beauty: स्त्री सौन्दर्य पर पुरुषों का आकर्षण

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नारी का सौन्दर्य चिरकाल से उसका  चुम्बकीय गुण रहा है जो कि सर्वकालिक और सर्वभौमिक है. आदि काल में प्रथम पुरूष मनु कामायनी सौन्दर्य पर रीझे.  स्त्री सौन्दर्य ,बुद्धि और शक्ति का प्रतीक है वहीं पुरूष को ईश्वर ने मानसिक तथा शारीरीक क्षमता भी अक्षुण्य प्रदान की.सनातन धर्म भारतीय सभ्यता का सबसे पुरातन धर्म है जिसमें नारी हर काल में सम्मानीय व पूजनीय रही है. नारी को दुर्गा, काली, पार्वती का शक्ति रूप माना जाता है. नारी उर्जा और पुरूष बल स्वरूप का प्रतीक हैं. हमारे वेद-पुराणों में भी संस्कृति के विकास का आधार नारी सौन्दर्य रहा है.

सौन्दर्य की परिभाषा दैहिक ही क्यूँ?

अधिकतर नारी के सौन्दर्य की दैहिक परिभाषा ही परिलक्षित होती है क्योंकि स्त्री की दैहिक संरचना ही कुछ ऐसी है जो उसे कोमलांगी होने का दर्जा देती है. सौन्दर्य हर युग में सराहनीय और आकर्षण का केन्द्र बिन्दु रहा है. देव, असुर, गंधर्व, और ऋषि मुनि तक इसके प्रताप से अछूते नही रहे. प्राचीनकाल में उर्वशी की सुन्दरता पर विश्वामित्र रीझे तो वहीं देवता और असुर भी स्त्री सौन्दर्य के आकर्षण से अछूते नहीं थे.समुद्र मंथन में भी भगवान ने स्त्री का रूप धारण कर असुरों को अमृत कलश अधिकारी होने से परास्त किया था.

संस्कृति उत्थान  का आधार नारी सौन्दर्य रहा है

यदि हम रोम,ग्रीस,चीन और भारत सभी के इतिहास उठाकर देखेंगें तो पाएगें कि इनकी संस्कृति के विकास का आधार ही नारी सौन्दर्य रहा है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता. कलाकारों,शिल्पकारों  और कवियों की कल्पना भी इनके सौन्दर्य से जन्मी.बड़े -बड़े ग्रन्थों, महाकाव्यों के निर्माण की नींव स्त्री की मानसिक और शारीरिक सुन्दरता  ही रही है.खजुराहो मंदिर की मूर्तियाँ  नारी सौन्दर्य की अनुपम कलाकृतियों को दर्शाती हैं. हाँ ये बात और है कि मंदिर के बाहर की दीवारों  पर अत्यंत कामुक मुद्रा में मूर्तियाँ अंकित हैं जो काम वासना को इंगित करता हैं परंतु ऐसी मान्यता है कि इनका निर्माण प्राचीन काल के बालकों  का अत्यधिक  समय  गुरूकुल  में व्यतीत  होने के कारण जीवन चक्र के चार अवस्थाओं में से एक काम की शिक्षा जो गृहस्थ जीवन के लिए  अनिवार्य है के अभाव को पूर्ण करने के उद्देश्य  से किया गया था.

यहाँ इस बात का ज़िक्र इसलिए  किया  गया  क्योंकि प्रयोजन जो भी हो परंतु स्त्री सौन्दर्य  को कामुकता के साथ जोड़ा तो अवश्य  गया है जबकि नारी का सौन्दर्य  सिर्फ  देह तक ही सीमित  नही है.  उसके आत्मिक  सौन्दर्य को परखने की दृष्टि रखने वाले  पुरूष विरले ही हैं. सामन्यत: नारी सौन्दर्य  की परिभाषा वाह्य रूप से ही आँकी जाती रही  है. 

