्मी पापा को भी जमा देता था और बदले में गाल पर झापड़ खाना पड़ जाता था. गुप्ता जी आजकल ओटीटी ज्यादा देखने लगे हैं इसलिए गुप्ताइन की भुनभुनाहट उनको अक्सर सुनाई नहीं देती और घर की शान्ति भी भंग कम होती है.
पर अपनी ये कहानी एक अल्पविराम पर पहुंचाने से पहले मैं आपको ये बताना चाहूंगी कि भले ही मैं इस घर में कोई रेन्ट नहीं देती हूँ और फ्री में रहती हूँ लेकिन मुझे अपनी जिम्मेदारी भली-भांति पता है. मैं गुप्ता जी के बच्चों के कमरे में कभी नहीं जाती और अगर बच्चे मेरे स्टोर रूम में आ जाते थे तो मैं छुप जाती थी ताकि मेरी उपस्थिति से उनको किसी तरह का डर न लगे. और इससे फायदा ये होता था कि स्टोर रूम में मुझे घर के कई राज़ पता चल जाते थे क्योंकि यहीं आ कर गुप्ता जी, गुप्ताइन और कभी-कभी उनकी बेटी भी फ़ोन पर धीरे-धीरे बात करने आ जाया करती थीं. उनको तो लगता था कि दीवाल के कान नहीं होते पर मुझे पता है कि होते हैं. छिपकलियां ही दीवार के कान होती हैं और उनको हर धीमी आवाज़ पूरी साफ़ सुनाई देती है.
(क्रमशः)