नारी सुंदरता के विभिन्न पहलू 

नारी सौन्दर्य का हर दशक में एक अपना  अलग रूप-रंग रहा है.  50-60 वें दशक की नारी ऊपर से नीचे तक कपड़ों से ढँकी होती थी. फिर भी उसके रूप पर कवियों की लेखनी बखूबी चली. सुंदर उपमाओं और अलंकार से सुसज्जित इस दशक की सुंदरी अपनी आँखों, केशों  और व्यवहारिक सुंदरता  से  उस युग के पुरुष की प्रिया बनी रही. 70-80 के दशक की नारी थोड़ी बेबाक हो खुल कर सामने आई. परंतु इस दशक में नारी सुंदरता  के मानक और मापदंड कुछ और ही थे. कुल मिलाकर इस दशक ने नारी को फैशन और कपड़ों  का खुलापन दिया . 90 और उसके आगे के दशक की तो बात ही मत पूछिए.  नारी का सर्वोत्तम गुण और सौन्दर्य प्रतिमान सही मायनों  में उसकी लज्जा और झिझक है जो इस कलयुग के दौर में विलुप्त  होती जा रही है. इस दौर में वस्त्र अब अंग ढँकने  के लिए  नही अलग दिखाने के लिए  पहने जाते हैं. 

नारी सौंदर्य क्या सिर्फ दैहिक है? 

सौन्दर्य के प्रति आकर्षण तो स्वाभाविक ही है. सुन्दरता के प्रति आकर्षण होना कोई उपहास या बेशर्मी का मुद्दा  को सुन्दर कहना भला कब गलत है? गलत सिर्फ बुरे विचार होते  गलत हो तो सब कुछ ही गलत है.नारी को कोमल और लज्जा और पुरुष  को शक्ति का प्रतीक माना जाताहै किन्तु पुरूष नारी को निर्बल नहीं मानता क्यूँकि उस पुरूष का प्रादुर्भाव भी इस संसार में नारी द्वारा हुआ है.वो जानता है कि उसे जन्म देने वाली, पालने वाली, उसके जीवन को रंगों से भरने वाली, उसके हाथों में रक्षा सूत्र बाँधने वाली, अन्नपूर्णा की तरह खाना खिलाना वाली सब कुछ तो उस स्त्री  पर ही निर्भर है. पूरा समाज ही इस स्त्री के इस पुरूषोचित्त गुणों पर टिका पड़ा है तो उस पुरूष का स्त्री के सौन्दर्य के प्रति आकर्षित होना स्वाभाविक है.जो बिल्कुल भी गलत नहीं.हाँ अपवाद हर जगह होते है जो इस इस सन्दर्भ में भी लागू होते हैं.

नई नहीं है ये मानसिकता

मध्य काल से ये मानसिकता चली आ रही है कि नारी केवल भोग-विलास की वस्तु है जो अब तक जारी हैपर ये सब कुछ आपके अपने विचारों पर ही निर्भर करता है कि आप स्वयं क्या सोचते हैं.एक पुरूष को जन्म देने वाली माँ की सुन्दरता, जीवन भर साथ देने वाली पत्नी की सुन्दरता, बचपन में साथ खेली मित्र के भावों की सुन्दरता, अपनी पुत्री की हंसी में चांद की सुन्दरता का आभास होता है.हाँ पुरूष को स्त्री का सौंदर्य आकर्षित अवश्य करता है मगर अलग-अलग रूप और भावों में.अब हम इसके दूसरे पहलू को देखते हैं . इस आधुनिक दौर में कुछ कुत्सित विचारों वाले पुरूष भी हैं जो स्त्री की मर्यादा पर प्रहार करना, प्रश्न उठाने में ही  अपने पुरुषत्व की सार्थकता समझते . इसके विषय में बस ये ही कहूंगी कि कोई भी पुरूष जन्म से ये विचार ले कर पैदा नहीं होता.उसके संस्कार ही उसे वो इंसान बनाते हैं जो उसे धरोहर स्वरूप अपने माता-पिता से मिलते हैं.बाकि आस-पास के माहौल और संगत भी जिम्मेदार होते हैं.एक समझदार और सुलझे विचारों वाला पुरूष सौन्दर्य के प्रति आकर्षित हो सकता है पर मर्यादा में रह कर.

मन की सुंदरता ही वास्तविक सौन्दर्य है

सौन्दर्य सिर्फ तन का नहीं मन का भी है.दैहिक सुन्दरता मन की सुन्दरता के समक्ष गौण है.इस विचार से महिलाएँ क्या पुरूष भी सहमत होंगे.अंतत: यही कहूंगी कि पुरूष स्त्री की सुन्दरता से आकर्षित होते है जैसे फूल पर भँवरा और तितली.हर अाकर्षण के पीछे कुछ पाने की लालसा होती है .चाहे वो वाह्य सुन्दरता की चाह हो, मधुर बोल, सुन्दर वाणी, शालीनता, बेबाकी ,समझदारी या फिर अल्हड़पन हो.पर विचारों की शुद्धता ही नितान्त आवश्यक है.